Bhagavat Gita (भागवद गीता) : गीता के सोलहवाँ अध्याय के श्लोक 17 से 24 तक का गहन विश्लेषण

भगवद् गीता: अध्याय सोलहवाँ (दैवासुरसम्पद्विभाग योग) – श्लोक 17 से 24: पाखंड, ईश्वर का अनादर और नरक के तीन द्वारों का रहस्य

Bhagavat Gita के सोलहवें अध्याय के इन अंतिम श्लोकों में, “दैवासुरसम्पद्विभाग योग” शीर्षक के अंतर्गत, भगवान कृष्ण आसुरी प्रवृत्ति वालों की जीवनशैली का अंतिम और मार्मिक चित्रण करते हैं। श्लोक 17 से 20 में, भगवान पाखंड, मोह और अभिमान के कारण आसुरी प्रवृत्ति वालों के पतन का वर्णन करते हैं। श्लोक 21 से 24 में, भगवान मानवता को विनाश से बचाने के लिए नरक के तीन महाद्वारों की चेतावनी देते हैं और शास्त्रों के सिद्धांतों को जीवन का आधार बनाने का अंतिम और महत्वपूर्ण उपदेश देते हैं।

ये श्लोक आसुरी मार्ग के भयानक परिणामों और मानव जाति के लिए मोक्ष मार्ग का स्पष्ट वर्णन करते हैं।

खंड 1: आसुरी प्रवृत्तियों का पाखंड और अभिमान (श्लोक 17, 18)

Bhagavat Gita पिछले श्लोकों में आसुरी प्रवृत्तियों की अनंत इच्छाओं का वर्णन करने के बाद, अब भगवान उनकी पाखंडी उपासना पद्धतियों और अभिमानी स्वभाव को उजागर करते हैं।

1.1. श्लोक 17 का विस्तृत विश्लेषण: पाखंडी उपासना और अभिमान

आत्मसंवितः सत्धा धनमानमदन्वितः यजन्ते नामयज्ञस्ते दम्भेविधिपूरकम् ||17||

अर्थ: वे आत्म-प्रशंसित (आत्मसंभविताः), जड़ (स्तूंध) और धन, अभिमान तथा मद में आसक्त होते हैं। वे नाम-जप, पाखंड और शास्त्र-विरुद्ध धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से पूजा और यज्ञ करते हैं।

विस्तृत व्याख्या:

Bhagavat Gita आत्मसंभविताः (स्व-स्तूंध): आसुरी व्यक्ति स्वयं को महान समझता है। वह दूसरों की महानता या ज्ञान को स्वीकार नहीं कर पाता और निरंतर आत्म-प्रशंसा और दूसरों से प्रशंसा चाहता रहता है।

स्तूंध: वह इतना अहंकारी होता है कि उसमें विनम्रता का अभाव होता है। वह गुरु, शास्त्र या ऋषि के वचनों को सुनने को तैयार नहीं होता। वह अपने ही मत को परम सत्य मानकर “कठोर” हो जाता है।

धन, अभिमान और मद: ये तीन भौतिक तत्व उसके नशे हैं। वह धन, अभिमान और इनसे उत्पन्न अहंकार में पूरी तरह डूबा रहता है।

नामयाजने: दंभेन (केवल नाम के लिए यज्ञ): उनके यज्ञ या धार्मिक क्रियाएँ केवल दिखावा मात्र हैं। वे नाम, यश या धन के लिए यज्ञ करते हैं। इन यज्ञों में भावना का अभाव होता है।

अविधिपुरगम (कर्मकांड रहित): राक्षसी लोग शास्त्रों के कर्मकांडों या नियमों में विश्वास नहीं करते। वे शास्त्रों के नियमों का उल्लंघन करते हुए अपनी इच्छा से यज्ञ करते हैं, क्योंकि उनका उद्देश्य केवल दिखावा करना होता है।

1.2. श्लोक 18 का विस्तृत विश्लेषण: अहंकार, शक्ति और घृणा

अहंकारं बलं दर्पं काम क्रोधं च संश्रितः। ममात्मापरदेहेषु प्रद्विसन्तोभ्यसूयः ||18||

