
भगवद गीता: अध्याय पंद्रहवें (पुरुषोत्तम योग) – श्लोक 8 से 14: परमात्मा का व्याप्त होना और आत्मा का जाना
Bhagavat Gita के पंद्रहवें अध्याय को “पुरुषोत्तम योग” कहा जाता है, जिसमें भगवान कृष्ण अपने महान रूप का राज़ बताते हैं। शुरुआती श्लोकों में दुनिया को उल्टे पेड़ के रूप में दिखाकर वैराग्य का रास्ता दिखाने के बाद, भगवान कृष्ण अब आत्मा के स्वभाव, उसकी यात्रा और आखिर में, पूरी सृष्टि में उसके दिव्य प्रभाव के बारे में बताते हैं। श्लोक 8 से 14 तक का यह ज्ञान आत्मा, परमात्मा और भौतिक दुनिया के बीच के रिश्ते को साफ़ करता है।
1.आत्मा दूसरे शरीर में प्रवेश करती है (श्लोक 8)

श्लोक 8:
शरीरं यदवाप्नोति यचचप्युत्क्रामतीश्वरः । ग्रीतवैतानि संयाति वैयर्गन्धानि संयाती वैयर्गन्धानि वेयुराशयात ॥8॥
अर्थ: जब शरीर का स्वामी (आत्मा) एक शरीर को छोड़कर दूसरा शरीर धारण करता है, तो वह अपने मन के साथ इन इंद्रियों को भी ले जाता है, जैसे हवा सुगंध वाले स्थान से सुगंध को ले जाती है। इस सूक्ष्म शरीर में आत्मा की सभी इच्छाएं, संस्कार और भविष्य के कर्मों के बीज सुरक्षित रहते हैं।
हवा और गंध का दृष्टांत: Bhagavat Gita श्री कृष्ण कहते हैं कि जैसे हवा अपने साथ फूलों की सुगंध ले जाती है, वैसे ही आत्मा भी अपने संस्कारों (इच्छाओं की गंध) के साथ मन और इंद्रियों के सूक्ष्म तत्वों को लेकर एक नए शरीर में प्रवेश करती है। इन संस्कारों के आधार पर नया शरीर प्राप्त होता है।
2.आत्मा और इंद्रियों के बीच संबंध (श्लोक 9)

श्लोक 9:
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्रणमेव च ।अधिष्ठाय मानश्चय विह्यानुपसेवेते ॥9॥
अर्थ: कान, आँख, छूने की शक्ति, जीभ और नाक (ये पाँच ज्ञानेंद्रियाँ) और मन (छठी इंद्रिय) का आश्रय लेकर वह जीव खुद इंद्रियों के विषयों का आनंद लेता है।
Bhagavat Gita यह श्लोक बताता है कि आत्मा, शरीर से अलग होते हुए भी, कैसे भोक्ता बन जाती है।
इंद्रियों से आनंद: आत्मा खुद कुछ भी नहीं भोगती, बल्कि वह मन (पाँच ज्ञानेंद्रियाँ + मन) समेत छह इंद्रियों के ज़रिए दुनिया की चीज़ों (शब्द, रूप, स्वाद, गंध, स्पर्श) का अनुभव करती है।
मन की सेंट्रल पोजीशन: मन यहाँ छठी और सबसे ज़रूरी इंद्रिय है, जो पाँचों इंद्रियों के अनुभव का सेंटर है। आत्मा ही आनंद लेती है: आत्मा (आत्मा का प्रतिबिंब) ही यह सब अनुभव करने वाली (भोक्ता) है। लेकिन आत्मा का यह आनंद अज्ञानता के कारण होता है, क्योंकि वह खुद को शरीर मानती है।
3.अज्ञानी और बुद्धिमान का दृष्टिकोण (श्लोक 10-11)

Bhagavat Gita श्री कृष्ण अब बताते हैं कि आत्मा के शरीर में आने-जाने की इस प्रक्रिया को कौन देखता है और कौन नहीं।
श्लोक 10: अज्ञानी की सीमा
उत्क्रमणं स्थितं वापि भुंजनं वापि भुंजनं वापि गुणन्वितम्। विमूठ् नानुपश्यन्तं पश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानति चक्षुषा ॥10॥
अर्थ: अज्ञानी लोग (विमूठ्) आत्मा को शरीर छोड़ते हुए, शरीर में रहते हुए या गुणों के प्रभाव में चीज़ों का आनंद लेते हुए नहीं देख सकते। केवल ज्ञानचक्षुषा वाले ही इसे देख सकते हैं।
अज्ञान चक्षुषा: Bhagavat Gita सिर्फ़ वही लोग जो शरीर और इंद्रियों के भ्रम में डूबे रहते हैं, आत्मा के ज़रूरी राज़ को नहीं समझ सकते। सिर्फ़ वही लोग जो शास्त्रों और गुरु की शिक्षाओं से आत्मा को जानते हैं, इस प्रक्रिया के गवाह बनते हैं।
श्लोक 11: योगियों की कोशिशें
यत्तो योगिनाश्चैम पश्यंत्यात्मन्यावस्थाथितं येनिं पश्यंत्याचेतसः ॥11॥
अर्थ: मेहनती योगी भी अपने दिल में आत्मा को देख सकते हैं। लेकिन जिनका मन पवित्र (अकृतात्मानः) नहीं है, ऐसे विचारहीन लोग, अपनी कोशिशों के बावजूद, आत्मा को नहीं देख सकते।
योगियों का नज़रिया: Bhagavat Gita जो योगी लगातार प्रैक्टिस करते हैं और कोशिश करते हैं, वे अपने दिल में आत्मा को साकार रूप में महसूस करते हैं। योग का मतलब है इंद्रियों को चीज़ों से हटाकर आत्मा पर फोकस करना।
अशुद्ध मन: अगर मन इंद्रियों की इच्छाओं और कामनाओं से भरा है, अगर दिल अशुद्ध (अकृतात्मानः) है, तो कोई कितनी भी कोशिश कर ले, आत्मा को नहीं देख सकता। इसके लिए खुद की पवित्रता और पवित्रता ज़रूरी है।
4.परमेश्वर का महिमामय प्रभाव (श्लोक 12-14)

