Bhagavat Gita (भागवद गीता) :गीता के पंद्रहवें अध्याय के श्लोक 1 से 7 तक का गहन विश्लेषण

भगवद गीता: अध्याय पंद्रहवें (पुरुषोत्तम योग) – श्लोक 1 से 7 का गहन विश्लेषण

Bhagavat Gita आज हम भगवद गीता के पंद्रह में अध्याय के पहले सात श्लोकों – ‘पुरुषोत्तम योग’ के गहरे ज्ञान पर बात करेंगे। नज़रें हटा लेंगे। इस चैप्टर में भगवान श्री कृष्ण पूरी सृष्टि के मूल रहस्य, दुनिया में इंसान के बंधन को समझाते हैं। इसमें प्रकृति और परम तत्व को पाने के रास्ते का अद्भुत वर्णन मिलता है। ये सात श्लोक आत्म-ज्ञान और त्याग की मज़बूत नींव बनाते हैं।

1.जीवन के वृक्ष का अद्भुत उदाहरण (श्लोक 1)

श्लोक 1:

श्री भगवान कहते हैं: उर्ध्वमूलमध शाखामश्वतं प्राहुर्व्यम्। छन्दांसि यस्य पर्नानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥1

अर्थ: श्री भगवान ने कहा: इस दुनिया को एक काले पेड़ के रूप में बताया गया है, जिसकी जड़ें ऊपर की ओर और शाखाएँ नीचे की ओर हैं। इसके पत्तों में वेदों के श्लोक (मंत्र) हैं। जो इस पेड़ को जानता है, वह वेदों का जानकार है।

Bhagavat Gita यहाँ श्री कृष्ण दुनिया को एक पीपल के पेड़ के रूप में बताते हैं जिसकी जड़ें उल्टी हैं। यह एक बहुत ही शक्तिशाली उदाहरण है।

उर्ध्वमूलम् (जड़ के ऊपर): जड़ पेड़ का पोषण करने वाला तत्व है। ऊपर की ओर मूल होने का मतलब यह है कि इस दुनिया का मूल, यानी इसका सहारा और स्रोत, परम ब्रह्म (ईश्वर) है। जो इस भौतिक सृष्टि से ऊपर सर्वोच्च और अव्यक्त है।

अधा:शाखाम् (नीचे की शाखाएँ): नीचे की ओर फैली हुई शाखाएँ, जो धरती पर अलग-अलग लोकों (ब्रह्मलोक, देवलोक, इंसानी दुनिया वगैरह) तक पहुँचती हैं और ज़िंदगी की मुश्किलों को दिखाती हैं।

अव्यायाम (अव्यानाशी): इस पेड़ को अविनाशी इसलिए कहा गया है क्योंकि जब तक जीव अज्ञान में रहता है, तब तक वह अपने चक्र से मुक्त नहीं होता। जीवों के लिए, इस पेड़ का चक्र युगों-युगों तक लगातार चलता रहता है।

छिदांसी यस्य पर्नानी (पाण्डड़ां वेद): पत्तियाँ सूरज की रोशनी से पेड़ को पोषण देती हैं। वेदों के कर्म और फल आत्मा को इस दुनिया में बाँधे रखते हैं, क्योंकि लोग स्वर्ग जाना चाहते हैं। इच्छा से काम करते हैं और दोबारा जन्म लेते हैं।

वेदवित्त् (वेदों का जानकार): वेदों का सच्चा जानकार वह नहीं है जो सिर्फ़ मंत्र जानता है, बल्कि वह है जो दुनियावी पेड़ के बंधन को समझता है और मुक्ति का रास्ता जानता है।

2.पेड़ का विस्तार और सीमा निर्धारण (श्लोक 2)

श्लोक 2:

अधाशोर्ध्वम प्रस्तास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विशेषप्रवालाःअध्श्च मूलान्यनुसंततानी कर्मनुबंधिनी मुष्णलोके ॥2

अर्थ: इस पेड़ की शाखाएँ नीचे की तरफ भी फैली हुई हैं और ऊपर की तरफ भी, जो तीनों गुणों (सत्व, रजस, तमस) से बनी हैं। यह पोषण देने वाला है, और इंद्रियों के विषय इसकी कोमल पत्तियाँ (अंकुर) हैं। इसकी जड़ें (दूसरी जड़ें) भी नीचे की तरफ इंसानी दुनिया में फैली हुई हैं, जिससे कर्म का बंधन होता है।

Bhagavat Gita ये श्लोक पेड़ की ग्रोथ और कॉम्प्लेक्सिटी को समझाते हैं:

शाखाओं का विस्तार: शाखाएँ न केवल नीचे बल्कि ऊपर भी फैली हुई हैं, जो अलग-अलग जीवों (इंसान, देवता, जानवर आदि) और ब्रह्मांड के अलग-अलग लोगों को दिखाती हैं। कृष्ण ने कहा।

