Bhagavat Gita (भागवद गीता) :गीता के तीसरे अध्याय के श्लोक 34 से 43 तक का गहन विश्लेषण

यह सेक्शन तीसरे चैप्टर का आखिरी हिस्सा है, जिसमें वासना (इच्छा) को सबसे बड़ा दुश्मन बताया गया है। और इससे निपटने का तरीका भी बताया गया है।

काम, क्रोध और मोक्ष का मार्ग: गीता के तीसरे अध्याय के श्लोक 34 से 43 का गहन विश्लेषण।

Bhagavat Gita का तीसरा अध्याय , ‘कर्म योग’, बिना स्वार्थ के काम करने के सिद्धांत को पूरा करता है। पिछले श्लोकों में, श्री कृष्ण ने प्रकृति के गुणों से होने वाले काम के बारे में बताया है। इस आखिरी हिस्से में, श्री कृष्ण बताते हैं कि इंसान को अपने काम के रास्ते से भटकाने वाली मुख्य चीज़ है तत्व क्या है और इसे कैसे जीता जा सकता है? इस हिस्से का मुख्य टॉपिक है: काम (इच्छा)।

1.प्यार और नफ़रत पर कंट्रोल और खुद को सही समझने की ज़रूरत (आयत 34-35)

Bhagavat Gita श्री कृष्ण बताते हैं कि आसक्ति और घृणा दो सबसे बड़ी रुकावटें हैं, इसलिए स्वधर्म का पालन करना क्यों ज़रूरी है?

श्लोक 34:

इंद्रियस्येंद्रियस्यर्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ। तयोर्न वशमगच्छेत्तौ ह्यस्य परिपंथिनौ ॥ 34

अर्थ: इंद्रियों की हर चीज़ में आसक्ति (अट्रैक्शन) और द्वेष (रिपल्शन) होता है। इंसान को इन दोनों के कंट्रोल में नहीं आना चाहिए, क्योंकि ये दोनों ही उसके दुश्मन (परिपंथिनौ) हैं।

विश्लेषण: Bhagavat Gita इंद्रियों का नेचर है कि वे अच्छी चीज़ों में आसक्ति और बुरी चीज़ों में द्वेष रखती हैं। ये दोनों ही इमोशंस मन को अस्थिर करते हैं और इंसान को कर्मयोग के रास्ते से भटका देते हैं। इसलिए, कर्मयोगी का दोनों से मुक्त होना ज़रूरी है।

श्लोक 35:

श्रेयांस्वधर्मो विगुनः परधर्मात्स्वनुष्ठिततात। स्वधर्मे निधन, श्रेय: परधर्मो पुनर्जन्म: ॥ 35

अर्थ: स्वधर्म अच्छी तरह से किए गए परधर्म (बीजना धर्म) से बेहतर है। (पोते का कर्तव्य) सबसे अच्छा है। अपने धर्म में मरना भी फायदेमंद है, जबकि दूसरे धर्मों में यह खतरनाक है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita अर्जुन के लिए युद्ध लड़ना खुद को सही ठहराना था, जबकि भिक्षा मांगकर जीवन जीना गलत काम था। श्री कृष्ण यहाँ यह स्पष्ट करते हैं कि बिना आसक्ति के अपने स्वभाव के अनुसार अपना कर्तव्य करना सबसे अच्छा है। परधर्म, व्यक्ति के स्वभाव के विपरीत होने पर, भयंकर परिणाम दे सकता है।

2.वासना: मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन (श्लोक 36-39)

Bhagavat Gita अर्जुन का एक ज़रूरी सवाल और श्री कृष्ण का उसका सीधा जवाब, जो कर्म योग की सबसे बड़ी सीख है। रुकावट दूर करता है।

श्लोक 36 :

अर्जुन उवाच अथ केन प्रयुक्तोयं पाप चरति पुरुषः। अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलदिवा आचरणः ॥36

अर्थ: अर्जुन ने कहा: हे वार्ष्णेय (कृष्ण), तो इंसान खुद न चाहते हुए भी जानता है कि जैसे किसी ने उसे ज़बरदस्ती (बलदिव नियोजितः) उकसाया हो, तो इंसान पाप क्यों करे?

विश्लेषण: Bhagavat Gita अर्जुन यहाँ इंसान के मन की यूनिवर्सल कमज़ोरी के बारे में पूछते हैं। हर कोई पाप की गलती करने के लिए क्यों मजबूर होता है, जबकि उन्हें पता है कि क्या सही है?

श्लोक 37:

श्री भगवान बोलते हैं काम एष क्रोध एष रजोगुण समुद्भवः। महाशनो महापाप्पा विद्ध्येनमिह वैराणम् ॥ 37

अर्थ: श्री भगवान ने कहा: वह काम है, वह गुस्सा है, जो रजोगुण से पैदा होता है। यह (काम) बहुत बड़ा (सब कुछ खाने वाला) और बहुत बड़ा पापी है; तुम उसे ही यहाँ (इस दुनिया में) अपना दुश्मन समझते हो।

विश्लेषण:Bhagavat Gita श्री कृष्ण काम को ही असली दुश्मन बताते हैं।

उत्पत्ति: वह रजोगुण से पैदा हुआ है, जो एक्टिविटी और आसक्ति का कारण है।

रूप: जब काम पूरा नहीं होता तो वह गुस्से का रूप ले लेता है।

विशेषताएँ: वह ‘महासन’ (सब कुछ खाने वाला) है। यही काम इंसान को पाप की ओर खींचता है।

श्लोक 38:

धूमेनावृयते वहनिर्याथादर्शो मलेन च. यथोलबेनवृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम ॥38

