Bhagavat Gita (भागवद गीता) :गीता के चौदहवें अध्याय के श्लोक 19 से 27 तक का गहन विश्लेषण

गुणाती आस्था: गुणों से मुक्ति का मार्ग और मोक्ष का आधार (गीता चौदहवें अध्याय 19-27)

Bhagavat Gita के चौदहवें अध्याय के आखिरी श्लोक, ‘गुणत्रय विकास योग’ (14.19-27) ज्ञान योग में सबसे ऊंचे हैं। टारगेट पर रोशनी डालते हैं। पिछले श्लोकों (14.1-18) में, श्री कृष्ण ने तीनों गुणों (सत्व, रजस, तमस) के रूप, बंधन और गति के बारे में बताया है। समझाया।

Bhagavat Gita अब, इस आखिरी हिस्से में, भगवान वह रास्ता दिखाते हैं जिससे इंसान इन गुणों के बंधन से आज़ाद हो सकता है। થઈ શકે છે. वह गुणातीत पुरुष (जो गुणों से आगे निकल गया है) के गुणों के बारे में विस्तार से बताते हैं, और आखिर में अव्यभिचारिणी भक्ति (अटूट भक्ति) को इस पारलौकिक अवस्था को पाने का सबसे अच्छा तरीका बताया है। पूरे चैप्टर की समरी देते हैं।

1.गुणों के बंधन से मुक्ति का मार्ग (श्लोक 19-20)

Bhagavat Gita भगवान स्पष्ट करते हैं कि मोक्ष का मार्ग केवल गुणों को जानना नहीं, बल्कि उनसे ऊपर उठना है।

श्लोक 19:

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति। गुणेभ्याश्च परम वेत्ति मद्भावं सोधिगच्छति ॥ 19

अर्थ: जब ज्ञानी द्रष्टा गुणों के अतिरिक्त किसी अन्य कर्ता को नहीं देखता (अर्थात् समस्त कर्म गुणों द्वारा ही होते हैं। के द्वारा ही होता है), तथा गुणों से परे (विभाजित) ईश्वर को जानता है – तब वह मेरे भाव को प्राप्त होता है।

श्लोक 20:

गुणेतनातित्य त्रिन्देहि देहसमुद्भवन्। जन्म मरण मरण 20

अर्थ: शरीर को उत्पन्न करने वाले इन तीनों गुणों से परे होकर देहधारी आत्मा जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था को प्राप्त होता है। तथा समस्त दुखों से मुक्त होकर अमरता (मोक्ष) को प्राप्त होता है।

विश्लेषण : Bhagavat Gita असली विषय: श्लोक 19 ज्ञान योग के बेसिक प्रिंसिपल को दोहराता है: गुण जा कर्म करता है। आत्मा सिर्फ़ एक गवाह है। जब कोई इंसान इस सच्चे सच को समझ जाता है, तो वह ईश्वर को पहचान लेता है जो गुणों से परे है और ईश्वर के रूप को पा लेता है।

मोक्ष का नतीजा: श्लोक 20 साफ़ तौर पर बताता है कि इन गुणों को पार करने से जन्म और मृत्यु के रूप में दुख होगा। इंसान चारों बंधनों से आज़ाद हो जाता है और अमरता (अमृतम) का अनुभव करता है।

2.एक पारलौकिक मनुष्य के लक्षण (श्लोक 21-25)

Bhagavat Gita अब अर्जुन पूछते हैं कि गुणों से परे हुए मनुष्य के क्या लक्षण होते हैं, और वे कैसे व्यवहार करते हैं। भगवान इस प्रकार उत्तर देते हैं:

श्लोक 21:

अर्जुन उवाच। करिलिंगास्त्रिंगुनेतानेतितो भावती प्रभो। किमाचारः कतं चैतांस्त्रींगुणनतिवर्तते ॥21

अर्थ: अर्जुन ने कहा: हे प्रभु! इन तीन गुणों से परे हुए मनुष्य के क्या लक्षण (कैरलियैगैः) होते हैं? उसका व्यवहार कैसा होता है? और वह इन तीन गुणों से कैसे परे होता है?

श्लोक 22: अप्रकाश प्रवृत्तियों के प्रति उदासीनता

श्री भगवान कहते हैं। प्रकाशन च प्रवृन्तं च मोहमेव च पांडव। न दुष्ट-प्रेमी स्वभाव, न विनाशकारी इच्छा। 22

अर्थ: श्री भगवान ने कहा: हे पांडवों! (सत्व का कार्य) प्रकाश (ज्ञान), (रजस का कार्य) क्रिया (क्रिया) और (तमस का कार्य) आसक्ति (अज्ञान) – जब वे सक्रिय हो जाते हैं, तो वे घृणा (गुणातीत) नहीं करते और जब वे सेवानिवृत्त हो जाते हैं, तो वे इच्छा नहीं करते। (आकांक्षा) नहीं करते।

श्लोक 23: तटस्थता

उदासिवदादासिनो गुणैर्यो न विचलयते। गुण वर्तमान इत्येव योऽवतिष्ठति नेंगते ॥ 23

अर्थ: जो व्यक्ति उदासीन व्यक्ति (ततस्थ) की तरह स्थित है और गुणों से विचलित नहीं होता। वह यह जानने में दृढ़ रहता है कि केवल ‘गुण ही गुण माने जाते हैं’।

श्लोक 24: सुख और दुःख और सम्मान और अपमान में समानता

समदुःखसुखः स्वस्तः समलोष्टाश्मकांचनः। तुल्यप्रियप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मस्तुतिः॥ 24

