Bhagavat Gita(भागवद गीता) :गीता के आठवां अध्याय के श्लोक 1 से 10 तक का गहन विश्लेषण

मृत्यु के समय परीक्षा: अक्षर ब्रह्म की प्राप्ति (गीता आठवां अध्याय 1-10)

Bhagavat Gita का आठवां अध्याय ‘अक्षरब्रह्म योग’ ज्ञान, कर्म और भक्ति का ऐसा ही अहम संगम है, जो जीव को मौत के आखिरी पल में परम तत्व को पाने का तरीका सिखाता है। सातवें अध्याय के आखिरी श्लोक (7.30) में श्री कृष्ण ने ‘पर्यायांकाले’ (मौत के समय) भगवान को जानने का महत्व समझाया है।

Bhagavat Gita इस अध्याय के शुरुआती श्लोकों (8.1-10) में अर्जुन उन गहरे शब्दों का मतलब पूछकर ज्ञान की नींव रखते हैं। છે. इन शब्दों को समझाकर भगवान ने मौत के समय मन की हालत और जीवन के लक्ष्य का साफ राज बताया है।

अर्जुन के सात गहरे सवाल (श्लोक 1-2)

Bhagavat Gita अर्जुन ने सातवें अध्याय के आखिर में इस्तेमाल किए गए मुश्किल फिलॉसॉफिकल शब्दों का मतलब पूछकर बातचीत शुरू की। आगे और भी है।

श्लोक 1-2:

अर्जुन उवाच। किम तद् ब्रह्म किमध्यात्मा किम कर्म पुरुषोत्तम। अधिभूतं च कि किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥ 1॥ अधियज्ञ: कथं कोटरा देहेऽस्मिनमधुसूदन। प्रायंकाले च कथन ज्येयोअसि नियतमतभिः ॥ 2

अर्थ: अर्जुन ने कहा: हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? और कर्म क्या है? विस्मित किसे कहते हैं? और अधिदैव किसे कहते हैं? हे मधुसूदन! इस शरीर में अधियज्ञ कौन है और वह कैसे रहता है? और स्थिर मन वाले लोग मौत के समय आपको कैसे जान सकते हैं?

विश्लेषण: Bhagavat Gita अर्जुन यहाँ सात बेसिक शब्दों की परिभाषा पूछते हैं:

1.ब्रह्म: परम सार।

स्पिरिचुअलिटी: आत्मा का रहस्य।

कर्म: कामों का सिद्धांत।

अधिभूत: फिजिकल दुनिया का आधार।

अधिदैव: दिव्य दुनिया का आधार।

अध्ययज्ञ्न: यज्ञ (कर्म) के देवता।

प्राणकाले ज्ञान: मौत के समय भगवान को जानने का प्रोसेस।

अर्जुन का मुख्य उद्देश्य यह सवाल है: जीवन भर का ध्यान मृत्यु के अंतिम क्षण में कैसे फल देता है?

ज़रूरी शब्दों की परिभाषा (श्लोक 3-4)

Bhagavat Gita श्री कृष्ण अर्जुन के सवालों के छोटे और सही जवाब देकर ज्ञान के बेसिक हिस्सों का वर्णन करते हैं।

श्लोक 3:

श्री भगवान कहते हैं। अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोध्यात्ममुच्यते। भूतभावभावकरो विसर्गः कर्मसंग्नितः॥ 3

अर्थ: श्री भगवान ने कहा: अविनाशी (अक्षर) परम तत्व ब्रह्म है। अपने स्वभाव (आत्मा) को अध्यात्म कहते हैं। जिस त्याग (विसर्ग) से जानवरों के भाव (शरीर) पैदा होते हैं, उसे कर्म कहते हैं।

श्लोक 4:

अधिभूतं क्षरो भव: पुरुषच्छाधिदैवतं। अधियज्ञोऽहमेवत्र देहे देहभ्रुतां वर। 4

अर्थ: हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन! नाशवान भावना (परिणाम) ही सर्वोच्च सत्ता है, और पुरुष (ब्रह्मा, सूर्य आदि देवता) सर्वोच्च ईश्वर है। और मैं स्वयं इस शरीर में जानने वाला हूँ।