गुणप्रवृद्ध (गुणों से पोषित): ये शाखाएं तीन गुणों – सत्व, रजस और तमस से पोषित होती हैं, जो जीवन का स्वभाव और कर्म का चुनाव तय करते हैं।

विषयप्रवालाः (विषय रूपी अंकूरो): इंद्रियों के विषय (रूप, स्वाद, गंध, स्पर्श, ध्वनि) इन शाखाओं पर होते हैं। अंकुर होते हैं। ये विषय आत्मा को आकर्षित करते हैं और उसे दुनिया में और गहराई से शामिल करते हैं।

कर्मानुबंधिनी मूलानि (कर्म से बंधी जड़ें): नीचे की ओर फैली जड़ें इंसान के कर्म हैं। इंसानी दुनिया में किए गए सकाम कर्म (फल की उम्मीद वाले कर्म) नए बीज बोते हैं, जिससे नए जन्म और नए बंधन होते हैं।

3.मुक्ति के लिए त्याग का हथियार (श्लोक 3-4)

Bhagavat Gita अगले दो श्लोक मोक्ष का रास्ता दिखाते हैं।

श्लोक 3: वृक्ष का असली रूप और काटना

न रूपमस्ये तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्ना च संप्रतिष्ठा।अश्वत्थमेनं सुविरुधमूलं असंगशस्त्रेण धारेण छित्त्वा ॥3

अर्थ: इस संसार वृक्ष का असली रूप यहाँ (इस भौतिक संसार में) नहीं जाना जा सकता – न इसका अंत है, न इसकी कोई शुरुआत है, न इसकी उत्पत्ति है। इस मजबूत जड़ वाले अश्वत्थ वृक्ष को दृढ़ निश्चयी त्याग (अनासक्ति) के शक्तिशाली हथियार से नष्ट कर दिया गया। इसे काट देना चाहिए।

असली रूप की प्राप्ति न होना: संसार का रूप भ्रामक है। भले ही हम अपना पूरा जीवन बिता दें, हम इसकी असली उत्पत्ति, शुरुआत या अंत नहीं जान सकते। यह लगातार बदल रहा है।

सुद्रधमूलम् (सुद्रधा मूल): जीव के मन और हृदय में मौजूद आसक्ति और अज्ञान ही इस वृक्ष की बहुत मजबूत जड़ है। माँ ने कहा।

असख़्ङ्गशस्त्रेन (अनासक्ति रूपी हथियार): इस बंधन को तोड़ने का एकमात्र तरीका है – वैराग्य। यह तभी मजबूत होता है जब कर्मों से फल मिलने की उम्मीद छोड़ दी जाए और दुनिया की चीज़ों के प्रति राग-द्वेष छोड़ दिया जाए। जड़ काटी जा सकती है।

श्लोक 4: अंतिम मंज़िल की खोज करो

तथा पदं तत्परिमार्गिताव्या यसमिंग्ता न निवर्तन्ति भूयः। तमेव चाद्याम पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणि ॥4

अर्थ: उसके बाद उस अंतिम स्थान की खोज करनी चाहिए, जहाँ पहुँचने के बाद वापस आने की ज़रूरत नहीं होती। और उस आदि पुरुष (ईश्वर) की शरण लेनी चाहिए जिससे यह अनंत क्रिया (सृष्टि का चक्र) शुरू होता है। फैला हुआ है।

Bhagavat Gita एक बार त्याग के हथियार से दुनिया के बंधन कट जाएं, तो सिर्फ़ कर्म का त्याग ही बचता है। પૂરતો નથી. ऊंचा लक्ष्य होना ज़रूरी है:

न निवर्तान्ति भूयः (क्रोध से वापस न आना): मुक्ति का लक्ष्य ऐसा है। यह परम धाम है, जहां जाने के बाद आत्मा को पुनर्जन्म के चक्र में वापस नहीं आना पड़ता।

आद्यं पुरुषं प्रापद्ये (आदि पुरुष के प्रति समर्पण): इस लक्ष्य को पाने के लिए, मैंने आदि पुरुष, परमात्मा को जिया, श्री कृष्ण की ही शरण लेनी चाहिए। वही पूरे ब्रह्मांड का मूल स्रोत हैं।

4.परम पद पाने के गुण (श्लोक 5)

श्लोक 5:

निर्माणमोहा जितसंगदोष अध्यात्मनित्य विनिवर्तकामाः।द्वंद्वैर्विमुक्तः सुखधुःखसंज्ञ्यार्गचंत्यमूधाः पद्मव्यायं तत् ॥5

अर्थ: जो घमंड और आसक्ति से मुक्त हैं, जिन्होंने आसक्ति की बुराई को जीत लिया है, जिन्होंने आत्म-ज्ञान पा लिया है। जो स्थिर हैं, जिनकी इच्छाएँ समाप्त हो गई हैं, और जो सुख-दुःख के द्वंद्व से मुक्त हैं, केवल ज्ञानी ही उस अविनाशी परम पद को प्राप्त करते हैं।

