
ज्ञान के क्षेत्र का सत्य: ईश्वर की सर्वव्यापकता और प्रकृति का रहस्य (गीता तेरहवां अध्याय 13-24)
Bhagavat Gita भगवद गीता का तेरहवां अध्याय, ‘क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग’, ज्ञान योग के गहरे मेटाफिजिकल ज्ञान को समझाता है। पिछले श्लोकों (तेरहवां अध्याय 1-12) में, श्री कृष्ण ने क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्र के ज्ञाता (आत्मा) के बीच का अंतर समझाया, और ज्ञान के 20 गुणों के बारे में बताया।ज्ञान का रूप (जिसे जाना जा सकता है), ईश्वर की हर जगह मौजूदगी, प्रकृति-पुरुष और इच्छा का रहस्य, तीनों गुणों के असर के सिद्धांत को पूरी तरह से साफ़ करते हैं। भगवद गीता के तेरहवां अध्याय (तेरहवां अध्याय-13.24) के ये श्लोक सच्चाई और मोक्ष के रास्ते पर गहरी रोशनी डालते है।
Bhagavat Gita इन श्लोकों (13.13-24) में, श्री कृष्ण अब परम सार (ज्ञान) को समझाते हैं, जो आत्म-ज्ञान, परम लक्ष्य की ओर ले जाता है। भगवान के निर्गुण और सगुण दोनों रूपों को साफ करने के बाद, वह प्रकृति (जड़ ऊर्जा) और पुरुष (आत्मा) के बीच का अंतर समझाते हैं। वह आत्मा (आत्मा) के मिलन का रहस्य समझाते हैं, जो दुनिया और जीवन के बंधन की जड़ है।ये श्लोक आखिर में इस ज्ञान की ओर ले जाते हैं कि आप शरीर नहीं, बल्कि आत्मा हैं, और प्रकृति से लगाव रखते हैं। सिर्फ छोड़ देने से ही परम शांति और मुक्ति संभव है।

1.जर्नेय तत्व (ईश्वर) का रूप (श्लोक 13-18)
Bhagavat Gita क्षेत्र (आत्मा) और क्षेत्र (शरीर) का भेद जानने के बाद ज्ञान का परम लक्ष्य ज्ञेय (सही जानना) है, अर्थात ईश्वर को जानना।
श्लोक 13:
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामी यज्ज्यात्वाऽमृतमशनुते। अनादिमतपरं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥13 ॥
अर्थ: मैं वह कहूंगा जो जानने योग्य (जानने योग्य) है, जिसके ज्ञान से मनुष्य अमरता प्राप्त करता है। वह शाश्वत, परम ब्रह्म तत्व न तो सत्य (व्यक्त) कहलाता है, न मिथ्या (अव्यक्त) कहलाता है।
श्लोक 14:
सर्वतह पानिपादं तत्सर्वतोक्षिशिरोमुखम्। सर्वतह श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ 14॥
अर्थ: वह ब्रह्म हाथ-पैरों से, आंखों, माथे और मुंह से, कानों से सर्वत्र है और वह संसार में सर्वव्यापी है।
श्लोक 15:
सर्वेन्द्रियगुणभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्। आसक्तं सर्वभृच्छैव निर्गुणं गुणभोक्त्र च ॥ 15 ॥
अर्थ: वह ब्रह्म सभी इन्द्रियों के गुणों को प्रकाशित करता है, फिर भी सभी इन्द्रियों से रहित है। आसक्ति रहित होने पर भी वह सबका धारी है, और गुणों से रहित (निर्गुण) होने पर भी वह गुणों का भोगी है। करेगा।
श्लोक 16:
बहिरान्तश्च भूतानामचरं चर्मेव च। सूक्ष्मत्वत्तदविज्ञेयं दिस्टां चाण्तिके च तत् ॥16 ॥
अर्थ: वह ब्रह्म प्राणियों के बाहर भी है और भीतर भी; अचल (स्थिर) और चल (चल) भी वही है। सूक्ष्म होने के कारण वह अज्ञात है। वह दूर भी है और पास भी।

