
ज्ञान की पराकाष्ठा और संशय का नाश (गीता चौथा अध्याय 34-42)
Bhagavat Gita का चौथा अध्याय ‘ज्ञानकर्मसंन्यास योग’ कर्म योग और ज्ञान योग का निचोड़ है। पिछले श्लोकों में भगवान श्री कृष्ण ने यज्ञ के अलग-अलग रूपों के बारे में बताया था, जिसमें ज्ञानयज्ञ को सबसे अच्छा बताया गया था। अब श्लोक 34 से 42 में वे इस ज्ञान को पाने के प्रैक्टिकल रास्ते, इसके फल और अर्जुन को रास्ते के बारे में बताते हैं। दिल में जो शक हैं, उन्हें खत्म करने का आदेश देते हैं।
ये श्लोक अर्जुन के लिए आखिरी गाइडेंस हैं जो ‘कर्म’ और ‘युद्ध’ से आज़ादी पाना चाहता है।
ज्ञान पाने का रास्ता: गुरु के प्रति समर्पण (श्लोक 34)

Bhagavat Gita भगवान यह साफ़ करते हैं कि सिर्फ़ किताबें पढ़ने या तर्क करने से दिव्य ज्ञान नहीं मिलता, बल्कि गुरु गोबिंद सिंह जी ने उनसे कहा, “दादाजी, आप ही मेरे रक्षक हैं।
श्लोक 34:
“तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्षयन्ति ते ज्ञानं ज्ञानं सत्त्वदर्शिनः ll 34ll.
अर्थ: आपने सेवा से ज्ञान, प्रणिप्राप्त (विनम्र सवाल) और जानकारी सीखी है। जो ज्ञानी लोग सार जानते हैं, वे आपको वह ज्ञान सिखाएँगे।
विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक स्पिरिचुअल ज्ञान पाने के लिए तीन ज़रूरी शर्तें बताता है, जो गुरु-शिष्य के रिश्ते का आधार है। नींव है:
प्रणिपात (सरेंडर): अहंकार को छोड़कर गुरु के प्रति पूरी तरह सरेंडर करना।
परिप्रश्न (सवाल): जिज्ञासु, विनम्र, बिना अहंकार के होकर शंकाओं को दूर करना।
सेवा: गुरु की निस्वार्थ सेवा करना।
ज्ञान देने वाला गुरु कैसा होना चाहिए? जो न सिर्फ़ शास्त्रों का जानकार हो, बल्कि तत्वदर्शी (जो सच को समझते हों) भी हो।
ज्ञान का फल और उसका प्रभाव (श्लोक 35-40)

Bhagavat Gita ज्ञान मिलने के बाद इंसान की ज़िंदगी और उसके कर्म बंधनों में क्या बदलाव आते हैं? भगवान बताते हैं।
श्लोक 35:
यज्ञ्यत्वा न पुनर्मोहमेवं यस्यासि पांडव। येन भूतन्यशेषानि द्रक्ष्यास्यात्मन्यथो मयि ॥35 ॥
अर्थ: हे पांडवों! एक बार ज्ञान जान लेने के बाद, तुम फिर कभी इस तरह आसक्ति में नहीं आओगे। जिससे तुम अपने अंदर (आत्मा) और फिर मुझमें सभी भूतों को पूरी तरह से खत्म कर दोगे।
विश्लेषण: Bhagavat Gita ज्ञान का मुख्य फल आसक्ति का नाश है। इस ज्ञान से सभी जीवों में आत्मा (ब्रह्म) और आखिर में भगवान को देखा जाता है। यह दृष्टि समानता और अद्वैत की भावना को जन्म देती है।
श्लोक 36:
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्मः। सर्वं ज्ञानप्लवेनाव वृजिनं संतरिष्यसि ॥36 ॥
अर्थ: भले ही तुम बाकी सभी पापियों से ज़्यादा पापी हो, तुम ज्ञान की नाव से ज़रूर तर जाओगे। तुम सभी पापों के सागर को तैरकर पार कर जाओगे।
श्लोक 37:
यथैधांसि समिद्धोगनिर्भस्मासत्कुरुतेजृजुन। ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मासत्कुरुते तथा ॥ 37॥
अर्थ: हे अर्जुन! जैसे आग जलाने से लकड़ी जलकर नष्ट हो जाती है, वैसे ही ज्ञान की आग भी सभी कर्मों को जला देती है।
विश्लेषण: Bhagavat Gita ये दो श्लोक ज्ञान की सबसे बड़ी ताकत बताते हैं। ज्ञान एक आग है जो जमा हुए कर्मों (पापों) और अभी के कर्मों के बंधन (नतीजों से लगाव) को जला देती है। इसे बनाए रखें। इसलिए, ज्ञान मुक्ति का सबसे ताकतवर रास्ता है।
श्लोक 38:
न तो ज्ञान पवित्र ज्ञान के जैसा है। तत्सवयं योगसंसिद्ध: कालेनात्मनि विंदति। 38 ॥
अर्थ: इस दुनिया में ज्ञान जैसा पवित्र कुछ भी नहीं है। योग से सिद्ध व्यक्ति सही समय पर उस ज्ञान को अपने अंदर पा लेता है।