विश्लेषण: Bhagavat Gita ब्रह्म: अक्षरं ब्रह्म परमम् – मतलब सबसे ऊँचा अविनाशी तत्व।

अध्यात्म: स्वभाव: अध्यात्म: – यानी जीवों का असली स्वभाव (अविनाशी आत्मा)।

कर्म: विसर्गः कर्मसंज्ञः – मतलब वह यज्ञ जिससे जीवों के शरीर और उनकी हरकतें पैदा होती हैं। त्याग दो।

अधिभूत: क्षारो भव: – यानी नाशवान भौतिक चीज़ें।

अधिदैवत: पुरुष: अधिदैवतम् – यानी, सूरज और चांद जैसे देवताओं के रूप में रहने वाला दिव्य अंश।

अध्ययज्ञ्नो: अध्य्यज्ञ्नोઽहमेवात्र – सबसे ज़रूरी: यज्ञों का आनंद लेने वाला और करने वाला खुद भगवान है, जो हर जीव के दिल में साक्षी के तौर पर मौजूद है।

मृत्यु के समय का नियम और अध्ययन का महत्व (श्लोक 5-8)

Bhagavat Gita अर्जुन के मुख्य सवाल का जवाब यहाँ दिया गया है: मौत के समय मन कैसे चलता है?

श्लोक 5:

अंतकाले च मामेव स्मरणमुक्त्वा कलेवरम्। यह प्रयाति स मद्भावं याती नास्त्यात्र संस्भाषः ॥ 5

अर्थ: और जो व्यक्ति अंत में (मौत के समय) मुझे याद करते हुए अपना शरीर छोड़ता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त करता है, इसमें कोई संदेह नहीं है।

श्लोक 6:

यं यम वापि स्मरणभवं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ 6

अर्थ: हे कौन्तेय! अंत में, जब मनुष्य शरीर छोड़ता है, तो वह जिस भी भावना को याद करता है, वह हमेशा उसी भावना के चिंतन में रहता है। इस कारण उसे वही भावना प्राप्त होती है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita अंतिम स्मरण का महत्व: ये श्लोक ‘याद करो, तो मिलता है’ के सिद्धांत को स्थापित करते हैं। मृत्यु के समय मन में जो भी भावना होती है, आत्मा उसी भावना के अनुसार गति प्राप्त करती है।

जीवन भर का अध्ययन: श्लोक 6 में ‘सदा तद्भावभावितः’ शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। मृत्यु के समय मन को नियंत्रित करना असंभव है। इसलिए, जिन भावनाओं के बारे में व्यक्ति जीवन भर लगातार सोचता रहता है, वे अंतिम समय में और मजबूत हो जाती हैं।

श्लोक 7:

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्या च। मय्यर्पितमनोबुद्धिरमामयवैश्यस्यासंशायः। 7

अर्थ: इसलिए हे अर्जुन! तुम हर समय मुझे याद करो और युद्ध भी करो। मुझे समर्पित अपने मन और बुद्धि के द्वारा, तुम बिना किसी संदेह के मुझे प्राप्त करोगे।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक कर्मयोग और भक्तियोग के तालमेल का एक बेहतरीन उदाहरण है।

हर समय याद रखो: अर्जुन अपने क्षत्रिय धर्म (युद्ध) से मुक्त नहीं है। कृष्ण कहते हैं कि कर्म (युद्ध) छोड़ने की कोई ज़रूरत नहीं है, बल्कि उस काम को करते समय हमेशा मुझे याद रखो।

निष्काम कर्म: मन और बुद्धि को भगवान को अर्पित करने से, युद्ध जैसा हिंसक काम भी भक्ति बन जाता है और मोक्ष की ओर ले जाता है।

श्लोक 8:

अभ्यास्योग्युक्तेन चेतसा नान्यगामिना। परम पुरुषं दिव्य याति पार्थानुचिंतायन ॥ 8

अर्थ: हे पार्थ! जो व्यक्ति अध्ययन के योग से ध्यान करता है और जिसका मन भटकता नहीं है, वह दिव्य परम सत्ता को प्राप्त करता है। करता है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita अंतिम लक्ष्य को प्राप्त करने का तरीका स्पष्ट है: अभ्यास योग।

