Bhagavat Gita (भागवद गीता) : गीता के अठारहवाँ अध्याय के श्लोक 21 से 30 तक का गहन विश्लेषण

Bhagavat Gita : अठारहवाँ अध्याय (मोक्ष संन्यास योग) – श्लोक 21 से 30: ज्ञान, कर्म और कर्ता का त्रिगुणात्मक विश्लेषण और बुद्धि का भेद

अठारहवें चैप्टर के पहले आधे हिस्से (श्लोक 11 से 20) में, भगवान कृष्ण कर्म की सिद्धि के कारण बताते हैं और सात्विक ज्ञान के बारे में बताते हैं। अब श्लोक 21 से 30 में, वे राजसिक और तामसिक ज्ञान बताकर ज्ञान का बँटवारा पूरा करते हैं। फिर, वे कर्म के तीन गुणों और कर्ता (करने वाले) का एनालिसिस करते हैं। इस सेक्शन के आखिर में, वे बुद्धि (फैसला लेने की शक्ति) और धृति (धैर्य) के तीन गुणों का गहरा क्लासिफिकेशन शुरू करते हैं, जो इंसान के स्वभाव का एक बारीक एनालिसिस है।

ये श्लोक इंसान को अपने अंदर के विचारों, कामों और फैसलों के गुणों को पहचानकर सात्विक ज्ञान की ओर बढ़ने का रास्ता दिखाते हैं।

Bhagavat Gita

भाग 1: राजसिक और तामसिक ज्ञान का वर्गीकरण (श्लोक 21, 22)

श्लोक 20 में सात्विक ज्ञान (एकता का दर्शन) के बारे में पहले बताने के बाद, भगवान अब इसके उलट, राजसिक और तामसिक ज्ञान के बारे में बताते हैं।

1.1. श्लोक 21 का डिटेल्ड एनालिसिस: राजसिक ज्ञान – अंतर का दर्शन
ब्रग्त्वन तु यज्ज्ज्ञानं नानाभावनपृथगविधान । वेत्ती सर्वेषु भूतेषु अन्तिनां विद्धि राजसम ॥21॥

अर्थ: लेकिन जिस ज्ञान से सभी प्राणियों (जीवों) में और अलग-अलग (पृथकत्वेन) अलग-अलग तरह के छोटे (अलग) भावों को जाना जाता है, वह ज्ञान राजसिक कहलाता है।

विस्तृत विश्लेषण: Bhagavat Gita राजसिक ज्ञान का सार: राजसिक ज्ञान सात्विक ज्ञान का उल्टा है। यह एकता में नहीं, बल्कि अंतर में विश्वास करता है।

प्रग्तेष्टेवन नाह्या भेत्वन (नाह्यावा उस ज्ञान के माध्यम से, व्यक्ति, धर्म, जाति या देश के आधार पर भेदभाव देखता है।

उद्देश्य: यह ज्ञान व्यक्ति को स्वयं को या अपने समूह को दूसरों से श्रेष्ठ मानने की ओर ले जाता है। भेदभाव और अलगाव की यह भावना ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा और संघर्ष को जन्म देती है।

परिणाम: यह ज्ञान भ्रम, आसक्ति और अनिश्चितता की ओर ले जाता है, क्योंकि राजसिक व्यक्ति मतभेदों का विश्लेषण करके लगातार दुखी रहता है।

1.2. श्लोक 22 का विस्तृत विश्लेषण: तामसिक ज्ञान – मिथ्यात्व के प्रति आसक्ति
यत्तु कृत्स्नावदेकास्मिनकार्या सक्तमहयतुकाम । अत्त्वर्थवदलपं च तत्तामसुदाहृतम ॥22॥

अर्थ: जो ज्ञान पूरी तरह से एक ही क्रिया (कार्य) से जुड़ा होता है, वह अकारण (अहैतुकम) होता है, जिसमें किसी भी पदार्थ का अर्थ नहीं होता और सीमित है, उसे तामसी कहते हैं।

विस्तृत विश्लेषण:

  • तामसी ज्ञान का सार: तामसी ज्ञान अंधविश्वास, अज्ञानता और जड़ता का नतीजा है।
  • कृष्णवत एकस्मिन कार्ये सक्तं (पूरे से जुड़ा हुआ): एक तामसी व्यक्ति किसी एक छोटी सी चीज़ या विचार को पूरा सच मान लेता है और उसी में आसक्त हो जाता है। वह पूरी सृष्टि के सार को नज़रअंदाज़ कर देता है और एक ही हिस्से को सब कुछ मान लेता है।
  • उदाहरण: सिर्फ़ शरीर को ही सब कुछ मानना, आत्मा के होने पर विश्वास न करना।
  • अहैतुकम (बिना वजह): उस ज्ञान का कोई तर्क या शास्त्रों का आधार नहीं होता। यह सिर्फ़ अंधविश्वास या पुराने रीति-रिवाजों पर आधारित होता है।
  • अत्तत्वार्थवत (सार के अर्थ के बिना): वह ज्ञान आत्मा, परमात्मा या मोक्ष के असली सार को नहीं समझ सकता।
  • अल्पम (सीमित): वह ज्ञान छोटा और सीमित होता है, जो इंसान को बड़े सच तक नहीं पहुँचने देता।
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भाग 2: तीन तरह के कर्मों का वर्गीकरण (श्लोक 23, 24, 25)

Bhagavat Gita ज्ञान के बाद, भगवान अब किसी भी काम (कर्म) को उसके मकसद और भावना के आधार पर तीन तरह से बांटते हैं।

2.1. श्लोक 23 का डिटेल्ड एनालिसिस: सात्विक काम – आसक्ति का त्याग
नियतं संगरहितमरागद्वेषतः कृतम् । अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सत्वेकमुच्यते ॥23॥

अर्थ: जो काम बिना आसक्ति, बिना राग-द्वेष के और फल की इच्छा न रखने वाले के द्वारा किया जाता है, उसे सात्विक कहते हैं।

विस्तृत विश्लेषण:

  • नियतं संगऱऽहितम् (बिना आसक्ति के ड्यूटी): Bhagavat Gita यह काम एक ड्यूटी (ड्यूटी) है और इसमें कोई अहंकार या अधिकार की भावना नहीं है, जैसे कि ‘मैं इसे करता हूँ’।
  • आरग-द्वेषतः कृतम् (बिना राग या द्वेष के): काम करने के पीछे कोई राग (प्रेम/आसक्ति) या द्वेष (नफरत/जलन) नहीं है। यह सिर्फ समभाव से किया जाता है।
  • अफल-प्रेप्सुना (नतीजे की इच्छा न करना): करने वाला काम के नतीजे की उम्मीद नहीं करता, चाहे वह अच्छा हो या बुरा।
  • 2.2. श्लोक 24 का डिटेल्ड एनालिसिस: राजसिक कर्म – कोशिश और अहंकार

यत्तु कामेप्सुना कर्म सहांकारेण वा पुन । क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहरितम् ॥24॥

अर्थ: लेकिन जो काम खुशी की इच्छा रखने वाला, या अहंकार से करता है, और जो बहुत कोशिश (बहुलायसम्) से किया जाता है, उसे राजसिक कर्म कहते हैं।

विस्तृत विश्लेषण:

कामेप्सुना (खुशी की इच्छा): राजसिक काम का मुख्य मकसद भौतिक सुख, धन, सम्मान या इंद्रिय सुख पाना है।

सहांकारेण (अहंकारी): करने वाला मानता है कि ‘मैंने यह किया है’ और तारीफ की उम्मीद करता है।

बहुलायासम (बहुत कोशिशें): राजसिक काम बहुत ज़्यादा कोशिश, जल्दबाज़ी और तेज़ी से किया जाता है, जिससे करने वाला थक जाता है और बेचैन हो जाता है। कोशिश ज़्यादा होती है लेकिन शांति कम होती है।

2.3. श्लोक 25 का डिटेल्ड एनालिसिस: तामसिक काम – हिंसा और अज्ञान
अनुबंधं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषमन पौरुषमन पौरुषमन भोहादार्भ्यते कर्म यत्तत्तामनपेक्ष्य कर्म य॥25॥

अर्थ: जो कर्म भ्रम की वजह से शुरू होता है, जिसमें भविष्य के नतीजे (अनुबंधं), विनाश (क्षयं) और हिंसा (हिंसाम्) पर विचार नहीं किया जाता, और अपनी ताकत (पौरुषम्) पर विचार नहीं किया जाता, उसे तामसी कर्म कहते हैं।

विस्तृत विश्लेषण:

  • मोहत आरभ्यते (भ्रम की वजह से): Bhagavat Gita तामसी कर्म का मकसद अज्ञान, जड़ता और अंधविश्वास है।
  • अनुबंधम (भविष्य के नतीजे): यह न सोचना कि इस काम का भविष्य में क्या नतीजा होगा।
  • क्षयम (विनाश): यह जानते हुए भी कि यह काम खुद का या दूसरों का विनाश करेगा, उसे करना।
  • हिंसाम (हिंसा): दूसरे जीवों या पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने के बारे में न सोचना।
  • पौरुषम अनपेक्ष्य (ताकत पर विचार किए बिना): यह सोचे बिना कि काम पूरा करने की काबिलियत, ताकत या साधन हैं या नहीं, जल्दबाजी में काम करना।
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भाग 3: त्रिएक कर्ता का वर्गीकरण (श्लोक 26, 27, 28)

Bhagavat Gita कर्म के पीछे ज़रूरी चीज़ कर्ता है। कर्ता के स्वभाव का एनालिसिस करने के बाद, भगवान अब तीन तरह के कर्ता बताते हैं।

3.1. श्लोक 26 का डिटेल्ड एनालिसिस: सात्विक कर्ता – वैराग्यहीन और संयमी
मुक्त्संगोऽनहंवादी धृत्युत्सहसमन्वितः सिद्ध्यसिद्योर्निर्विकारः कर्तात्स सात्विक उच्यते ॥26॥

अर्थ: जो कर्ता आसक्ति से मुक्त (मुक्तासंगः) हो, जिसमें ‘मैं करता हूँ’ (अनहम्वादी) का अहंकार न हो, जो धैर्य और उत्साह से भरपूर हो, और जो सिद्धि (सफलता) या असिद्धि (असफलता) में अप्रभावित रहे, उसे सात्विक कहते हैं।

विस्तृत विश्लेषण:

  • मुक्तासंगः: कर्म के फल से आसक्ति से मुक्त।
  • अनहमवादी: वह जो पाँच कारणों के ज्ञान के कारण ‘मैं कर्ता हूँ’ यह नहीं सोचता।
  • ध्रुत्युत्साहसम्नाविता:
  • धृति: धैर्य, किसी काम को आखिर तक बनाए रखने की शक्ति।
  • उत्थया: काम में लगातार एनर्जी और उत्साह।
  • सिद्ध्यसिद्धयो: निर्विकार: सफलता या असफलता – दोनों ही मामलों में एक जैसा रहता है, दुख या खुशी से परेशान नहीं होता।

3.2. श्लोक 27 का विस्तृत विश्लेषण: राजसिक कर्ता – आसक्ति और लालच
रागि कर्मफलप्रेप्सुरलुब्धो हिंसकात्हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्त्यथा ॥27॥

अर्थ: जो कर्ता आसक्त (रागी), अपने कर्मों के फल की चाह रखने वाला (कर्मफलप्रेप्सुः), लालची, हिंसक (हिंसकको), अशुद्ध और खुशी और दुख से भरा होता है, उसे राजसिक कहा जाता है।

विस्तृत विश्लेषण:

  • गुस्सा और कर्मफलप्रेप्सु : Bhagavat Gita कर्म और उसके फल के प्रति बहुत ज़्यादा आसक्त।
  • लुब्ध: धन, सम्मान और शक्ति का लालची।
  • हिंसक और अशुद्ध:
  • हिंसक: अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को नुकसान पहुँचाने से नहीं हिचकिचाता।
  • अशुद्ध: बाहर और अंदर से अशुद्ध इरादे (गलत इरादे) रखना।
  • हर्षशोकन्विता: सफलता में बहुत ज़्यादा खुश और असफलता में बहुत ज़्यादा दुखी।

3.3. श्लोक 28 का विस्तृत विश्लेषण: तामसी कर्ता – जड़ता और पाखंड
अयुक्तः प्रकृ सत्बधः शथो नाइषकृतो नाइषकृतो लसः त्राती दिर्गुसूत्री च करता तामस उच्यते ॥28॥

अर्थ: जो कर्ता असंयमी (अयुक्तः), असभ्य (प्रकृतः), अभिमानी (सत्बधः), छली (शथाठः), दूसरों का तिरस्कार करने वाला (नैषकृतिकः), आलसी (अलसः), शोकाकुल (विशादाती) और दीर्घाहाती (दीर्घाहाती) होता है, उसे नैष्कृतिकाः (तिरस्कार करने वाला) और अलसः (आलसी) कहते हैं: जो दूसरों का सम्मान नहीं करता और काम करने में आलस्य महसूस करता है।