Bhagavat Gita भगवान यहाँ स्पष्ट करते हैं कि जो योगी या भक्त त्याग के हथियार का उपयोग करके मुक्ति प्राप्त करता है, उसके जीवन में क्या गुण होने चाहिए:

निर्माण-मोह (घमंड और आसक्ति से मुक्त): अपनी महानता का झूठा विश्वास इस भौतिक दुनिया के सत्य के प्रति घमंड और आसक्ति छोड़ दें।

जित्त्त्त्त्त्गदोष (आसक्ति के दोष पर विजय): भौतिक संबंधों और चीजों के प्रति लगाव और द्वेष की भावना पर विजय प्राप्त करें।

अध्यात्मनित्य (आत्म-ज्ञान में दृढ़): आत्मा के स्वरूप का लगातार चिंतन करना और परम तत्व में स्थित होना। स्थिर रहना।

विनिवृत्तकामाः (इच्छाओं से रहित): सभी भौतिक इच्छाओं को त्याग देना।

द्वंद्वार्विमुक्तः (द्वंद्व से मुक्त): सुख-दुख, मान-अपमान, सर्दी-गर्मी जैसे जीवन के द्वंद्वों में समान रहना।

गच्चन्त्यामूधाः (ते परम पद पामे छे): ऐसे अमूढ़ (अमूध) मनुष्य ही परम और अविनाशी धाम को प्राप्त करते हैं।

5.ભગવાનનું પરમ ધામ (શ્લોક 6)

श्लोक 6:

न तद्भास्यते सूर्यो न शशांको न पावकः। यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥6

अर्थ: मेरा वह परम धाम, जिसे न तो सूर्य, चंद्रमा और न ही अग्नि प्रकाशित कर सकते हैं, वहीं जाओ और अपना जीवन वापस पाओ। मैं इस दुनिया में कभी वापस नहीं आता, वही मेरा परम धाम है।

Bhagavat Gita भगवान अपने धाम का वर्णन करते हैं, जो इस भौतिक दुनिया से बिल्कुल अलग है:

न तद्भासयते सूर्यो: अ भौतिक दुनिया सूर्य, चंद्रमा और अग्नि के प्रकाश पर निर्भर है, लेकिन भगवान का धाम स्वयं प्रकाशित है। यह प्रकाश के किसी बाहरी स्रोत पर निर्भर नहीं है।

परमं मम धाम: यह परम धाम है जो भगवान का सबसे ऊंचा धाम है। इस स्थान की प्राप्ति ही मोक्ष है।

6.जीवन का स्वरूप और संघर्ष (श्लोक 7)

श्लोक 7:

ममैवांशो जीवभूतः सनातनः जीवों के। मनःसष्ठानिन्द्रियाणि प्रकृति स्थान आकर्षण ॥7

अर्थ: इस जीव जगत (फिजिकल दुनिया) में जो सनातन आत्मा है, वह मेरा ही एक हिस्सा है। लेकिन मैटेरियल नेचर में होने की वजह से, वह मन समेत छह इंद्रियों से कड़ा संघर्ष करती है।

Bhagavat Gita यह श्लोक इंसान के बेसिक नेचर को समझाता है और उसके संघर्ष का कारण बताता है:

मैटेरियल वंशज जीवलोके (मेरा हिस्सा): सबसे ज़रूरी मैसेज यह है कि हर जीव (आत्मा) परमात्मा (भगवान) का एक सनातन हिस्सा है। एक हिस्सा है। स्पिरिचुअली, जीव और भगवान का एक ही डिवाइन नेचर होता है।

प्रकृतिस्थानि कटि (नेचर में संघर्ष): हालांकि, मैटेरियल दुनिया में होने की वजह से, आत्मा शरीर से जुड़ी हुई है। वह मन (छठी इंद्रिय) समेत पांचों इंद्रियों के साथ मैटेरियल नेचर में चीज़ों को महसूस करने के लिए ज़िम्मेदार है। कड़ा प्रयास करती है। यह संघर्ष ही दुख का कारण है।

सारांश: आत्मा दिव्य होने के बावजूद, शरीर और मन के साथ गलत संगति के कारण अपनी दिव्यता को भूल जाती है। दुनिया में जाकर संघर्ष करती है।

निष्कर्ष

Bhagavat Gita के 15वें चैप्टर के ये पहले सात श्लोक ज्ञान का सार बताते हैं।

  1. ज्ञान: दुनिया एक उल्टे पेड़ की तरह है, जिसकी जड़ में भगवान हैं। 2. फ़र्ज़: वैराग्य के हथियार से आसक्ति (संग) की गंदगी को काटना। 3. लक्ष्य: भगवान के परम धाम की तलाश करना। 4. रूप: आत्मा परमात्मा का एक दिव्य अंश है, लेकिन वह भ्रम के कारण संघर्ष करती है।

ये श्लोक हमें भौतिकवाद से खुद को आज़ाद करके, अपने असली दिव्य स्वरूप को पहचानकर और परमात्मा के सामने सरेंडर करके हमेशा की शांति पाने का साफ़ रास्ता दिखाते हैं।

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