Bhagavat Gita (भागवद गीता) :गीता के पाँचवाँ अध्याय के श्लोक 11 से 20 तक का गहन विश्लेषण

असत् का अध्ययन: योगी और अयोगी में भेद (गीता पाँचवाँ अध्याय 11-20)

Bhagavat Gita के पांचवें अध्याय, ‘कर्मसंन्यास योग’ (कर्म के फल को छोड़ने का योग) में बताया गया है कि दुनिया में कर्म कैसे करें, ताकि वह बंधन न बने। पहले 10 श्लोकों में भगवान कृष्ण ने सच्चे त्याग और ‘कमल के पत्ते के न्याय’ की परिभाषा बताई है। समझाएं।

Bhagavat Gita अब, श्लोक 11 से 20 में, वह इस सिद्धांत को और भी मज़बूत बनाते हैं। वह एक योगी (जो अपने कर्मों के फल को छोड़ देता है) और एक अयोगी (जो बिना आसक्ति के कर्म करता है) के बीच का अंतर साफ़ करते हैं। ये श्लोक इंसान के शरीर और आत्मा के बीच के रिश्ते और बराबरी की नज़र से ब्रह्म को पाने के रास्ते के बारे में बताते हैं।

योगी और अयोगी: फलों का त्याग (श्लोक 11-12)

Bhagavat Gita कृष्ण बताते हैं कि योगी और योगी में फ़र्क काम के नेचर में नहीं, बल्कि काम करने के तरीके में है। मकसद में जियो।

श्लोक 11:

कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिंद्रियारपि। योगिन: कर्म कुर्वन्ति संगम त्यक्तात्मा शुद्धये ॥ 11

अर्थ: योगी शरीर, मन, बुद्धि और यहाँ तक कि इंद्रियों से भी लगाव छोड़ चुके हैं, आत्म-शुद्धि के लिए काम करते हैं।

श्लोक 12:

युक्ताः कर्मफलं त्यक्त्वा शांतिमाप्नोति नैष्ठिकम्। अयुक्ताः कामकारणे फले सक्तो निबध्यते ॥ 12

अर्थ: कर्मयोग में लगा हुआ इंसान (योगी) अपने कर्मों के नतीजों को छोड़कर हमेशा की शांति पाता है। कर्मयोग की इच्छाओं की वजह से इंसान फल में आसक्त हो जाता है और बंध जाता है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita श्लोक 11 में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि योगी का किया गया हर काम – शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक – सिर्फ़ एक ही मकसद से किया जाता है: खुद को शुद्ध करना। इसका मकसद चीज़ें पाना नहीं, बल्कि अंदर के मन को शुद्ध करना है।

श्लोक 12 में नतीजा साफ़ है:

योगी: फलों का त्याग → हमेशा की शांति।

आयोगी: इच्छा के साथ फल में आसक्ति → बंधन।

यह कर्म योग का मूल सिद्धांत है: बंधन का कारण कर्म नहीं, बल्कि कर्म के नतीजों में आसक्ति है।

नौ द्वारों वाला शहर: अकर्ता भाव (श्लोक 13-16)

Bhagavat Gita भगवान ने योगी के शरीर को ‘शहर’ बताकर उसके अंदर की भावना बताई है।

श्लोक 13:

सर्वकर्माणि मनसा संन्यासीस्ते सुखं वशी। नवद्वारे पूरे देहि नैव कुर्वन्न कार्यं ॥13

अर्थ: आत्मा शरीर में रहती है, मन से सभी कर्मों का त्याग करके, नौ दरवाजों वाले शहर में, न तो कोई खुद कुछ करता है और न ही किसी और से करवाता है, वह खुशी से रहता है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita शरीर को यहाँ नौ दरवाजों वाला शहर (नवद्वारे पूरे) कहा गया है। ये नौ दरवाजे दो कान, दो आँखें, दो नाक, मुँह और दो गुप्त दरवाजे हैं। इस शहर का मालिक जीवात्मा (देही) है। कर्मयोगी इस शहर में रहता है, फिर भी वह खुद को कर्ता (कर्ता नहीं) मानता है। मन के कर्मों का त्याग करके, शरीर और इन्द्रियों को प्रकृति के कार्य मानकर, वह उनसे विरक्त हो जाता है और सुख में स्थित रहता है।

श्लोक 14:

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभु। न कर्म का संयोग होता है, न वस्तुओं का स्वभाव। 14

अर्थ: भगवान मनुष्यों के लिए न तो कर्ता का अस्तित्व बनाते हैं, न कर्मों का संबंध और न ही उनके कर्मों का फल। यह सब प्रकृति के कारण ही होता है।

श्लोक 15:

नादत्ते कस्यचित्पापन न चैव सुकृतं विभु। अज्ञानेनाव्रतं ज्ञानं तेन मुह्यंति जन्तवः 15

अर्थ: सर्वव्यापी भगवान किसी के पाप या पुण्य को स्वीकार नहीं करते। लेकिन अज्ञान से ढके ज्ञान के कारण जीव मोह में पड़ जाते हैं।

श्लोक 16:

ज्ञानेन तु तद्ज्ञानं येषां नाशितमात्मनः। तेषामादित्यवज्जनां प्रकाशयति तत्परम् ॥ 16