विषादि और दीर्घसूत्री (काम टालने वाला): जो काम को टालता रहता है और लगातार दुखी रहता है।

भाग 4: बुद्धि और धैर्य का वर्गीकरण (श्लोक 29, 30)

श्री कृष्ण अब इंसानी पर्सनैलिटी के दो सबसे ज़रूरी और बारीक पहलुओं – इंटेलिजेंस (फैसला) और पर्सिवरेंस (दृढ़ता या धीरज) का तीन तरह का क्लासिफिकेशन शुरू करते हैं।

4.1. श्लोक 29 का डिटेल्ड एनालिसिस: गुणों के हिसाब से इंटेलिजेंस और पर्सिवरेंस का क्लासिफिकेशन
बुद्धेर्भेदं धृतेशेण धृतेशैव गुणतस्त्रिविधं श्रुणु । प्रोच्यमानमशेषेण ब्रिग्त्त्वेन ॥29॥

अर्थ: हे धनंजय (अर्जुन), इंटेलिजेंस और पर्सिवरेंस के गुणों के हिसाब से जो तीन तरह के भेद पूरी तरह और अलग-अलग बताए गए हैं, उन्हें सुनो।

विस्तृत विश्लेषण:

इंटेलिजेंस (फैसला): Bhagavat Gita ज्ञान का इस्तेमाल करके सही और गलत, सही और गलत, और सही और गलत में फर्क करने की पावर।

धृति (धैर्य/धारण करने की पावर): मन, प्राण और इंद्रियों को लक्ष्य पर टिकाए रखने की पावर।

अशेषेण पृथक्त्वेन: भगवान इन दोनों का पूरी तरह और अलग-अलग विश्लेषण करेंगे, क्योंकि ये दोनों गुण व्यक्ति को सात्विक कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं।

4.2. श्लोक 30 का विस्तृत विश्लेषण: सात्विक बुद्धि – धर्म का दर्शन
प्रवृत्ति, निवृत्ति और काम का भय। बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः स पार्थ सात्त्विकी ॥30॥

अर्थ: हे पार्थ, जो बुद्धि क्रिया (कर्म करना) और अक्रिया (कर्म न करना), कर्म (उचित) और अक्रिया (अनुचित), भय और निर्भयता, बंधन और मोक्ष को ठीक से जानती है, वह सात्विक बुद्धि है।

विस्तृत विश्लेषण:

  • सात्विक बुद्धि का काम: सात्विक बुद्धि सही तरीके से इनमें फर्क करती है:
  • प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च: कौन से काम करने लायक हैं (प्रवृत्ति) और कौन से काम छोड़ने लायक हैं (निवृत्ति)।
  • कार्य-अकार्ये (योग्य-अयोग्य): कौन सा फैसला नैतिक रूप से सही है और कौन सा गलत।
  • भया-अभये (डर और निडरता): किससे डरना चाहिए (अधर्म) और किससे नहीं डरना चाहिए (मुक्ति का रास्ता)।
  • बंधं मोक्षं च: कौन से काम बंधन की ओर ले जाते हैं और कौन से मुक्ति की ओर।

सात्विक बुद्धि धर्म और सत्य का रास्ता साफ-साफ देखती है और उसी के हिसाब से फैसले लेती है।

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निष्कर्ष: ज्ञान, कर्म और कर्ता का एकीकरण

Bhagavat Gita के अठारहवें अध्याय के ये श्लोक (21 से 30) इंसान के स्वभाव के तीन तरह के स्वभाव की पूरी और मुश्किल जानकारी देते हैं:

ज्ञान की पवित्रता: सच्चा ज्ञान एकता में विश्वास करता है, जबकि राजसिक और तामसिक ज्ञान इंसान को भेदभाव और झूठ में फंसाता है।

करने वाले का स्वभाव: सात्विक करने वाला बेफिक्र, जोशीला और कुछ समय के लिए रहने वाला होता है, जबकि राजसिक और तामसिक करने वाले घमंडी, लालची या आलसी होते हैं।

फैसले लेने की ताकत का आधार: सात्विक बुद्धि धर्म और मोक्ष का रास्ता साफ देखती है, जिससे सही फैसले लेने में मदद मिलती है।

यह ज्ञान इंसान के मन और कामों को सात्विक बनाकर त्याग योग की ओर बढ़ने में मदद करता है।

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