Bhagavat Gita (भागवद गीता) :गीता के तीसरे अध्याय के श्लोक 1 से 11 तक का गहन विश्लेषण

यह सेक्शन अर्जुन के कन्फ्यूजन, कर्म और ज्ञान के बीच संबंध, और त्याग के ज़रिए ड्यूटी के महत्व को समझाता है।

कर्म योग की शुरुआत: ज्ञान या कर्म? – गीता के तीसरे अध्याय के श्लोक 1 से 11 का गहन विश्लेषण

Bhagavat Gita का तीसरा चैप्टर, जिसे “कर्म योग” के नाम से जाना जाता है, गीता की शिक्षाओं में एक अहम मोड़ लाता है। दूसरे चैप्टर के आखिर में, भगवान कृष्ण अर्जुन को बिना स्वार्थ के ज्ञान और बिना स्वार्थ के कर्म योग के सिद्धांत समझाकर लड़ने के लिए प्रेरित करते हैं। यह सुनकर, अर्जुन के सामने एक नई दुविधा आती है: अगर ज्ञान सबसे ज़रूरी है, तो एक छोटे से काम (युद्ध) में क्यों लगना? यह हिस्सा इसी दुविधा से शुरू होता है और ड्यूटी की ज़रूरत को समझाता है।

1.अर्जुन का प्रश्न: श्रेष्ठ कर्मों का ज्ञान? (श्लोक 1-2)

Bhagavat Gita अर्जुन समझ जाता है कि श्री कृष्ण बुद्धि (ज्ञान) को कर्म से श्रेष्ठ मानते हैं, इसलिए उसने भयंकर युद्ध किया। ऐसा करने के आदेश का विरोध करता है।

श्लोक 1:

अर्जुन उवाच जायसी चेतकर्मणस्ते माता बुद्धिजनर्दन। तत्किं कर्माणि घोरे मां नियोजितसि केशव। 1

अर्थ: अर्जुन ने कहा: हे जनार्दन, यदि आप बुद्धि (ज्ञान) को कर्मों से श्रेष्ठ मानते हैं, तो हे केशव, आप मुझे इस भयंकर कर्म (युद्ध) में क्यों लगाते हैं?

श्लोक 2:

व्यामिश्रनेव वाक्येन बुद्धिं मोहायसीव में। तदेकं वद निश्चय येन श्रेयोऽहमप्नुयाम् ॥ 2

अर्थ: आपकी मिली-जुली बातों से मेरा मन मोहित हो गया है। इसलिए, कृपया मुझे कोई एक पक्की बात बताइए जिससे मेरा कल्याण (क्रेडिट) हो सके।

विश्लेषण: Bhagavat Gita अर्जुन का कन्फ्यूजन बुद्धि के दो मतलबों की वजह से है:एक तरफ, श्री कृष्ण ने ज्ञान (सांख्य) की बात की।दूसरी तरफ, उन्होंने निष्काम कर्म (बुद्धि योग) करने की बात की। अर्जुन को लगा कि अगर ज्ञान ही सबसे बड़ा है, तो भयानक युद्ध (कर्म) करने के बजाय उसे त्याग करना चाहिए। वह श्रेय (आध्यात्मिक कल्याण) का पक्का रास्ता जानना चाहता है।

2.नेकी के दो रास्ते और कर्म की ज़रूरत (श्लोक 3-6)

Bhagavat Gita श्री कृष्ण अर्जुन का कन्फ्यूजन दूर करते हैं और साफ करते हैं कि ज्ञान और कर्म दोनों ही मुक्ति के रास्ते हैं। लेकिन यह अलग-अलग लोगों के लिए है।

श्लोक 3:

श्री भगवानवाच लोकेऽस्मिन्दविविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयंग। ज्ञान योगेन सांख्यानं कर्मयोगेन योगिनम्। 3

अर्थ: श्री भगवान ने कहा: हे निष्पाप अर्जुन, इस दुनिया में मैंने सबसे पहले (सृष्टि शुरू की) दो तरह की चीजें बनाईं। निष्ठा (जीवन जीने का तरीका) कहा गया है: ज्ञानी लोगों के लिए ज्ञान योग के ज़रिए सांख्यान और योगियों के लिए कर्म योग। क्या तुम जानते हो।

