Bhagavat Gita (भागवद गीता) :गीता के चौदहवें अध्याय के श्लोक 10से 18 तक का गहन विश्लेषण

मन की गति: मृत्यु के बाद तीन गुणों, विशेषताओं और परिणामों की वृद्धि (गीता चौदहवें अध्याय 10-18)

Bhagavat Gita के चौदहवें अध्याय ‘गुणातराय विकास योग’ में प्रकृति के तीन गुणों (सत्व, रजस, तमस) के बारे में बताया गया है। प्रैक्टिकल एनालिसिस किया गया है। पिछले श्लोकों (14.1-9) में, श्री कृष्ण ने इन गुणों के रूप और आत्मा को कैसे बांधा है, यह समझाया गया है।

Bhagavat Gita इन श्लोकों (14.10-18) में, भगवान अब एक जीवित इंसान के मन और जीवन में इन गुणों के इंटरेक्शन के बारे में बताते हैं। बताते हैं कि एक्शन-रिएक्शन (इंटरप्ले) कैसे काम करता है। वे दिखाते हैं कि किन गुणों के बढ़ने से कौन से गुण दिखाई देते हैं, और मृत्यु के समय कौन से गुण मजबूत हो जाते हैं। अगर ऐसा है, तो आत्मा किस अवस्था (दुनिया) में पहुँचती है? यह एनालिसिस इंसानों को उनके व्यवहार को समझने और सही रास्ता चुनने में मदद करता है।

1.गुणों की पारस्परिक शक्ति (श्लोक 10)

Bhagavat Gita इंसान की ज़िंदगी में तीनों गुण कभी बराबर नहीं होते। वे लगातार एक-दूसरे पर हावी होने की कोशिश करते रहते हैं।

श्लोक 10:

राजस्तमश्चाभिभूया सत्त्वं भवति भारत। रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं राजस्तथा ॥ 10

अर्थ: हे भारत! (कुछ) सत्त्व गुण रजस और तमस् गुण को जीतकर मज़बूत हो जाते हैं। (कुछ) रजस गुण सत्त्व और तमस् गुण को जीतकर मज़बूत हो जाते हैं। और सत्त्व और रजस् गुण को जीतकर तमस् गुण मज़बूत हो जाते हैं।

विश्लेषण: Bhagavat Gita गुणों का द्वंद्व: यह श्लोक जीवन के लगातार बदलते स्वभाव को समझाता है। मन स्थिर अवस्था में नहीं रहता। ये तीनों गुण लगातार एक-दूसरे को दबाकर (अभिभूय) अपना दबदबा बनाने की कोशिश करते रहते हैं।

व्यवहार का आधार: किसी व्यक्ति का व्यवहार, उसकी प्रवृत्तियाँ और मानसिक स्थिति। उस समय कौन से गुण ज़्यादा होते हैं? यह इस पर निर्भर करता है। यह इंटेंसिटी सुबह और शाम, जवानी और बुढ़ापे में, और अलग-अलग एक्टिविटीज़ के दौरान बदलती रहती है।

2.गुणों की वृद्धि के लक्षण (श्लोक 11-13)

Bhagavat Gita भगवान अब बताते हैं कि कैसे पता चलेगा कि कौन सा गुण बढ़ गया है।

श्लोक 11: सत्व गुण की बढ़ोतरी

सर्वद्वारेषु देहेस्मिन्प्रकाश उपजायते। ज्ञानं यादा ताडा विद्याद्विद्धं सत्तमित्यु ॥ 11

अर्थ: जब इस शरीर के सभी दरवाज़ों (इंद्रियों) में रोशनी और ज्ञान दिखाई देता है, तो सत्व गुण बढ़ गया है, यह जानना।

श्लोक 12: रजस गुण में बढ़ोतरी

लोभ: प्रवृतिआरंभ: कर्मणामशम: स्पृहा। राजस्येतानि जायन्ते विरुद्धा भरतर्षभा। 12

अर्थ: हे भारत! जब रजस गुण बढ़ता है, तो लालच (लालच), अशांत क्रयाशील, कामों की शुरुआत, अशांति (अशमः) और स्पृहा (इच्छाएं) ये लक्षण पैदा होते हैं।

श्लोक 13: तमस गुण का बढ़ना

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च. तमस्येतानि जयन्ते विवृधे कुरुनन्दन ॥ 13

अर्थ: हे कुरुनन्दन! जब तमस गुण बढ़ता है, तो अंधकार (अप्रकाश), अकर्मण्यता (अप्रवृत्ति), प्रमाद (लापरवाही) और आसक्ति (भ्रम) ये लक्षण होते हैं।

विश्लेषण: Bhagavat Gita सत्व (प्रकाश): सत्व के बढ़ने से बुद्धि और इंद्रियों में स्पष्टता (प्रकाश) आती है। व्यक्ति आसानी से सही और गलत में फर्क कर सकता है और उसका मन शांत रहता है।

रजस (कार्य): रजस के बढ़ने से व्यक्ति में बेचैनी होती है। वह काम तो करता है, लेकिन उसका मूल मकसद लालच और फल की इच्छा होती है, जिसके कारण उसे कभी शांति नहीं मिलती। मिल नहीं पाती।

तमस (अंधेरा): तमस के बढ़ने से ज्ञान का नाश (अप्रकाश) होता है। व्यक्ति लापरवाह, आलसी और भ्रम में रहने वाला हो जाता है। वे ज़्यादा समय निष्क्रियता और सोने में बिताते हैं।

3.मृत्यु के बाद गति (श्लोक 14-15)

Bhagavat Gita मृत्यु जीवन का अंतिम कार्य है। भगवान बताते हैं कि आत्मा की आगे की यात्रा (गति) इस बात पर निर्भर करती है कि मृत्यु के समय कौन सा गुण प्रबल था। यह तय होता है।

