
Bhagavat Gita यह हिस्सा गीता की पूरी शिक्षा का केंद्र है, क्योंकि यहाँ अर्जुन का दुख अपने चरम पर पहुँच जाता है, जिससे कृष्ण को ज्ञान देने की ज़रूरत पड़ती है।
कुलक्षय का मोह, शोक और भय: गीता के पहले अध्याय के श्लोक 25 से 36 का गहन विश्लेषण।

Bhagavat Gita के पहले चैप्टर का पहला आधा हिस्सा (श्लोक 1-24) युद्ध के मैदान की बाहरी तस्वीर दिखाता है, जिसमें कौरवों का घमंड और पांडवों की दिव्य शंख ध्वनि अहम हैं। यह आखिरी हिस्सा (श्लोक 25-36) युद्ध के मैदान से अर्जुन के दिल में उतरता है। यहाँ अर्जुन अपने रिश्तेदारों में आसक्त हो जाता है और दुख के कारण वह युद्ध न करने के कारण बताता है।
आइए अर्जुन के दुख को जन्म देने वाले इन अहम श्लोकों और उनके गहरे मतलब को विस्तार से समझते हैं।
1.रथ की स्थापना और रिश्तेदारों के दर्शन (श्लोक 25-27)

Bhagavat Gita अर्जुन की सलाह पर श्री कृष्ण रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा रखते हैं, जो गीता के इतिहास में सबसे अहम पल बन जाता है।
श्लोक : 25
भीष्मद्रोण मुख्यतः सर्वेषां च महीक्षितम्। 25॥
अर्थ: (श्री कृष्ण) उस बेहतरीन रथ को भीष्म और द्रोण के सामने और बाकी सभी राजाओं के सामने खड़ा करके अर्जुन से कहा: “हे पार्थ, इन कौरवों को देखो जो इकट्ठा हुए हैं।”
विश्लेषण: श्री कृष्ण, जो अर्जुन के सारथी बने हैं, जान-बूझकर रथ को वहीं खड़ा रखते हैं जहाँ युद्ध शुरू होने वाला था। वह अर्जुन से खास तौर पर ‘कुरुनों’ (कुरु वंश के लोग) को देखने के लिए कहते हैं। श्री कृष्ण का यह काम अर्जुन के लिए एक टेस्टिंग ग्राउंड तैयार करता है, जहाँ उसे अपने धर्म के बारे में पता चलता है। उसे प्यार और लगाव में से किसी एक को चुनना होता है।
श्लोक : 26
तत्रपश्यत्स्थिष्ठान पार्थ पितारनाथ पितामहं। आचार्यान्मतुलांब्राथंप्रणपुत्रान्स्कहिंस्था॥26॥
अर्थ: अर्जुन ने वहाँ खड़े होकर अपने चाचाओं, दादाओं, टीचरों, मामाओं, भाइयों, बेटों, पोतों और दोस्तों को बताया। देखा।
विश्लेषण: अर्जुन युद्ध के मैदान में दुश्मन योद्धाओं के बजाय रिश्ते देखते हैं। ‘पितृनाथ पितामहं’ से ‘सखिंस्था’ तक की यह लिस्ट उनके मन पर बहुत असर डालती है। यह सीन अर्जुन को एक योद्धा से एक निराश इंसान में बदल देता है।
श्लोक: 27
श्वशुरांसुह्रद्श्चाव सेन्योर्योरपी। तन्समीक्ष्य स कौन्तेयाः सर्वान्बंधुनअवस्थितान् ॥27॥
अर्थ: (तथा) दोनों सेनाओं में ससुराल वाले और शुभचिंतक दोस्त भी दिखे। इन सभी खड़े भाइयों को देखकर कुंती पुत्र अर्जुन…
विश्लेषण: यहाँ अर्जुन का नाम ‘कौन्तेय’ (कुंतीपुत्र) दिया गया है, जिससे पता चलता है कि वह अब सिर्फ़ एक राजकुमार है, योद्धा नहीं। उसका मन ‘कौरवो’ के बजाय ‘बंधुओं’ (रिश्तेदारों) पर केंद्रित है।
2.अर्जुन का अंदरूनी दुख और शारीरिक लक्षण (श्लोक 28 से 31)

Bhagavat Gita यह सीन देखकर अर्जुन का दिल बैठ गया। वह गिर जाती है और उसके शरीर पर मोह के साफ निशान दिखाई देते हैं।
श्लोक : 28
कृपया परायविष्टो विषिदन्निदंब्रवित्। दृष्टवेम् स्वजनम् कृष्ण युयुत्सुन् समुपस्थितम् 28॥
अर्थ: बहुत दया से भरकर (अर्जुन), शोक मनाने वाला श्री कृष्ण से इस तरह बोला: “हे कृष्ण, युद्ध की इच्छा से इकट्ठा हुए इन रिश्तेदारों को देखकर…”
विश्लेषण: अर्जुन की दया यहाँ ‘कृपया’ को ‘एनवायरनमेंट’ के तौर पर दिखाया गया है। यह दया दया नहीं, बल्कि लगाव से पैदा हुआ दुख है। वह ‘स्वजनम्’ (पोते-पोतियों के लोग) शब्द का इस्तेमाल करके युद्ध के लिए अपनी अनिच्छा दिखाता है। गीता का मुख्य उपदेश इसी पल से शुरू होता है।
श्लोक : 29
सिदन्ति माम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति। यात्रा और सफ़र में शरीर आनंद और सुख से भर जाता है॥।29॥
अर्थ: मेरे अंग ढीले हो रहे हैं और मेरा मुँह सूख रहा है। मेरा शरीर काँप रहा है और आँसू आ रहे हैं।
विश्लेषण: ये क्लासिकल लक्षण हैं जो बहुत ज़्यादा डर, दुख और ट्रॉमा में होते हैं। इससे पता चलता है कि अर्जुन का संघर्ष सिर्फ़ लॉजिकल ही नहीं, बल्कि मेंटल और फिजिकल भी है।