विश्लेषण: Bhagavat Gita श्री कृष्ण सांख्य (संन्यास/ज्ञान) और योग (कर्म) के बीच का अंतर बताते हैं। ये दोनों रास्ते आखिर में मुक्ति की ओर ले जाते हैं। अर्जुन (योगी) के लिए कर्म का रास्ता सबसे अच्छा है।

श्लोक 4:

न कर्मणामनारम्भतनैष्कर्म्यां पुरुषोएष्णुते। न च संन्यासनदेव सिद्धि समाधिगच्छति ॥4

अर्थ: इंसान कर्म शुरू न करके नैष्कर्म्य (कर्म के बंधन से मुक्ति) हासिल नहीं करता, और सिर्फ़ संन्यास लेने (शरीर छोड़े बिना) से सफलता नहीं मिलती।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह एक क्रांतिकारी विचार है। श्री कृष्ण कहते हैं कि सिर्फ़ शारीरिक रूप से कर्म न करने (कर्म संन्यास) से इंसान कर्म से मुक्त हो जाता है। बंधन से मुक्त नहीं हो सकता। असली मुक्ति (नैष्कर्म्य) सिर्फ़ नतीजों की आसक्ति छोड़ने से ही मिलती है।

श्लोक 5:

न कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्टत्य कर्मकृत्। कार्यते ह्यवश कर्म सर्व प्रकृति जैर्गुणै ॥5

अर्थ: असल में, कोई भी इंसान किसी भी समय एक पल के लिए भी बिना कोई काम किए नहीं रह सकता। क्योंकि सभी जीव प्रकृति से पैदा हुए गुणों के कारण मजबूरी में (मज़बूरी में) कर्म करने के लिए प्रेरित होते हैं।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक कर्म की ज़रूरत को समझाता है। कर्म सिर्फ़ शारीरिक कर्म नहीं हैं। प्रकृति के तीन गुण (सत्व, रजस, तमस) हर जीव को लगातार एक्टिव रखते हैं। इंसान का सांस लेना, सोचना या भूख लगना भी कर्म है। इसलिए, कर्म का बाहरी त्याग मुमकिन नहीं है।

श्लोक 6:

कर्मेन्द्रियाणि संयमया या अस्ते मनसा स्मर्ण। इन्द्रियार्थांविमूढ़ात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥ 6

अर्थ: जो मूर्ख व्यक्ति अपने शारीरिक अंगों (हाथ, पैर आदि) को वश में करके मन से इंद्रियों के विषयों के बारे में सोचता है। अगर कोई ऐसा करता रहता है, तो उसे झूठा कहा जाता है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita श्री कृष्ण यहाँ पाखंडी की विशेषता बताते हैं। बाहरी तौर पर कर्मों को त्यागना और मन में चीजों के बारे में सोचना सबसे बड़ा दिखावा है, जिससे मोक्ष नहीं मिलता। बल्कि यह और अधिक बंधन पैदा करता है।

कर्मयोगी की श्रेष्ठता और कर्तव्य पालन (श्लोक 7-9)

श्री कृष्ण बताते हैं कि कैसे एक कर्मयोगी झूठे से बेहतर होता है।

श्लोक 7:

यस्तविन्द्रियाणि मनसा नियमयार्भतेऽर्जुन। कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमासक्तः स विशिष्यते ॥ 7

अर्थ: हे अर्जुन, जो मनुष्य अपने मन से इंद्रियों को वश में करता है और कर्मेन्द्रियों से अनासक्त रहता है। इसके द्वारा कर्मयोग शुरू करता है, वह श्रेष्ठ (विशिष्यते) है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक एक सच्चे कर्मयोगी की विशेषता है। वह कर्मों को नहीं छोड़ता, बल्कि नियंत्रित मन के द्वारा इंद्रियों को वश में करके, आसक्ति के बिना कर्म करता है (असक्तः)। करता है। यह बाहरी त्याग से बहुत ऊँचा है।

श्लोक 8:

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः। शरीरियात्रापी च ते न प्रसिद्धेदकर्मणः ॥ 8

अर्थ: तुम्हें तय किया हुआ काम करना चाहिए, क्योंकि काम न करने से काम करना बेहतर है। सबसे अच्छा है। अगर तुम कर्म नहीं करोगे, तो तुम्हारी शरीर की यात्रा (जीवन का निर्वाह) भी मुमकिन नहीं होगी।

विश्लेषण: Bhagavat Gita श्री कृष्ण अर्जुन को उसके तय किए गए काम (धर्म) का पालन करने का आदेश देते हैं। जीवन को बनाए रखने के लिए कर्म भी ज़रूरी है। इससे साबित होता है कि अकर्म मुमकिन नहीं है।

श्लोक 9:

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबंधनः। तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचार ॥9

अर्थ: यज्ञ के उद्देश्य से किए गए कर्मों के अलावा, यह संसार अन्य कर्मों में बंध जाता है। इसलिए, हे कौन्तेय, तुम आसक्ति से मुक्त होकर उस यज्ञीय कर्म को अच्छी तरह से करो।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक कर्म के बंधन से मुक्ति का सिद्धांत बताता है। यज्ञ का अर्थ है निस्वार्थ भाव से किया गया कर्तव्य या लोक कल्याण के लिए किया गया कार्य। जो कार्य फल की आसक्ति से नहीं, बल्कि कर्तव्य (यज्ञार्थ) से किया जाता है, उससे कोई बंधन नहीं होता।

सृष्टि चक्र और यज्ञ का कर्तव्य (श्लोक 10-11)

यज्ञ के ज़रिए कर्म करने की बात समझाने के लिए, श्री कृष्ण सृष्टि के नियमों के बारे में बात करते हैं।

श्लोक 10:

सहयज्ञ प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन परनशिष्यध्वमेष वोस्त्विष्टकामधुक ॥ 10

अर्थ: सृष्टि की शुरुआत में, भगवान ब्रह्मा ने यज्ञ के साथ लोगों को बनाया और कहा: तुम यज्ञ से बढ़ो, और यह यज्ञ तुम्हारी इच्छाओं को पूरा करे।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यज्ञ (कर्तव्य की भावना) दुनिया को चलाने का मूल नियम है। ब्रह्मा ने इंसानों को कर्तव्य (यज्ञ) के साथ ही बनाया है। हर व्यक्ति को यज्ञ (यज्ञ का हिस्सा) करके दुनिया को बचाना है।

श्लोक 11:

देवान्भवयतने ते देवा भावयन्तु वः। सप्तरम्बं भावयन्त्ः श्रेयः परमावाप्स्याथ ॥ 11

अर्थ: तुम इस (यज्ञ) से देवताओं को खुश करो, और वे देवता तुम्हें खुश करेंगे। इस तरह, एक-दूसरे का पोषण करके, तुम परम कल्याण को प्राप्त करोगे।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक सामूहिक कर्तव्य (सहयोग) के महत्व को समझाता है। यहाँ देवता प्रकृति की शक्तियों के प्रतीक हैं। यज्ञ के माध्यम से, मनुष्य प्रकृति का सम्मान करता है, और प्रकृति मनुष्य की ज़रूरतों को पूरा करती है। पोषण देती है। यह ‘परस्परं भावयन्तः’ (एक बीज को पोषण देना) ही सच्चा कर्मयोग है।

निष्कर्ष: कर्म योग एक व्यावहारिक धर्म है

Bhagavat Gita के तीसरे अध्याय के ये शुरुआती श्लोक अर्जुन का भ्रम दूर करते हैं और उसे कर्म योग की ओर ले जाते हैं। इसे जीवन का एक प्रैक्टिकल और ज़रूरी तरीका बताते हैं। श्री कृष्ण यह साफ़ करते हैं कि सिर्फ़ शारीरिक त्याग पाखंड है, जबकि मानसिक आसक्ति का त्याग। कर्तव्य से कर्तव्य करना ही मोक्ष का एकमात्र सच्चा रास्ता है, जो संसार चक्र के साथ भी चलता है।

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