अर्थ: (वे) अहंकार, बल, अहंकार, काम और क्रोध से घिरे रहते हैं। वे अपने और दूसरों के शरीर में विद्यमान परमात्मा से घृणा करते हैं और ईश्वरीय सत्ता को बदनाम करते हैं।

विस्तृत व्याख्या:

Bhagavat Gita अहंकार, बल, अहंकार, काम और क्रोध: ये पाँच मुख्य अवगुण इन राक्षसी व्यक्तियों के आंतरिक स्वभाव को घेरे रहते हैं। ये गुण उन्हें निरंतर अधर्म की ओर धकेलते हैं। उनकी शक्ति का उपयोग धर्म के लिए नहीं, बल्कि विनाश और स्वार्थ के लिए होता है।

माम् आत्मपारदेषु प्रविसंता: यह राक्षसी स्वभाव का सबसे भयानक दोष है। भगवान कृष्ण कहते हैं कि वे राक्षसी व्यक्ति मेरे अस्तित्व को नकारते हैं।

राक्षसी व्यक्ति अपने शरीर को ही सब कुछ मानता है और अपने हृदय में ईश्वर (आत्मा) का अपमान करता है।

वे दूसरों के शरीर में विद्यमान परमात्मा को भी स्वीकार नहीं करते, और इसलिए अन्य जीवों का शोषण करते हैं, जो ईश्वरीय तत्व के प्रति घृणा है।

अभ्यासूयक: (आलोचनात्मक): राक्षस न केवल ईश्वर का तिरस्कार करते हैं, बल्कि दिव्य शक्तियों, ऋषियों और शास्त्रों का भी अपमान करते हैं। ईर्ष्या और द्वेष से प्रेरित होकर, वे सद्गुणों को सहन नहीं कर पाते।

खंड 2: आसुरी शक्तियों का अवश्यंभावी पतन (श्लोक 19, 20)

भगवान अब जन्म-मृत्यु के चक्र और आसुरी शक्तियों के अवश्यंभावी पतन के बारे में चेतावनी देते हैं।

2.1. श्लोक 19 का विस्तृत विश्लेषण: पुनर्जन्म का कठोर चक्र

तनः द्विशातः कृष्णसारेशु नाराधमन। कृषिपण्यजश्रमशुभनासूरीष्वेव योणषु ॥19

अर्थ: मैंने इन घृणित, क्रूर, दुष्ट और नीच मनुष्यों (नराधम) को संसार (जन्म-मृत्यु के चक्र) में बार-बार राक्षसी योनियों में डाला है।

विस्तृत व्याख्या:

Bhagavat Gita नराधम (मनुष्यों में सबसे निम्न): यद्यपि वे मानव शरीर में जन्म लेते हैं, फिर भी अपने क्रूर और घृणित कर्मों के कारण मनुष्य के रूप में जीने के अयोग्य हैं। वे मानवता के निम्नतम स्तर पर हैं।

ईश्वरीय नियम: यहाँ ईश्वर अपने नियम को स्पष्ट करते हैं। जो लोग निरंतर ईश्वर से घृणा करते हैं और क्रूरता करते हैं, वे हमेशा के लिए निम्न श्रेणी में चले जाते हैं।

राक्षसी योनियों में बार-बार जन्म: राक्षसी लोगों की आसक्ति और क्रूरता इतनी प्रबल होती है कि मृत्यु के बाद उन्हें उच्च लोक में स्थान नहीं मिलता। वे बार-बार राक्षसी प्रवृत्ति वाले परिवारों में या ऐसे जन्मों में पुनर्जन्म लेते हैं जहाँ अत्यधिक दुख और आसक्ति होती है। यह उनकी अपनी प्रवृत्तियों का परिणाम है। यह ईश्वर का प्रतिशोध नहीं, बल्कि कर्म का अटल नियम है।

2.2. श्लोक 20 का विस्तृत विश्लेषण: पतन की अंतिम सीमा

आसुरी योनिमापन्ना मूढ़ जन्मनि जन्मनि। ममप्रपयैव कौन्तेय ततो यन्त्यदहं गतिम् ॥20

अर्थ: हे कौन्तेय (अर्जुन), ये अज्ञानी लोग, जो बार-बार आसुरी दुनिया में जन्म लेते हैं, मुझे (परमात्मा को) प्राप्त किए बिना और भी निम्न गति (अधम गतिम्) को प्राप्त होते हैं।

