
विभूति योग की पूर्णता: सर्वशक्तिमान का भाग (गीता दसवें अध्याय 33-42)
Bhagavat Gita के दसवें अध्याय ‘विभूति योग’ में श्री कृष्ण अपने अनंत ऐश्वर्य का वर्णन करते हैं। इससे पहले के श्लोकों (10.12-32) में भगवान ने देवताओं, प्रकृति और शासन से जुड़े अनगिनत ज्ञान, विभूतियों का वर्णन किया है।
Bhagavat Gita इन आखिरी श्लोकों (10.33-42) में भगवान ने अक्षरों, ऋतुओं, गुणों और संबंधों के बीच अपनी जगह बताई है। ऐसा करने से पूरा विभूति योग खत्म हो जाता है। इस निष्कर्ष में यह संदेश है कि दुनिया में जो कुछ भी महान, तेज या शक्तिशाली है, वह सब उन्हीं की वजह से है। किसी अंश से उत्पन्न हुआ है।

शब्द, प्रणाली और गुणों में विभूति (श्लोक 33-38)
Bhagavat Gita भगवान अब भाषा, समय चक्र और इंसानी गुणों में अपनी मौजूदगी दिखाते हैं।
श्लोक 33:
अक्षरानामकारोऽस्मी द्वन्द्भः समासिकस्य च. अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः॥33॥
अर्थ: मैं अक्षरों में ‘अकार’ (‘अ’) हूँ। मैं समास में ‘द्वन्द्व समास’ हूँ। मैं शाश्वत समय हूँ, और मैं ही वह हूँ जो हर जगह का सामना कर रहा है।
विश्लेषण: Bhagavat Gita अक्षरों में ‘अकार’: संस्कृत में ‘अ’ को सभी अक्षरों की जड़ माना जाता है। इसके उच्चारण के बिना कोई भी व्यंजन संभव नहीं है।
समास में द्वंद्व: द्वंद्व समास समान महत्वपूर्ण शब्दों को जोड़ता है।
अमर समय: ‘अक्षय काल’ का मतलब है वह समय जो खत्म नहीं होता – हमेशा रहने वाला समय।
विश्वतोमुख धाता: यह भगवान हैं जो सभी दिशाओं में मुँह करके पूरी दुनिया को थामे हुए हैं।
श्लोक 34:
मृत्यु: सर्वहाराश्चहमुद्भवश्च भविष्यतम्। कीर्ति: श्रीर्वाक च नारीणां स्मृतिरेमेधा धृति: क्षमा।34 ॥
अर्थ: मैं मृत्यु हूँ, सबका नाश करने वाली हूँ, और भविष्य में जन्म लेने वालों की उत्पत्ति भी मैं ही हूँ। स्त्रियों में मैं कीर्ति, लक्ष्मी, वाणी, स्मृति, मेधा (बुद्धि), धृति (धैर्य) और क्षमा हूँ।
विश्लेषण: Bhagavat Gita मृत्यु और उत्पत्ति: भगवान सिर्फ़ जीवन के रचयिता ही नहीं हैं, बल्कि मृत्यु और भविष्य की रचना दोनों ही हैं, जो सृष्टि के चक्र को पूरा करते हैं।
स्त्रियों में गुण: भगवान स्त्रियों में मौजूद सात दिव्य गुणों को अपने दिव्य गुण मानते हैं, जो मानव समाज के लिए फ़ायदेमंद हैं। ऊँचा उठाते हैं।

श्लोक 35:
बृहत्साम तथा समनाम गायत्री छंदसमहम्। मासानां मार्गशीर्षोऽहमरतूनां कुसुमाकारः ॥35 ॥
अर्थ: मैं सामवेद के गीतों में बृहत्साम हूँ। मैं छंदों में गायत्री हूँ। महीनों में मैं मार्ग का नेता (मगशर) हूँ, और ऋतुओं में मैं वसंत (कुसुमाकर) हूँ।
श्लोक 36:
द्यूतं छल्यतामस्मी तेजस्तेजस्विनामहम्। जयोऽस्मी विश्यानोऽस्मी सत्त्वं सत्त्वतामहम् ॥ 36।
अर्थ: मैं धोखेबाजों में जुआरी हूँ। मैं तेजस्वी लोगों में सबसे तेजस्वी हूँ। मैं विजय (जय) हूँ, मैं दृढ़ संकल्प (व्यावसाय) हूँ, और मैं पुण्यात्माओं का सत्व (बाल) हूँ।
श्लोक 37:
वृष्णिनं वासुदेवोस्मि पांडवनं धनंजयः। मुनिनमप्याहम व्यासः कविनामुश्ना कविः ॥ 37 ॥
अर्थ: मैं वृष्णिवंशियों में वासुदेव (कृष्ण) हूँ। मैं पांडवों में धनंजय (अर्जुन) हूँ। ऋषियों में वेदव्यास हूँ, और कवियों में शुक्राचार्य हूँ।
श्लोक 38:
दंडो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिज्ञासुतम। मौनं चैवास्मि गुह्यानाम ज्ञानं ज्ञानवतमहम्। 38 ॥
अर्थ: मैं दबाने वालों (कंट्रोल करने वालों) में सज़ा हूँ। मैं जीत हासिल करने वालों की नीति हूँ। मैं रहस्यों में चुप हूँ, और ज्ञानियों में ज्ञान हूँ।
विश्लेषण: Bhagavat Gita सिस्टम की नींव: श्लोक 38 दिखाता है कि दुनिया का सिस्टम भगवान द्वारा कंट्रोल किया जाता है। सज़ा और नीति दोनों भगवान के रूप हैं।
खुद से ऊपर उठना: सबसे ज़रूरी: रहस्यों में मौन और ज्ञानियों में ज्ञान ही भगवान की मौजूदगी है। मौन ही रूहानी ताकत का सोर्स है।
सबसे अच्छा रिश्ता: श्लोक 37 में, कृष्ण खुद वृष्णि वंश (वासुदेव) में अपने रूप का वर्णन करते हैं और पांडवों में अर्जुन को अपना व्यक्तित्व मानते हुए उन्हें सबसे ऊंचा स्थान देते हैं।

