Bhagavat Gita (भागवद गीता) :गीता के दसवें अध्याय के श्लोक 22 से 32 तक का गहन विश्लेषण

विभूति योग का सार: प्रकृति में प्रकट ईश्वर (गीता दसवें अध्याय 22-32)

Bhagavat Gita के दसवें अध्याय, ‘विभूति योग’ में, श्री कृष्ण अपनी सबसे बड़ी महिमा के बारे में बताते हैं। पिछले श्लोकों (10.12-21) में अर्जुन के कहने पर, भगवान सभी जीवों की आत्माओं और प्राणियों में खुद को प्रकट करते हैं। विष्णु के रूप में प्रकट होते हैं।

Bhagavat Gita इन श्लोकों (10.22-32) में, भगवान अपने ज्ञान, शक्ति, स्वभाव और मैनेजमेंट के बारे में बताते हैं। ज़रूरी पर्सनैलिटी के बारे में बताते हैं। इन पर्सनैलिटी के ज़रिए, कृष्ण यह मैसेज देते हैं कि जो कुछ भी सबसे अच्छा, सबसे सुंदर और सबसे बड़ा है, वह शक्तिशाली है, उसकी शक्ति सब में फैली हुई है।

ज्ञान, देवताओं में शक्ति और इंद्रियाँ (श्लोक 22-24)

Bhagavat Gita भगवान ज्ञान के मूल स्रोत और देवताओं में अपना स्थान बताते हैं।

श्लोक 22:

वेदानां सामवेदोस्मि देवानामस्मि वासवः। इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना। 22

अर्थ: वेदों में मैं सामवेद हूँ। देवताओं में मैं वासव (इंद्र) हूँ। इंद्रियों में मैं मन हूँ, और जानवरों में मैं चेतना (जीवन शक्ति) हूँ।

विश्लेषण: Bhagavat Gita वेदों में सामवेद: सामवेद संगीतमय है और गीतों के माध्यम से पूजा का मार्ग दिखाता है। इसलिए, इसे सभी वेदों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

देवताओं में इंद्र: इंद्र देवताओं के राजा और सर्वोच्च शक्ति के प्रतीक हैं।

इंद्रियों में मन: इंद्रियों में मन सबसे महत्वपूर्ण है और सभी को नियंत्रित करता है, इसलिए यह भगवान की उपस्थिति है।

जानवरों में चेतना: चेतना (चेतन) जो जीवित प्राणियों को शक्ति देती है, वह भगवान का प्रत्यक्ष रूप है।

श्लोक 23:

रुद्राणं शंकरश्चास्मि वित्तेषो यक्षराक्षसम। वसूनां पावकश्चास्मि मेरु शिखरिनामहम् ॥ 23

अर्थ: मैं रुद्रों में शंकर हूँ। मैं यक्षों और राक्षसों में कुबेर (वित्तेश) हूँ। वसुओं में मैं अग्नि (पावक) हूँ, और चोटी वाले पहाड़ों में मैं मेरु पर्वत हूँ।

विश्लेषण: Bhagavat Gita भगवान खुद को शक्ति और अधिकार के केंद्रों में प्रकट करते हैं:

रुद्रों शंकर: विनाशक शंकर (शिव) शक्ति में सर्वश्रेष्ठ हैं।

यक्षों में कुबेर: कुबेर यक्षों और राक्षसों के धन के स्वामी हैं।

वसूमों पावक (अग्नि): अग्नि आठ वसुओं में सबसे चमकीला और शुद्ध है।

पहाड़ों में मेरु: मेरु पर्वत को पौराणिक रूप से सभी पहाड़ों का राजा और दुनिया का केंद्र माना जाता है। है।

श्लोक 24:

पुरोद्धासाम च मैनं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्। सेनानीनामः स्कन्दः सरसंस्मि सागरः ॥ 24

अर्थ: हे पार्थ! मैं बृहस्पति को पुजारियों में प्रधान जानता हूँ। सेनापतियों में मैं स्कन्द (कार्तिकेय) हूँ, और जलाशयों में मैं सागर हूँ।

विश्लेषण: Bhagavat Gita पुजारियों में बृहस्पति: बृहस्पति देवताओं के गुरु और पुजारियों के राजा हैं।

सेनापतियों में स्कन्द: स्कन्द (कार्तिकेय) देवताओं के सर्वश्रेष्ठ सेनापति हैं।

जल निकायों में महासागर: सभी जल निकायों में महासागर सबसे बड़ा और सबसे गहरा है।

सृष्टि, समय और ज्ञान में विभूति (श्लोक 25-28)