विस्तृत व्याख्या:

Bhagavat Gita मूढः (अज्ञानी): तीक्ष्ण बुद्धि होने पर भी आसुरी लोग आत्मज्ञान से अनभिज्ञ रहते हैं। उन्हें ज्ञान प्राप्त नहीं होता, इसलिए उनकी स्थिति में सुधार नहीं होता।

माम् अपार्यैव (परमात्मा की अनुपलब्धता): आसुरी लोगों का जीवन परमात्मा की ओर उन्मुख नहीं होता। वे निरंतर सुख और स्वार्थ में डूबे रहते हैं, इसलिए उनके लिए परमात्मा को प्राप्त करना संभव नहीं है।

अधम गतिम् (निम्नतम गति): बार-बार आसुरी दुनिया में जन्म लेने और क्रूरता करने से, उनके आचरण और विचार अधिकाधिक पतित होते जाते हैं। परिणामस्वरूप, वे जीवन में और अधिक पतन की ओर धकेले जाते हैं, जहाँ दुख और अज्ञान उनकी पराकाष्ठा है।

खंड 3: नरक के तीन द्वार और चेतावनी (श्लोक 21, 22)

सबसे भयानक राक्षसी गतिविधियों का वर्णन करने के बाद, भगवान कृष्ण अब मानवता को विनाश से बचाने के लिए एक अंतिम और निर्णायक चेतावनी देते हैं।

3.1. श्लोक 21 का विस्तृत विश्लेषण: विनाश के त्रिविध द्वार

नाशनमात्मनः त्रिविधं नरकस्येदं वर। कामः क्रोधस्थथा लवस्तसमादेत्तत्रयं त्यजेत् ॥21

अर्थ: नरक के तीन द्वार हैं जो आत्मा का नाश करते हैं: काम, क्रोध और लोभ। इसलिए, इन तीनों का त्याग कर देना चाहिए।

विस्तृत व्याख्या:

Bhagavat Gita त्रिविधं नरकश्य द्वारम्: काम, क्रोध और लोभ आसुरी प्रवृत्तियों के मूल स्तंभ हैं। ये गुण व्यक्ति को अधर्म की ओर ले जाते हैं और उसे आंतरिक रूप से नष्ट कर देते हैं।

काम: (वासना): भोग और स्वार्थ की अनियंत्रित इच्छा।

क्रोध: (क्रोध): काम की अतृप्त इच्छा से उत्पन्न क्रोध, जो बुद्धि का नाश करता है।

लोभ: (लोभ): संग्रह करने और दूसरों पर प्रभुत्व स्थापित करने की अंतहीन इच्छा, जो अधर्म को जन्म देती है।

नाशन: आत्मा: (आत्मा का विनाश): ये गुण आत्मा का नाश नहीं करते, बल्कि आत्मा के सच्चे ज्ञान, शांति और आनंद का नाश करते हैं। ये आत्मा को ऐसे बंधन में फँसा देते हैं कि मुक्ति का मार्ग असंभव हो जाता है।

त्याग का आह्वान: आसुरी प्रवृत्तियों से मुक्त होने का एकमात्र उपाय इन तीन महान दुर्गुणों का पूर्णतः त्याग करना है।

3.2. श्लोक 22 का विस्तृत विश्लेषण: मुक्ति का मार्ग

एतैर्विमुक्त कौन्तेय तमोदावैरिस्त्रिभिर्नर। आचार्यात्मनः श्रेयस्थतोजा परम गतिम् ॥22

अर्थ: हे कौन्तेय, जो व्यक्ति अंधकार के इन तीन द्वारों से मुक्त हो जाता है, वह अपने कल्याण (आत्मा: श्रेय:) के लिए कर्म करता है और फिर परम मोक्ष प्राप्त करता है।

विस्तृत व्याख्या:

Bhagavat Gita अंधकार के द्वारों से मुक्ति: काम, क्रोध और लोभ का त्याग करने के बाद, व्यक्ति का जीवन धर्म और सदाचार की ओर उन्मुख हो जाता है।

कर्म: आत्मा: श्रेय: (स्व-लाभ): आसुरी लोग स्वार्थ और विनाश के लिए कर्म करते हैं, जबकि इन तीन विकारों से मुक्त व्यक्ति अब अपने परम कल्याण (मोक्ष) के लिए कर्म करता है। उसके कर्म दैवी संपदा के गुणों द्वारा निर्देशित होते हैं।