अर्थ: जैसे आग धुएं से ढकी होती है, जैसे शीशे धूल से ढके होते हैं, और जैसे गर्भ एम्नियोटिक फ्लूइड से ढका होता है। जैसे यह (गर्भ के आवरण) से ढका होता है, वैसे ही यह (ज्ञान) इससे (काम) ढका होता है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक वासना से ज्ञान छिपाने की तीन तुलनाएँ देता है:आग/धुआँ यह दिखाई देता है, लेकिन साफ़ नहीं होता।

दर्पण/धूल: ज्ञान थोड़ा ढका होता है।

गर्भ/आवरण: ज्ञान पूरी तरह से ढका होता है (सर्वश्रेष्ठ ज्ञान)। ये उदाहरण दिखाते हैं कि वासना का असर हर व्यक्ति पर अलग-अलग होता है, लेकिन यह हमेशा ज्ञान को ढक लेता है।

श्लोक 39:

अवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिना। कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेनालन च ll. 39

अर्थ: हे कुंतेय, इस वासना भरी और कभी न बुझने वाली आग से, आपने ज्ञानियों के ज्ञान को भी ढक दिया है। जो उनका हमेशा का दुश्मन है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita काम की तुलना ‘दुष्पूरीन उनलने’ (ऐसी आग जिसे बुझाया न जा सके) से की गई है। एक ज्ञानी आदमी के लिए भी, जब तक वासना की आग जल रही है, उसका ज्ञान पूरा रहेगा। નથી.

3.वासना का घर और उसकी जीत (श्लोक 40-43)

Bhagavat Gita श्री कृष्ण इस चैप्टर को कामवासना के ठिकानों और उसे खत्म करने के तरीके के बारे में बताकर खत्म करते हैं।

श्लोक 40:

इंद्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते। 40

अर्थ: इंद्रियां, मन और बुद्धि को कामवासना का ठिकाना (आधिष्ठानम) कहा जाता है। इन (जगहों) से वह (काम) ज्ञान को ढक लेता है और शरीरधारी (जीवन) को पूरी तरह से मोहित कर लेता है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita काम पूरे शरीर पर राज करता है। यह इन लेवल से शुरू होता है:

इंद्रियां: बाहरी दुनिया से जुड़ती हैं।

मन: इंद्रियों के बारे में सोचता है।

बुद्धि: फैसला लेने की ताकत को खराब कर देती है।

श्लोक 41:

तस्मात्त्वमिन्द्रियाणयदौ नियमया भारतर्षभ। पापमानं प्रजाहि हयेनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्। 41

अर्थ: इसलिए, हे भारतश्रेष्ठ, सबसे पहले इंद्रियों को कंट्रोल करके, आपको पाप के इन कारणों को खत्म करना चाहिए और ज्ञान और विज्ञान को नष्ट करने वाले (वासना) को मारना चाहिए।

विश्लेषण: Bhagavat Gita वासना पर जीत इंद्रियों को कंट्रोल करने से शुरू होती है। अगर इंद्रियां वासना को बढ़ावा नहीं देतीं, तो यह मन और बुद्धि तक नहीं पहुंच सकती।

श्लोक 42:

इंद्रियाणि परान्यहुरिन्द्रियेभ्यः परम मनः। मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुधेः परतस्तु सः।॥ 42

अर्थ: इंद्रियों को शरीर से बेहतर (ज़्यादा ताकतवर) कहा गया है। इंद्रियों से मन बेहतर है, और मन से बुद्धि बेहतर है। और बुद्धि से जो बेहतर है वह आत्मा है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक इंसान की अंदरूनी शक्तियों के लेवल दिखाता है: आत्मा > बुद्धि > मन > इंद्रियां > शरीर। काम बुद्धि तक पहुंचता है, लेकिन ऊंचे लेवल पर, आत्मा पर जीत हासिल करके ही काम को पूरी तरह महसूस किया जा सकता है। इसे खत्म किया जा सकता है।

श्लोक 43:

और बुद्ध: परम बुद्धवा संस्तभ्यात्मनात्माना। जहाँ दुश्मन ताकतवर है, कामरूपं दुरासदम्। 43

अर्थ: इस तरह, उस आत्मा को जानो जो बुद्धि से परे है, और मन के ज़रिए मन को कंट्रोल करके, हे महान भुजाओं, तुम इस वासना वाले और भयानक (जीतने में मुश्किल) दुश्मन को मार डालो।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक कर्म योग की शिक्षाओं का आखिरी आदेश है।

ज्ञान: आत्मा को बुद्धि से बेहतर जानो।

अध्ययन: आत्मा (स्थिर मन) द्वारा मन को कंट्रोल करना (आत्मना आत्मनं संस्तभ्य)।

कर्म: काम पर विजय प्राप्त करो।

निष्कर्ष: कर्म योग का संकल्प

Bhagavat Gita के तीसरे अध्याय में कामवासना को मूल शत्रु बताया गया है, जो ज्ञान को धुंधला करके पाप कराती है। श्री कृष्ण का आखिरी आदेश है कि मनुष्य को न केवल इंद्रियों को दबाना चाहिए, बल्कि बुद्धि को भी दबाना चाहिए। अपने अंदर रहने वाली आत्मा को जानना चाहिए और निस्वार्थ भाव से अपने स्वधर्म का पालन करना चाहिए और इस कामवासना रूपी शत्रु पर विजय प्राप्त करनी चाहिए। इस तरह तीसरा अध्याय ज्ञान और भक्ति के साथ कर्म को जोड़कर मोक्ष का मार्ग खोलता है।

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