अभ्यास योग: लगातार प्रयास और दोहराव के माध्यम से मन को एकाग्र करना।

नान्यगामिना (अन्यत्र न भटकवुण): मन को केवल एक लक्ष्य पर स्थिर करना।

परम पुरुष का रूप और ध्यान (श्लोक 9-10)

Bhagavat Gita भगवान अब उस परम पुरुष के दिव्य रूप का वर्णन करते हैं जिसका ध्यान करना है।

श्लोक 9:

कवि पुराणमनुषासितर- मनोरनीयांसमनुस्मरेद्य। सर्वस्य धातारमचिंत्यरूप- मादित्यवर्णं तमसाः परस्तत् ll। 9

अर्थ: वह मनुष्य जो सर्वज्ञ (कवि), शाश्वत (पुराण), नियंत्रक (अनुशासितारम्), अणु से भी सूक्ष्म, सबका स्वरूप है। कर्ता उस अकल्पनीय रूप वाले, सूर्य के समान तेजस्वी और फिर भी अंधकार से भरे हुए पुरुष को याद करता है…

श्लोक 10:

प्रयाणकाले मनसाचलेना भक्त्या युक्तो योगबलेना चैव। भ्रूवोरम्ध्य प्राणमावेश्य सम्यक्स तं परम पुरुषमुपाइती दिव्यम् ॥ 10

अर्थ: …मृत्यु के समय, स्थिर मन से, भक्ति से भरे हुए और योग की शक्ति की मदद से, वह दोनों भ्रमों को मुक्त कर देता है। प्राणवायु को बीच में ठीक से स्थिर करके, वह दिव्य परम सत्ता को प्राप्त करता है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita लक्ष्य का रूप (श्लोक 9): परम सत्ता के आठ गुणों का वर्णन किया गया है: वह सर्वज्ञ है, शाश्वत है, वह सबका नियंत्रक है, बहुत सूक्ष्म है, सबका आधार है, अकल्पनीय है (बुद्धि से नहीं जाना जा सकता), प्रकाश है और भ्रम अंधकार से परे है।

मृत्यु की क्रिया (श्लोक 10): यह श्लोक मृत्यु के समय ध्यान योग की विधि बताता है। अडिग मन, भक्ति और योग की शक्ति से प्राण वायु को भ्रुवोर मध्य (आज्ञा चक्र, भौंहों के बीच) में लाया जाता है। आत्मा को स्थिर करने के बाद, यह शरीर छोड़ देती है। जो इस तरह शरीर छोड़ता है, वह दिव्य परम सत्ता को प्राप्त करता है।

निष्कर्ष

Bhagavat Gita के आठवें चैप्टर (8.1-8.10) के ये शुरुआती श्लोक स्पिरिचुअल लाइफ को शॉर्ट में बताते हैं:

बेसिक ज्ञान: कृष्ण ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ की डेफिनिशन देकर। लाइफ के बेसिक एलिमेंट्स को समझाते हैं, जिसमें वे खुद ज्ञान के रूप में शरीर में मौजूद हैं।

आखिरी पल का महत्व: मौत के समय आखिरी याद ही अगले जन्म की स्पीड तय करती है, इसलिए पूरी ज़िंदगी लगातार भगवान को याद करना ज़रूरी है।

कर्म और भक्ति का कोऑर्डिनेशन: अर्जुन को लड़ाई (कर्म) छोड़ने के बजाय हमेशा भगवान को याद करना चाहिए। युद्ध में जाने की सलाह दी गई है।

पाने का तरीका: परमात्मा को पाने के लिए पढ़ाई, योग, स्थिर मन और भक्ति का मेल ज़रूरी है। इस तरह, कृष्ण आत्मा को चेतावनी देते हैं कि मोक्ष कोई अचानक होने वाली घटना नहीं है, बल्कि यह जीवन भर लगातार पढ़ाई करने का फल है और यह बिना रुके भक्ति का फल है, जो मौत के आखिरी पल में सफलतापूर्वक मिलता है।

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