श्लोक 14: सत्व गुण में मृत्यु

यदा सत्व गुण वृद्धि तु प्रलयाम् याति देहभृत्। तदोत्तमविदं लोकान्मालानप्रतिपद्यते ॥ 14

अर्थ: जब सत्व गुण बढ़ता है और देहधारी मनुष्य मरता है, तो वह उत्तम कर्म होता है। करने वालों के शुद्ध कर्म श्रेष्ठ लोगों को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 15: राजस गुण में मृत्यु

राजसि प्रलयाम् गत्वा कर्मसंगिषु जायते। तथा प्रलीनस्तमसि मूढ़योनिषु को जाता है। ॥ 15

अर्थ: राजस गुण में मरकर वह कर्म में आसक्ति रखने वाले मनुष्यों में (मध्यम लोक) जन्म लेता है। और जो लोग तामसिक गति में मरते हैं, वे मूर्ख (अज्ञानी) योनि में जन्म लेते हैं।

विश्लेषण: Bhagavat Gita सत्व की गति (ऊपर की ओर गति): जो आत्मा सत्व गुण के बल पर मरती है, वह स्वर्ग जाती है, महर्लोक, या जनलोक जैसी ऊँची और पवित्र दुनिया मिलती है, जहाँ ज्ञान और शांति होती है। इसका अनुभव होता है।

रजसनी गति (मध्यम गति): जो आत्मा रजस की तीव्रता में मरती है, वह इंसानी दुनिया (मध्यम गति) में वापस आती है। जन्म इसलिए लेती है क्योंकि वह अभी भी फल पाने की उम्मीद में कर्म करने में आसक्त है।

तामसनी गति (गिरावट): आत्मा तामसनी के प्रभाव से मरती है। आत्मा जानवर, पक्षी, कीड़े जैसी मूर्ख और अज्ञानी हो जाती है। योनि या निचली दुनिया में जन्म लेती है, क्योंकि मृत्यु के समय उसका मन पूरी तरह से अंधेरा होता है और वह मोह में होता है।

4.अच्छे कर्मों का फल (श्लोक 16-18)

Bhagavat Gita गुण सिर्फ़ मौत के बाद ही नहीं, बल्कि ज़िंदगी में किए गए कामों के नतीजों पर भी असर डालते हैं।

श्लोक 16:

कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्विकम् निर्मलम् फलम्। राजसस्तु फलम् दुखमज्ञानम् तमसः फलम् ॥ 16

अर्थ: शुभ (सात्विक) कामों का नतीजा सात्विक और शुद्ध (शुद्ध) कहा जाता है। राजसिक कामों का नतीजा दुख और तामसिक कामों का नतीजा अज्ञान कहलाता है।

श्लोक 17:

सत्त्वत् सञ्जयते ज्ञानम् रजसो लोभ एव च। प्रमदमोहौ तमसः भवतोज्ञानमेव च ॥ 17

अर्थ: : सत्व से ज्ञान, रजस से लोभ और तमस से प्रमाद (लापरवाही) पैदा होता है, आसक्ति और अज्ञान पैदा होते हैं।

श्लोक 18:

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्थ मेधि तिष्ठन्ति राजसः। जघन्यगुणवृत्र्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥ 18

अर्थ: सत्व गुण वाले लोग ऊपर की दुनिया में जाते हैं, रजस गुण वाले लोग मध्यम (मनुष्य) दुनिया में जाते हैं। वे इसी दुनिया में रहते हैं, और बेकार गुणों (तमस) वाले लोग नीचे की दुनिया में जाते हैं।

विश्लेषण: Bhagavat Gita फलों का अंतर: श्लोक 16 फलों में तुरंत अंतर दिखाता है।

सात्विक कर्म: शुद्ध खुशी और ज्ञान देता है।

राजसिक कर्म: अशांति और दुख देता है (क्योंकि लालच कभी संतुष्ट नहीं होता)।

तामसिक कर्म: अज्ञानता और आसक्ति में ज़्यादा।

गुणों का बनना: श्लोक 17 फिर से गुणों के मूल प्रोडक्ट्स को समझाता है: सत्व = ज्ञान, रजस = लालच, तमस = लापरवाही और आसक्ति।

गति का सारांश: श्लोक 18 पिछले श्लोकों का सारांश देता है और तीनों गुणों की गति को समझाता है: सत्व (ऊर्ध्व) → रजस (मध्य) → तामस (अधः)। मनुष्य को खुद चुनना होता है कि उसे किस दिशा में जाना है।

निष्कर्ष

Bhagavat Gita के चौदहवें अध्याय (14.10-14.18) के ये श्लोक प्रैक्टिकल आध्यात्मिक ज्ञान का दिल हैं:

देखना: इंसान को हमेशा अपने मन और व्यवहार को देखना चाहिए कि कौन से गुण ज़्यादा बन रहे हैं। ज्ञान का प्रकाश सत्व, बेचैनी/लालच रजस और आसक्ति/आलस की निशानी है।

अंतिम गति: मौत के समय इंसान के जो गुण ज़्यादा होते हैं, वही उसके अगले जन्म की दिशा (ऊँचा, मध्यम या नीचा) तय करते हैं।

कर्मफल: सुख-दुख, ज्ञान-अज्ञान – ये सब हमारे कर्मों में मज़बूत गुणों के नतीजे हैं। सिर्फ़ अच्छे कर्म ही शुद्ध नतीजे देते हैं।

ये श्लोक इंसानों को तमस और रजस छोड़कर सत्व गुण बढ़ाने की प्रेरणा देते हैं, ताकि वे ऊपर की ओर तरक्की कर सकें और आखिर में मोक्ष पा सकें।

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