श्लोक : 30
गांडिवं स्रंसते हस्तत्वांकवा परिधयते। न च शाक्नोम्यवस्थतुं भ्रमतिव च मे मनः ll। 30॥
अर्थ: मेरे हाथ से गांडीव (धनुष) जल रहा है, स्किन भी जल रही है। मैं यहाँ खड़ा भी नहीं हो पा रहा हूँ और मेरा मन कन्फ्यूज हो रहा है।
विश्लेषण: ‘गांडिवं स्रंसते’ (गांडिव हिल रहा है) अपने ड्यूटी से भटकने का इशारा है। जिस योद्धा की जान उसके धनुष पर डिपेंड करती है, अगर वह अपना धनुष खो दे, तो वह नासमझ है और यह दुख की हद है।
श्लोक : 31
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव। न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमहवे ॥31॥
अर्थ: हे केशव, मैं उलटी किस्मत ढूंढ रहा हूं, और युद्ध में अपने रिश्तेदारों को मारकर मुझे कोई फ़ायदा नहीं हो रहा है। जाट चला गया।
विश्लेषण: अर्जुन अब बाहरी दुखों और अंदरूनी अनिच्छा के कारण युद्ध न करने के लिए धार्मिक हो जाता है। बहाना ढूंढता है।
3.युद्ध में न जाने के तर्क: राज्य और खुशी के लिए अनिच्छा (श्लोक 32 से 36)

Bhagavat Gita अब अर्जुन लॉजिकली समझाते हैं कि इस युद्ध से राज्य जीतने से क्या नुकसान होगा।
श्लोक : 32-33
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च । किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ॥ 32॥ येषामर्थे काङ्क्षक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च । त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥33॥
अर्थ: हे कृष्ण, मुझे न विजय चाहिए, न राज्य या सुख। हे गोविंद, हमें ऐसे राज्य से, या ऐशो-आराम से, या जीवन से भी क्या फायदा? जिनके लिए हमने राज्य, सुख और ऐशो-आराम चाहा, वे सब जीवन और धन का मोह छोड़कर यहां आ गए। युद्ध में खड़े हैं।
विश्लेषण: यह बात सुनने में भले ही त्याग जैसी लगे, लेकिन यह मोह से प्रेरित त्याग है। अर्जुन कहते हैं कि राज्य किसके साथ भोगना चाहिए? दोस्तों को मारना पड़ा?
श्लोक : 34
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः । मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥ 34॥
अर्थ:गुरु, चाचा, बेटे, साथ ही दादा, चाचा, ससुर, पौत्र और साले और दूसरे। रिश्तेदार…
विश्लेषण:जैसा कि श्लोक 26 और 27 में देखा गया, यहाँ वह उनके रिश्तेदारों के नाम बताते हैं। अपनी बात को मज़बूत करते हैं। इससे यह पक्का होता है कि उनके मन में रिश्तों के अलावा और कुछ नहीं है।

श्लोक : 35
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन । अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥ 35॥
અર્થ: હે મધુસૂદન, જો આ લોકો મને મારી નાખે તો પણ હું તેમને મારવા માંગતો નથી. ત્રણેય લોકના રાજ્ય માટે પણ નહિ, તો પછી આ પૃથ્વીના રાજ્ય માટે તો શું?
વિશ્લેષણ: આ અર્જુનના અહિંસાના ભ્રમિત તર્કની પરાકાષ્ઠા છે. તે કહે છે કે સામેવાળા ભલે ખૂની હોય, પણ હું તેમને મારીશ નહીં. આ તર્ક અર્જુનને તેના ક્ષત્રિય ધર્મમાંથી વિચલિત કરે છે.
श्लोक : 36
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन । पापमेवाश्रयेदस्मान् हत्वैतानाततायिनः ॥36 ॥
અર્થ:हे जनार्दन, धृतराष्ट्र के बेटों को मारकर हमें क्या खुशी मिलेगी? अगर हम इन आतंकवादियों को मारेंगे, तो हमें सिर्फ़ पाप लगेगा।
વિશ્લેષણ: अर्जुन अब कौरवों को ‘आतताई’ (पापी, हमलावर) मानते हुए भी उन्हें मारने से बचते हैं, क्योंकि उन्हें बुरी किस्मत और पाप का डर है। यह डर उन्हें उनके असली धर्म और ड्यूटी से भटकाता है।

उपसंहार : प्रचार की ज़रूरी बातें
Bhagavat Gita श्लोक 25 से 36 तक के इस भाग से पता चलता है कि जब मनुष्य मोह और शोक से ग्रसित हो जाता है, तो वह अपने कर्तव्य को छोड़कर धर्म के नाम पर झूठे तर्क प्रस्तुत करता है। अर्जुन अब सिर्फ एक योद्धा नहीं है, बल्कि धर्म की दुविधा में फंसा एक परेशान आत्मा है। यह स्थिति श्री कृष्ण के लिए तत्वज्ञान, कर्मयोग और धर्म का ज्ञान देने के लिए ज़रूरी भूमिका तैयार करती है।