श्लोक 17:
अविभक्तं च भूतेशु विभक्तमिव च स्थितम्। भूतभर्तृ च जगरेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥ 17 ॥
अर्थ: वह ब्रह्म सभी प्राणियों में इस प्रकार स्थित है मानो विभाजित होकर भी विभाजन रहित है। वह प्राणियों का पोषक, संहारक और सृष्टिकर्ता है।
श्लोक 18:
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते। ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हरदी सर्वस्य विष्ठितम् ॥ 18 ॥
अर्थ: वह ब्रह्म ज्योतियों का भी प्रकाश है और अंधकार से परे कहा जाता है। वह ज्ञानस्वरूप है, ज्ञानस्वरूप है और ज्ञान से प्राप्त होने योग्य है, और विशेष रूप से सभी के हृदय में स्थित है।
विश्लेषण: Bhagavat Gita ज्ञेयनी की परिभाषा: श्लोक 13 कहता है कि ‘ब्रह्म’ सनातन है और सत्य और असत्य के आधार पर है। यानी, वह न तो शारीरिक रूप से प्रकट (सत्) है, न ही पूरी तरह से अप्रकट या शून्य (असत्)।
सर्वव्यापकता: श्लोक 14-16 में ईश्वर की सर्वव्यापकता दिखाई गई है। उसके सभी हाथ-पैर हैं, क्योंकि वह हर जीव के अंगों के ज़रिए काम करता है। इंद्रियों से रहित होने के बावजूद, वह इंद्रियों के गुणों का प्रकाशक है। वह सबसे पास (आत्मा में) है और सबसे दूर भी।
अविभाज्यता: श्लोक 17 में कहा गया है कि ईश्वर अविभाज्य है, लेकिन भ्रम के कारण वह सभी जानवरों में बँटा हुआ है। बँटा हुआ दिखाई देता है, जैसे एक सूरज कई पानी के बर्तनों में दिखाई देता है। वह बनाने वाला, पालने वाला और मिटाने वाला है।
स्वयं के रूप में बताएं: श्लोक 18 में, ईश्वर को सभी रोशनियों का प्रकाश और अंधेरे से परे माना गया है। आव्यय છે. वह ज्ञान का साधन है, ज्ञान का लक्ष्य है और ज्ञान का स्वरूप भी है, और वह सबके हृदय में स्थित है।

2.प्रकृति और मनुष्य के बीच अंतर (श्लोक 19-21)
Bhagavat Gita क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के बारे में यह विश्लेषण पूरा करने के बाद, श्री कृष्ण अब प्रकृति (जड़ तत्व) की ओर मुड़ते हैं और पुरुष (आत्मा) के संबंध से दुनिया की उत्पत्ति को समझाते हैं।
श्लोक 19:
प्रकृति पुरुषं चैव विद्यादि उभावपि। विकर्णश्च गुणान्श्चैव विद्धि प्रकृति संभवं ॥ 19 ॥
अर्थ: आप प्रकृति और पुरुष दोनों को शाश्वत (बिना शुरुआत के) जानते हैं। दोनों दोष (शरीर, इंद्रियां आदि) और गुण (सत्व, रजस, तामस) प्रकृति से ही उत्पन्न होते हैं। जानकारी मिली।
श्लोक 20:
कारण-कार्य के लिए: प्रकृति हित। पुरुषा सुखदुःखनां भोक्त्रुत्वे हेतुरुच्यते ॥ 20॥
अर्थ: प्रकृति को कार्य (शरीर-इंद्रियां) और कारण (गुणो) के कारण कहा जाता है। पुरुष (आत्मा) को सुख और दुख के भोग का कारण कहा गया है।
श्लोक 21:
पुरुष: प्रकृतिस्थो हि भुंक्ते प्रकृतिजांगुनान्। कारणं गुणसांगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥21 ॥
अर्थ: मनुष्य (आत्मा) प्रकृति में स्थित होकर, प्रकृति से उत्पन्न गुणों का भोग करता है। इन गुणों के प्रति आसक्ति ही श्रेष्ठ (सात) या निम्न (असत) योनि में जन्म का कारण है।
विश्लेषण: Bhagavat Gita अनादी तत्त्ववो: श्लोक 19 में, प्रकृति और पुरुष दोनों को शाश्वत माना गया है। ये दोनों एक दूसरे से अलग हैं, लेकिन शाश्वत हैं। पूरी भौतिक दुनिया, इंद्रियां और तीनों गुण प्रकृति से उत्पन्न होते हैं।
काम का बँटवारा: श्लोक 20 में प्रकृति और पुरुष के काम को बाँटा गया है:
प्रकृति: वह शरीर, इंद्रियों और गुणों को बनाता है और उनके ज़रिए काम करता है।
मनुष्य: वह सिर्फ़ गवाह है, लेकिन प्रकृति से जुड़े होने की वजह से वह सुख-दुख का अनुभव करता है।
बंधन का कारण: Bhagavat Gita श्लोक 21 में यह साफ़ किया गया है कि जब आत्मा (मनुष्य) शरीर (प्रकृति) में स्थित होता है, तब वह प्रकृति के गुणों (सत्व, रजस, तमस) को अपना अनुभव करता है। इन गुणों (गुणों ङ्गो) के प्रति आसक्ति आत्मा को बार-बार अलग-अलग जन्मों (सत के असत) में जन्म लेने पर मजबूर करती है।