अर्थ: लेकिन, जिसकी आत्मा का अज्ञान ज्ञान से नष्ट हो गया है, उसका ज्ञान सूर्य के समान है। परम तत्व को प्रकाशित करता है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita भगवान जोर देकर कहते हैं कि दुनिया में हो रहे कार्यों और उनके परिणामों के लिए भगवान जिम्मेदार नहीं हैं। यह सब प्रकृति के नियम (स्वभाव) से होता है। बंधन का एकमात्र कारण अज्ञान है, जिसके कारण जीव ने खुद को कर्ता मान लिया है और सुख-दुख में आसक्त है। मोहित है। जब यह अज्ञान ज्ञान से नष्ट हो जाता है, तो परम सत्य (सत्य) सूर्य के प्रकाश की तरह प्रकट होता है। स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

ब्रह्म में स्थिति: ज्ञानी पुरुष का दर्शन (श्लोक 17-20)

Bhagavat Gita अज्ञान का ज्ञान से नाश हो जाने पर योगी की चेतना ब्रह्म में कैसे स्थित हो जाती है, वह भगवान बताते हैं।

श्लोक 17:

तद्बुद्धयास्तदात्मनस्तन्निष्ठस्तपरायणः। गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञानिर्धूतकल्मशाः॥ 17

अर्थ: जिसकी बुद्धि उसी में स्थिर है, जिसका आत्मा उसी में लीन है, जिसकी निष्ठा उसी में है और जो इसी को परम आश्रय मानकर, जिनके पाप ज्ञान से धुल गए हैं, वे मनुष्य इस संसार (मोक्ष) में वापस नहीं आते।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक ब्रह्मभाव में स्थित योगी के चार लक्षण बताता है: तद्बुद्धयाः (बुद्धि उसी में), तदतात्मानः (आत्मा उसी में लीन है), तन्निष्ठाः (उसमें निष्ठा), तत्परायणः (उसमें भरोसा)। ऐसा व्यक्ति ही मोक्ष (पुनर्जन्म न होना) प्राप्त करता है।

श्लोक 18:

विद्याविन्यसम्पन्ने ब्राह्मण गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पंडिताः समदर्शिनः ॥ 18

अर्थ: ज्ञान और बुद्धि वाले ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चांडाल भी समभाव रखते हैं।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक ज्ञान का सबसे बड़ा फल दिखाता है: समत्व। ज्ञानी आदमी बाहरी रूप और वर्ग में फर्क नहीं देखता। वह जानता है कि शरीर और पद अलग-अलग होने पर भी, उन सभी के अंदर एक ही आत्मा (ब्रह्म) मौजूद है। सिर्फ यही समभाव उसे आसक्ति और बंधन से आज़ाद करता है।

श्लोक 19:

इहैव तैरजितः सर्गो येषां समये स्थितम् मनः। निर्दोष हि सम ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मिणी ते स्थितः ॥ 19

अर्थ: जिनके मन में समता है, उन्होंने इसी संसार में संसार को जीत लिया है। क्योंकि ब्रह्म दोषरहित और समान है, इसलिए वह ब्रह्म में ही स्थित है।

श्लोक 20:

न प्रहृषयेत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियं। स्थिरबुद्धिरसम्मुधो ब्रह्मविद् ब्रह्माणी स्थितः ॥ 20

अर्थ: कोई पसंदीदा चीज़ मिलने पर खुश नहीं होता और कोई बुरी चीज़ मिलने पर परेशान नहीं होता। ऐसा नहीं होता। जो इंसान स्थिर बुद्धि वाला है, दुश्मनी से मुक्त है और ब्रह्म को जानता है, वह ब्रह्म में ही स्थित है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita श्लोक 19 और 20 बुद्धिमान की स्थिति का निष्कर्ष देते हैं। जो इंसान समभाव रखता है, उसने इसी जीवन में संसार (पुनर्जन्म का चक्र) जीत लिया है।

समभाव का कारण: ब्रह्म निर्दोष और समान है। इसलिए, ब्रह्म में स्थित होने के लिए समभाव ज़रूरी है।

स्थितप्रज्ञता: जिसकी बुद्धि सुख-दुःख, प्रिय-अप्रिय, सफलता-असफलता इन द्वन्द्वों में स्थिर रहती है, वही ब्रह्मवेत्ता है।

निष्कर्ष

Bhagavat Gita पांचवें अध्याय के ये श्लोक (5.11-5.20) कर्म योग का प्रैक्टिकल पहलू समझाते हैं: खुद की शुद्धि के लिए और फल की आसक्ति छोड़कर कर्म करो (योगी)। शरीर को नौ दरवाज़ों वाला शहर समझो, खुद को कर्ता समझो और दुनिया में रहो। पूरी दुनिया को कुदरत का काम मानकर, भगवान को कर्ता की सोच से आज़ाद रखो।आखिर में, केलवी से समदृष्टि (सभी जीवों में एक ही आत्मा को देखना) मिलती है, सुख-दुख के द्वैत से आज़ाद होकर। ब्रह्मभाव में स्थापित होना।

यह रास्ता इंसान को आज़ाद और शांतिपूर्ण जीवन जीने की चाबी देता है, जो इस दुनिया में मोक्ष की ओर ले जाता है। एहसास कराता है।

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