अर्थ : जो सुख-दुःख में समान रहता है, आत्मा में स्थित है, जिसके लिए मिट्टी का ढेला, पत्थर और सोने के समान है, जो प्रिय और अप्रिय के प्रति समान है, धैर्यवान है, और निन्दा और प्रशंसा में समान है।

श्लोक 25: सब में समता

मनपमनयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्ररिपक्षयो। सर्वार्म्भपरित्यागी गुणातीतह स उच्यते ॥25

अर्थ : जो मान और अपमान में समान है, जो दोनों पक्षों, मित्र और शत्रु में समान है, और जो सभी कार्यों में समान है। जो आरंभ का त्याग करता है, उसे गुणातीत कहते हैं।

विश्लेषण : Bhagavat Gita अच्छे गुणों का आचरण (श्लोक 22): अच्छा आदमी निष्पक्ष साक्षी बन जाता है। जब सत्व, रजस और तम (ज्ञान, क्रियाकलाप के प्रति आसक्ति) गुण उसमें आते हैं, तो वह रोकने या पकड़ने की कोशिश नहीं करता। वह जानता है कि यह गुणों का काम है, आत्मा का नहीं।

तस्तत्ता (श्लोक 23): वह उदासीन है, यानी गुणों के खेल से विचलित नहीं होती। वह बस लगातार ‘गुण वरवंत इत्येयाव’ याद रखता है – गुण ही गुणों में चल रहे हैं।

समत्व (श्लोक 24-25): समत्व गुणाती पुरुष के मुख्य लक्षणों में सबसे ऊँचा है:

द्वंद्व से रहित: सुख-दुख, प्रिय-अप्रिय, मान-अपमान में समान।

विषयों में वैराग्य: मिट्टी, पत्थर और सोना उसके लिए समान हैं (आसक्ति का अभाव)।

निष्क्रियता: वह सभी कार्यों की शुरुआत (सर्वराम्भपरित्यागी) का त्याग करने वाला है। वह परिणाम पाने की आशा से कोई नया काम शुरू नहीं करता।

3.पारलौकिकता का मार्ग: भक्तियोग (श्लोक 26-27)

Bhagavat Gita अर्जुन का तीसरा प्रश्न था कि गुणों से कैसे पार हुआ जाए? भगवान इसका सबसे अच्छा उत्तर अंतिम दो श्लोकों में देते हैं।

श्लोक 26:

मां च योव्याभिचारेण भक्तियोगेन सेवते। स गुणान समतित्यातान ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥26

अर्थ: और जो व्यक्ति अनन्य (अव्याभिचारिणे) भक्ति से मेरी सेवा करता है – उसमें ये गुण अच्छे से होते हैं। पूर्णता (समतित्यायतान) प्राप्त करके व्यक्ति ब्रह्मभाव (मोक्ष) प्राप्त करने में सक्षम हो जाता है।

श्लोक 27:

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्यव्यस्य च। शावतस्य चा धर्मस्य सुखस्याकांतिकस्य च ॥ 27

अर्थ: ब्रह्म की प्रतिष्ठा के कारण अविनाशी अमृत, शाश्वत धर्म और शाश्वत सुख। (आश्रय) मैं हूँ।

विश्लेषण : Bhagavat Gita भक्तियोग की सबसे बड़ी खूबी: श्लोक 26 यह साफ़ है कि भक्तियोग गुणों से ऊपर उठने का सबसे आसान तरीका है। और सबसे अच्छा रास्ता दिखाता है।

अव्याभिचारिणी भक्ति: मतलब भगवान के प्रति अनोखी और अटूट भक्ति। जब आत्मा की शक्ति पूरी तरह से सिर्फ़ भगवान में लग जाती है, तो वह गुणों की आसक्ति से आज़ाद हो जाता है और आसानी से ऊपर उठकर ब्रह्मभाव को पा लेता है।

ब्राह्मण की शरण: श्लोक 27 में भगवान अपनी सबसे बड़ी जगह बताते हैं। वे खुद ही ब्रह्म का आधार (प्रतिष्ठा) हैं।

अमृत और धर्म: भगवान सिर्फ़ ब्रह्म की ही शरण नहीं हैं बल्कि अमरता, शाश्वत धर्म और सबसे बड़े सुख की भी शरण हैं। जो भक्त भगवान की अनोखी भक्ति करता है, उसे यह सब आसानी से मिल जाता है।

निष्कर्ष

Bhagavat Gita के चौदहवें अध्याय (14.19-14.27) के ये आखिरी श्लोक मोक्ष और परम भक्ति का तरीका हैं। इन ज़रूरी बातों का गहरा ज्ञान देते हैं:

मुक्ति का आधार: गुण कर्ता हैं और आत्मा अकर्ता है – इस अंतर को पहचानो। यही मुक्ति का आधार है। इससे आत्मा जन्म-मृत्यु के दुखों से मुक्त हो जाती है।

पारलौकिक जीवन: पारलौकिक इंसान का जीवन तटस्थता और बराबरी पर आधारित होता है। वह सुख-दुख, मान-अपमान और दोस्त-दुश्मन में एक जैसा रहता है।

सबसे अच्छा उपाय: गुणों के बंधन को तोड़ने का सबसे आसान और सीधा तरीका है अनोखी भक्ति योग। भक्ति से इंसान सीधे भगवान से जुड़ता है और आसानी से पारलौकिक अवस्था को पा लेता है।

आखिरी सहारा: श्री कृष्ण खुद ब्रह्म, अमरता और सनातन धर्म का आधार हैं। सिर्फ उनकी पूजा करने से ही परम सुख मिलता है।

यह अध्याय इंसान को अपने जीवन में गुणों को देखने, सत्व की क्वालिटी बढ़ाने में मदद करेगा और आखिर में पक्की भक्ति से दिव्य अवस्था पाने के लिए प्रेरित करेगा।

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