परम गतिम्: आत्म-कल्याण के लिए किए गए कर्मों का अंतिम परिणाम यह है कि व्यक्ति सर्वोत्तम और सर्वोच्च मार्ग (मोक्ष) प्राप्त करता है, जहाँ पुनर्जन्म का दुःख समाप्त हो जाता है।

खंड 4: पवित्रशास्त्र का महत्व – अंतिम शिक्षा (श्लोक 23, 24)

अंतिम श्लोकों में, भगवान जीवन के परम और निर्णायक सिद्धांत की स्थापना करते हैं, जो दैवी और आसुरी मार्गों के बीच के अंतर को स्पष्ट करता है।

4.1. श्लोक 23 का विस्तृत विश्लेषण: शास्त्र का अज्ञान

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः न सिद्धिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः। न तो स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परम गतिमे ॥23

अर्थ: जो व्यक्ति शास्त्रों के नियमों का त्याग कर केवल अपनी इच्छाओं (कामकरत:) के अनुसार कार्य करता है, वह सिद्धि, सुख या परमपद प्राप्त नहीं कर सकता।

विस्तृत व्याख्या:

Bhagavat Gita शास्त्रविधिं उत्सर्ज्य (शास्त्रों के नियमों का त्याग): जो व्यक्ति वेद, गीता और अन्य धार्मिक ग्रंथों द्वारा निर्धारित नैतिक और धार्मिक नियमों का त्याग करता है, वह आसुरी पुरुषों के समान है।

सम्राटः वरतेते (मनमाना आचरण): वे केवल अपनी अनियंत्रित इच्छाओं और मन के आवेगों के अनुसार कार्य करते हैं।

असफलता का त्रय: जो लोग शास्त्रों का उल्लंघन करते हैं, उन्हें तीन चीजें प्राप्त नहीं होतीं:

सिद्धि: कार्यों में सफलता या इच्छित परिणाम प्राप्त नहीं होते।

सुखम्: आंतरिक शांति या सच्चा सुख प्राप्त नहीं होता।

परम गतिम्: अंतिम मुक्ति या परमपद प्राप्त नहीं होता।

4.2. पद 24 का विस्तृत विश्लेषण: जीवन का आधार

तस्माच्छस्त्रं प्रमाणं ते कार्यकार्यवस्तिथः। ज्ञानत्व शास्त्रविधानोक्तं कर्तुमिहर्षि ॥24ll

अर्थ: अतः कर्म और अकर्म पर नियंत्रण रखने के लिए शास्त्र ही तुम्हारे परम अधिकारी हैं। शास्त्रों में वर्णित कर्तव्य को जानकर ही तुम उस कर्तव्य को करने के योग्य बन सकते हो।

विस्तृत व्याख्या:

Bhagavat Gita शास्त्र प्रमाणम् (शास्त्र ही अधिकारी हैं): यह सोलहवें अध्याय का अंतिम और सबसे प्रबल उपदेश है। मनुष्य को क्या करना है (कर्म) और क्या नहीं करना है (अकर्म) इसका निर्णय अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि शास्त्रों के आधार पर करना चाहिए। शास्त्र ही मार्गदर्शक हैं।

कर्तव्य: शास्त्रों के नियमों को जानकर मनुष्य को ईश्वरीय अधिकार के अनुसार अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। ये कर्म उसे परम लक्ष्य की ओर ले जाएँगे।

अंतिम संदेश: ईश्वरीय चुनाव

Bhagavat Gita का यह सोलहवाँ अध्याय मानवता के लिए एक मार्गदर्शक है। यह स्पष्ट करता है कि दैवी गुण मोक्ष का मार्ग हैं, जबकि आसुरी गुण बंधन का मार्ग हैं। काम, क्रोध और लोभ का त्याग करके और शास्त्रों को जीवन का आधार बनाकर, व्यक्ति अपने परम लक्ष्य, मोक्ष की ओर अग्रसर हो सकता है।

यह अध्याय हमें अपने भीतर के असुर को पहचानने और दैवी गुणों को विकसित करने की शिक्षा देता है।

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