Bhagavat Gita भगवान अब शब्दों, समय, महान ऋषियों और जानवरों और पक्षियों में अपने रूपों का वर्णन करते हैं।

श्लोक 25:

महर्षिणां भृगुरहं गिरमस्म्येकमक्षरम्। 25

अर्थ: मैं महान ऋषियों में भृगु हूँ। मैं वाणी में एक अक्षर (ૐकार) हूँ। यज्ञों में, मैं जपयज्ञज्ञ हूँ, और जो दृढ़ रहते हैं, उनमें मैं हिमालय हूँ।

विश्लेषण: Bhagavat Gita महान ऋषियों में भृगु: भृगु सबसे महान और प्राचीन ऋषियों में से एक हैं।

वाणी में ૐकार: ‘एकम अक्षरम्’ का अर्थ है ૐकार। वह सभी मंत्रों और वाणी का मूल स्रोत है।

जपयज्ञम्ं यज्ञञ्ं जपयज्ञन्: जपयज्ञन् को सबसे आसान, सबसे पवित्र और सबसे अच्छा यज्ञ माना जाता है, क्योंकि इसमें हिंसा की कोई जटिलता नहीं है।

स्थानों में हिमालय: हिमालय सबसे ऊँचा, अचल और पवित्र पर्वत है।

श्लोक 26:

अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणां देवर्षिणां च नारद:। गंधर्वण चित्ररथ सिद्धानां कपिलो मुनि ॥26

अर्थ: सभी पेड़ों में मैं पीपलहो (अश्वत्थ) हूँ। देवर्षियों में मैं नारद हूँ। गंधर्वों में मैं चित्ररथ हूँ, और सिद्धों में मैं कपिल मुनि हूँ।

विश्लेषण: Bhagavat Gita पेड़ों में पीपलहो: पीपलहो (अश्वत्थ) एक ऐसा पेड़ है जिसकी उम्र बहुत लंबी होती है और इसे पवित्र माना जाता है।

देवर्षियों में नारद: नारदजी भगवान के बहुत बड़े भक्त हैं और स्वर्ग और पृथ्वी के बीच बिचौलिए का काम करते हैं। उनका महत्व है।

सिद्धों में कपिल मुनि: कपिल मुनि, सांख्य दर्शन के रचयिता, ज्ञान और आध्यात्मिक ज्ञान में सर्वोच्च माने जाते हैं।

श्लोक 27:

उच्चाःश्रवसम्श्वानां विद्धि मममृतोद्भावम्। ऐरावतं गजेन्द्रं नाराणां च नराधिपम् ॥27

अर्थ: मैं घोड़ों में अमृत से निकलने वाली ऊंची आवाज़ को जानता हूँ। मैं सबसे अच्छे हाथियों में ऐरावत हूँ, और मैं इंसानों में राजा हूँ।

श्लोक 28:

आयुधानमः वज्रं धेनुनामस्मि कामधुक्। प्रजानाश्चास्मि कंदर्पः सर्पणामस्मि वासुकिः। 28

अर्थ: हथियारों में मैं वज्र हूँ, और गायों में मैं कामधेनु हूँ। पैदा करने के कारणों में मैं कामदेव (कंदर्प) हूँ, और साँपों में मैं वासुकि हूँ।

विश्लेषण: Bhagavat Gita अश्व और गजेन्द्र: उच्छैःश्रवा और ऐरावत (इंद्र का हाथी) समुद्र मंथन से निकले थे। ये अब तक के सबसे अच्छे जानवर हैं।

इंसानों में राजा: राजा (नराधिपम्) नियम और व्यवस्था का सबसे अच्छा प्रतीक है।

हथियारों में वज्र: वज्र (इंद्र का हथियार) को सबसे शक्तिशाली और अजेय माना जाता है।

गायों में कामधेनु: कामधेनु वह दिव्य गाय है जो मनचाही चीज़ें देती है।

फर्टिलिटी के कारण कंदर्प: कंदर्प (कामदेव) फर्टिलिटी के देवता हैं, जो सृष्टि को चलाते हैं।

जल, तंत्र और राक्षस शक्ति में विभूति (श्लोक 29-32)

Bhagavat Gita भगवान अब पानी के जीवों, मौत और मैनेजमेंट में अपनी शक्ति दिखाते हैं।