3.परमेश्वर और मार्गदर्शक (आयत 22-24)
Bhagavat Gita बंधी हुई आत्मा (पुरुष) और परमात्मा में फर्क समझाकर श्री कृष्ण अपना असली रूप दिखाते हैं। बताते हैं।
श्लोक 22:
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वर। परमात्मामेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥ 22॥
अर्थ: इस शरीर में मौजूद परमात्मा जीवात्मा से अलग है। वह उपद्रष्टा (साक्षी), अनुमन्था (अनुमति देने वाला), भर्ता (देखने वाला), भोक्ता (आनंद का अनुभव कराने वाला) है और वह महेश्वर (महान ईश्वर) है, और उसे परमात्मा भी कहा जाता है।
श्लोक 23:
य एव वेत्ति पुरुषं प्रकृतिम् च गुणाइ सह सह। ॥ 23॥
अर्थ: जो मनुष्य पुरुष (आत्मा), स्वभाव और गुणों को इस प्रकार सही मायने में जानता है, वह (काम करने पर भी) मौजूद होने पर भी दोबारा जन्म नहीं लेता।
श्लोक 24:
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मनात्माना। अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥ 24 ॥
अर्थ: कुछ इंसान ध्यान से अपनी आत्मा में आत्मा को देखते हैं। दूसरे सांख्ययोग (ज्ञान योग) से और दूसरे कर्म योग से देखते हैं।
विश्लेषण: Bhagavat Gita ईश्वर के गुण: श्लोक 22 में, आत्मा के साथ शरीर में मौजूद ईश्वर को महेश्वर कहा गया है। कहा गया है कि जो जीवात्मा से अलग हैं। वह साक्षी है, आत्मा को उसके कर्म करने देता है, उसका पालन-पोषण करता है, और वही सर्वोच्च ईश्वर है।
ज्ञान का फल: श्लोक 23 में ज्ञान का अंतिम फल बताया गया है। जो व्यक्ति पुरुष, प्रकृति और गुणों के बीच के संबंध को सही मायने में जानता है, वह दुनिया में चाहे कोई भी काम करे, दोबारा जन्म नहीं लेता (न स भूयोभिजायते)। इस ज्ञान से व्यक्ति को मोक्ष मिलता है।
मोक्ष के रास्ते: श्लोक 24 में मोक्ष (आत्मा को देखना) पाने के तीन मुख्य तरीके बताए गए हैं, जो ये हैं: चैप्टर का निचोड़ है: 1. ध्यानयोग: अपने मन को सीधे आत्मा पर एकाग्र करना। 2. सांख्ययोग (ज्ञान योग): मेटाफिजिकल ज्ञान और एनालिसिस से प्रकृति और मनुष्य के बीच का अंतर जानकर मोक्ष। मुझसे मिलो। 3. कर्म योग: बिना आसक्ति के कर्म करके मन को शुद्ध करके आत्म-ज्ञान पाना।

निष्कर्ष
Bhagavat Gita के तेरहवां अध्याय (13.13-13.24) के ये श्लोक सच्चाई और मोक्ष के रास्ते पर गहरी रोशनी डालते हैं:
सब जगह ज्ञान: भगवान निराकार होते हुए भी सब जगह मौजूद हैं, इंद्रियां शरीर से रहित होते हुए भी इंद्रियों के गुणों को बताने वाले हैं, और सबके दिल में बसे हुए हैं।
बंधन का कारण: जब जीवात्मा (इंसान) प्रकृति के गुणों में आसक्त हो जाती है, तो वह सुख-दुख भोगता है और जन्म-मृत्यु के चक्कर में फंस जाता है।
परमात्मा: शरीर में भी एक परम सत्ता है, जो साक्षी है, परम ईश्वर है और परमिशन देने वाला है। वही भगवान है।
मोक्ष का रास्ता: प्रकृति और पुरुष के बीच का अंतर जानना ही वह ज्ञान है जो दोबारा जन्म न लेने की गारंटी देता है। यह ज्ञान ध्यान, सांख्ययोग या कर्मयोग जैसे किसी भी रास्ते से मिल सकता है।
ये श्लोक आखिर में इस ज्ञान की ओर ले जाते हैं कि आप शरीर नहीं, बल्कि आत्मा हैं, और प्रकृति से लगाव रखते हैं। सिर्फ छोड़ देने से ही परम शांति और मुक्ति संभव है।