श्लोक 39:
श्रद्धावनल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परा शांतिमचिरेणाधिगच्छति ॥ 39 ॥
अर्थ:श्रद्धावान आदमी, जो ज्ञान के लिए तैयार है और जिसने अपनी इंद्रियों को काबू में कर लिया है, उसे ज्ञान मिलता है। ज्ञान मिलने के बाद उसे तुरंत परम शांति मिल जाती है।
श्लोक 40:
अज्ञाश्चाश्रद्धानश्च सभास्यात्मा विनश्यति। नायं लोकोस्ती न परो न सुखं संभास्यात्मनः ॥40॥
अर्थ:अज्ञानी, विश्वासहीन और शक करने वाले इंसान बर्बाद हो जाते हैं। इस दुनिया में कोई परलोक नहीं है और शक करने वालों के लिए कोई खुशी नहीं है।
विश्लेषण:
Bhagavat Gita पवित्रता का सोर्स: श्लोक 38 में ज्ञान को सबसे बड़ी पवित्रता बताया गया है। आया है, जो योग (बिना स्वार्थ के काम) से मिलता है।
ज्ञान की शर्तें: श्लोक 39 ज्ञान पाने के लिए तीन बेसिक क्वालिटी बताता है: विश्वास, तत्परता। और इंद्रियों पर कंट्रोल। ज्ञान का तुरंत नतीजा परम शांति है।
शक का नाश: श्लोक 40 में भगवान शक को सबसे बड़ी रुकावट मानते हैं। शक करने वाले लोग किसी भी काम में स्थिरता नहीं पाते और बर्बादी की ओर धकेले जाते हैं। अर्जुन की अभी की हालत शक वाली है, जिसके कारण वे चेतावनी देते हैं।
आखिरी हुक्म: शक को दूर करो और लड़ो (आयत 41-42)

Bhagavat Gita अंत में, श्री कृष्ण अर्जुन को कर्मयोग और ज्ञान के निष्कर्ष के रूप में अंतिम आदेश देते हैं।
श्लोक 41:
योगसंन्यास्तकर्मणां ज्ञानसंच्छिन्नसंशयम्। आत्मवंतं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय ॥ 41 ॥
अर्थ: हे धनंजय! जिसने योग के द्वारा कर्म का त्याग कर दिया है, जिसके संदेह ज्ञान के द्वारा दूर हो गए हैं, और जो स्वरूप में स्थिर है, वह कर्मों से नहीं बंधा है।
श्लोक 42:
तस्माद्ज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानसिनात्मनः। छित्त्वैनं सम्यासम् योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥ 42 ॥
अर्थ: इसलिए, हे भारत! तुमने अज्ञान से उत्पन्न और हृदय में उपस्थित इस संदेह को आत्म-ज्ञान की तलवार से काट दिया। योग का अभ्यास किया और युद्ध के लिए तैयार हो गए।
विश्लेषण: Bhagavat Gita ये श्लोक चौथे अध्याय का अंतिम संदेश हैं। कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि अपनी आसक्ति को त्यागकर, ज्ञान के द्वारा अपने संदेहों को दूर करके और अपने योग रूपी क्षत्रिय धर्म के कर्मों को स्वीकार करके खड़ा हो जाना चाहिए।
शक की वजह अज्ञानता है।
शक दूर करने का हथियार खुद को जानने की तलवार है।
आखिरी हुक्म: ज्ञान हासिल करो और अपना फ़र्ज़ (योग) करो।
इन आयतों से कृष्ण यह साबित करते हैं कि ज्ञान मिलने के बाद इंसान को अपना काम छोड़ना नहीं पड़ता, बल्कि उसे मुक्ति के तरीके के तौर पर इस्तेमाल करना चाहिए।

निष्कर्ष: ज्ञान, विश्वास और विजय
Bhagavat Gita के चौथे चैप्टर के आखिरी श्लोक साफ मैसेज देते हैं कि मुक्ति का रास्ता कभी खत्म नहीं होता। कर्मयोग और तत्वदर्शी ज्ञान में तालमेल है।
शक, अज्ञानता और अविश्वास इंसान को बंधन में डालते हैं। इसके उलट, जो इंसान विश्वास, विनम्रता और सेवा से ज्ञान पाता है, वह ज्ञान की आग से कर्म के बंधनों को जलाकर परम शांति और मोक्ष पाता है।
कृष्ण का अर्जुन को आदेश है: ज्ञान से अपने सारे शक दूर करो और अपने धर्म के योग को मानते हुए खड़े हो जाओ। क्योंकि मोक्ष काम न करने में नहीं, बल्कि जान-बूझकर किए गए कर्तव्य में है।