श्लोक 29:

अनंतश्चास्मि नागानं वरुणो यादसमहम। पितृनाममर्यामा चस्मि यम: संयमतामहम ॥ 29

अर्थ: मैं सांपों में अनंत (शेषनाग) हूं। पानी के देवताओं में मैं वरुण हूं। पितरों में मैं अयरामा हूं, और कंट्रोल करने वालों में मैं यमराज हूं।

श्लोक 30:

प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कल्याणमहम। मृगाणां च मृगेन्द्रोहम वानतेयाश्च पक्षिणाम्। 30

अर्थ: मैं राक्षसों में प्रह्लाद हूं। हिसाब लगाने वालों में मैं काल हूं। हिरणों में मैं शेर हूं, और पक्षियों में मैं चील (वैणतेय) हूं।

श्लोक 31:

पवन: पवतमस्मि राम: शस्त्रभृतमहम्। झशनं मकरश्चास्मि स्रोतसमस्मि जाह्नवी ॥ 31

अर्थ: मैं पवित्र करने वालों में वायु हूँ। हथियार रखने वालों में मैं राम हूँ। पानी के जीवों में मैं मगरमच्छ (मकर) हूँ, और नदियों में मैं गंगा (जांगवी) हूँ।

श्लोक 32:

सर्गणामादिरंतश्च मध्यमं चैवाहमार्जुन। अध्यात्म विद्या विद्यां वाद: प्रवदतमहम् ॥ 32

अर्थ: हे अर्जुन! मैं सभी रचनाओं का आरंभ, अंत और मध्य हूँ। विद्याओं में मैं आत्मज्ञान हूँ, और बहस करने वालों में सार (तर्क) का चर्चा करने वाला हूँ।

विश्लेषण: Bhagavat Gita संयम और समय: यमराज व्यवस्था और नियंत्रण के प्रतीक हैं। समय ही वह शक्ति है जो सब कुछ कैलकुलेट करता है।

भक्त प्रह्लाद: भक्त राक्षसों में भी प्रह्लाद को अपना व्यक्तित्व मानते हैं, जिससे पता चलता है कि मेरे लिए भगवान की भक्ति सबसे ज़रूरी है।

आदर्श और पवित्रता: राम को शस्त्रधारियों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है और उन्हें आदर्श पुरुष घोषित किया गया है। गंगा (जान्हवी) नदियों में पवित्रता का प्रतीक है।

ज्ञान की श्रेष्ठता: आध्यात्मिक ज्ञान (आत्म-ज्ञान) सभी ज्ञानों में सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि यह मोक्ष की ओर ले जाता है।

निष्कर्ष

Bhagavat Gita के दसवें अध्याय (10.22-10.32) के ये श्लोक भक्ति को स्थापित करने का एक अनोखा तरीका हैं। देते हैं:

सर्वस्व ईश्वर: भगवान सृष्टि के हर क्षेत्र में परम तत्व के ज़रिए खुद को प्रकट करते हैं। प्रकट करते हैं। वे वेदों में सामवेद हैं, देवताओं में इंद्र हैं, इंद्रियों में मन हैं और जानवरों में चेतना हैं।

शक्ति और पवित्रता: भगवान शंकर, बृहस्पति, स्कंद, हिमालय, फकार, राम और गंगा जैसी शख्सियतों के ज़रिए। शक्ति, आदर्श और पवित्रता के मूल स्रोत के रूप में प्रकट होते हैं।

भक्ति की श्रेष्ठता: जपयज्ञ को दूसरे यज्ञों में, और राक्षसों में भी सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। भक्त प्रह्लाद को विभूति मानकर भक्ति का महत्व स्थापित किया गया है।

ज्ञान का हृदय: सभी ज्ञानों में आध्यात्मिक ज्ञान (आत्म-ज्ञान) सर्वश्रेष्ठ है, जिसे भक्त इस बाहरी ज्ञान से प्राप्त कर सकता है। विभूतियों से आगे, यह भगवान के असली रूप की ओर ले जाता है।

इन विभूतियों का ज्ञान भक्त को सिखाता है कि जहाँ कहीं भी चमक, सुंदरता या महानता है, वहाँ भगवान की मौजूदगी है। यह ईश्वरीय शक्ति का एक हिस्सा है। इसलिए, वह हर जगह भगवान का ध्यान करके योग में स्थिर हो सकता है।

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