Bhagavat Gita ऊपर दिए गए श्लोकों में आत्मा और उसके बंधन पर बात करने के बाद, भगवान कृष्ण अब अपने महान ऐश्वर्य के बारे में बताते हैं, जो पूरी भौतिक दुनिया को बनाए रखता है। ये भगवान की दिव्य शक्तियाँ (विभूतियाँ) हैं।
श्लोक 12: भगवान जो रोशनी देते हैं
यदादित्यगतं तेजो जगद्भाष्य तेऽखिलं। यकचंद्ररामसि यच्छाग्नौ तटेजो विधि मामकं ॥12॥
अर्थ: वह रोशनी जो पूरी दुनिया को रोशन करती है, वह रोशनी जो चाँद को रोशन करती है, और वह रोशनी जो आग को रोशन करती है – जान लो कि वह मेरी है।
रोशनी की शुरुआत: सूरज, चाँद और आग इस भौतिक दुनिया में रोशनी के सबसे शक्तिशाली सोर्स हैं। भगवान कृष्ण कहते हैं कि मैं इस सब में रोशनी और एनर्जी का सोर्स हूँ। जैसा कि भगवान ने पहले कहा, उनका घर खुद चमक रहा है, और उस दिव्य रोशनी का एक हिस्सा इस दुनिया को रोशन करता है।
श्लोक 13: पालने वाले भगवान
गमविष भूतानि धारयम्यहमोजस। पुष्णामि चौषाधि: सर्वं सोमो भूतत्वं ॥13॥
अर्थ: मैं धरती में घुसकर अपनी शक्ति से सभी जीवों का पालन-पोषण करता हूँ, और चाँद में जो अमृत है वह अमृत बनकर सभी पौधों (सब्ज़ियों) का पोषण करता है।
पृथ्वी में पालने वाली शक्ति: Bhagavat Gita धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति और पूरे ब्रह्मांड को पालने की शक्ति भगवान की शक्ति है। यह धरती में घुसकर सभी जीवों और चीज़ों का पोषण करती है।
चाँद और पौधों का पोषण: चाँद की चमक में जो अमृत (सोम) है वह पेड़-पौधों का पोषण करता है। यह पोषण देने वाला तत्व भी भगवान का ही असर है। इस तरह, जीवन को बनाए रखने के लिए ज़रूरी सभी तत्व भगवान के कंट्रोल में हैं।
श्लोक 14: पाचक देवता
अहम् वैश्वानं भूतवानं देहमासृष्टः। प्राण-पान-संयुक्ता: पचाम्यानं चतुर्विधम् ||14||
अर्थ: मैं खुद वैश्वानर (पाचन अग्नि) के रूप में जीवों के शरीर में रहता हूँ, और प्राण और अपान वायु से भरा हुआ, मैं चारों तरह का खाना पचाता हूँ।
वैश्वानर अग्नि: Bhagavat Gita ‘वैश्वानर’ पाचन तंत्र में रहने वाली पाचक अग्नि है। भगवान कहते हैं कि मैं खुद हर जीव के शरीर में पाचन शक्ति के रूप में रहता हूँ।
चार तरह का खाना: (1) चबाया हुआ, (2) पिया हुआ, (3) चूसा हुआ और (4) चबाया हुआ – ये चार तरह का खाना भगवान की शक्ति से पचता है।
प्राण-अपान वायु: पाचन की प्रक्रिया में प्राण (ऊपर की ओर जाने वाली साँस) और अपान (नीचे की ओर जाने वाली साँस) का सहयोग शामिल होता है। इस प्रकार, जीवन का सबसे बुनियादी काम – पाचन – भी परमपिता परमेश्वर की दिव्य शक्ति के बिना संभव नहीं है।

निष्कर्ष: दिव्यता की चेतना
Bhagavat Gita ये सात श्लोक (8 से 14) आत्मा और परमात्मा के बीच के अनोखे कनेक्शन को साफ़ तौर पर दिखाते हैं।
आत्मा का सफ़र: आत्मा अपने संस्कारों को साथ लेकर, पुनर्जन्म के चक्र में घूमती है।
ज्ञान की महिमा: सिर्फ़ ज्ञान और योग से ही आत्मा के असली रूप को जाना जा सकता है।
परमात्मा की विशालता: रोशनी (सूरज), पोषण (चाँद, धरती), और पाचन (वैश्वानर अग्नि) – जीवन को बनाए रखने के लिए ज़रूरी सभी दिव्य शक्तियाँ – भगवान कृष्ण के गुण हैं।
यह समझ हमें न सिर्फ़ आध्यात्मिक ज्ञान पाने के लिए बल्कि अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी के हर पहलू में दिव्यता का अनुभव करने के लिए भी प्रेरित करती है। जब कोई इंसान इस सच्चाई को समझ जाता है, तो वह बिना किसी भेदभाव के भगवान की भक्ति में पक्का हो सकता है।