विभूति योग का समापन (श्लोक 39-42)
Bhagavat Gita ये आखिरी चार श्लोक पूरे विभूति योग का सार बताते हैं और भक्त को परम सत्य का एहसास कराते हैं।
श्लोक 39:
भले ही सभी प्राणियों का बीज तद्धमार्जुन है, लेकिन यत्यास्यन्मय भूतचर्चाम् के बिना ऐसा नहीं है। 39॥
अर्थ: हे अर्जुन! मैं सभी प्राणियों का बीज (मूल कारण) हूँ। ऐसा कोई भी प्राणी, जंगम और अचल, मेरा नहीं है। ऐसा कुछ भी नहीं है जिसके बिना अस्तित्व हो।
विश्लेषण: Bhagavat Gita परम बीज: यह श्लोक सभी विवरणों का सार है। ईश्वर सर्वशक्तिमान का बीज है। जैसे बीज के बिना पेड़ संभव नहीं है, वैसे ही ईश्वर के बिना किसी भी चीज़ का अस्तित्व संभव नहीं है।
श्लोक 40:
नंथोस्ति माम दिव्यानां विभूतिनां परंतप। एष तुद्देशातः प्रोक्तो विभूतेर्विसंत्रो माया ॥ 40॥
अर्थ: हे परंतप! मेरी दिव्य देन का कोई अंत नहीं है। मैंने तुम्हें विभूति के इस क्षेत्र के बारे में संक्षेप में (मकसद के लिए) बताया है।
श्लोक 41:
यद्यद्विभूतिमत्सत्वं श्रीमधुर्जितमेव वा. तत्देवावगच्छ त्वं माम तेजोऽहमशसंभवम् ll 41ll
अर्थ: जो भी शुभ, लाभदायक या शक्तिशाली है, तुम उन सभी चीजों को मेरे ज्ञान में रखो। एक ही हिस्से से उत्पन्न जानकारी।
विश्लेषण: Bhagavat Gita व्याख्या का सार: यह श्लोक विभूति योग का सूत्र है। हर अच्छी चीज़ में भगवान को ढूंढने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन जहाँ भी श्रीमद (सुंदरता/कल्याण) है, वहाँ समझिए कि एनर्जी (शक्ति) का विभूतिमत (ऐश्वर्य) दिख रहा है और उसी के तेज के एक हिस्से से आया है। इससे भक्त हर जगह भगवान को महसूस कर सकता है।
श्लोक 42:
ओर बहुनैतेन कि ज्ञातेन तवार्जुन। विष्टाभ्याहमिदं कृत्स्नामेकंशेन स्थितो जगत् ॥।42॥
अर्थ: हे अर्जुन! तुम्हें यह सब जानने का क्या फायदा? मैं अपने एक अंश से ही पूरी दुनिया को थामे हुए हूँ।
विश्लेषण: Bhagavat Gita अंतिम और परम सत्य: यह श्लोक विभूति योग का अंतिम निष्कर्ष है। पूरी दुनिया भगवान के एक अंश में समाई हुई है। ये अनंत अभिव्यक्तियाँ भगवान की पूर्णता नहीं हैं, बल्कि उनकी अनंत शक्ति का एक बहुत छोटा सा हिस्सा हैं।

निष्कर्ष
Bhagavat Gita के दसवें चैप्टर (10.33-10.42) के ये आखिरी श्लोक विभूति योग का पूरा मतलब बताते हैं। है:
सबका मूल: ‘अ’ अक्षरों में, ‘द्वंद’ में, अनंत समय में, और सभी प्राणियों का बीज (मूल कारण) भगवान है। उनके बिना किसी भी चीज़ का होना मुमकिन नहीं है।
संक्षिप्त विवरण: क्योंकि भगवान के रूप अनंत हैं, इसलिए उन्होंने केवल प्रधान रूपों के बारे में बताया है। कृष्ण ने कहा।
ध्यान के लिए सूत्र: भक्त के लिए आखिरी सूत्र यह है कि, जहाँ भी चमक, सुंदरता और ऐश्वर्य की शक्ति दिखाई दे, उसे भगवान की महिमा का एक हिस्सा पहचानो।
अंश का रहस्य: भगवान का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि पूरा विशाल ब्रह्मांड उनकी अनंत शक्ति का एक छोटा सा हिस्सा है। यह केवल अंश में ही शामिल है।
इस तरह, श्री कृष्ण अर्जुन और सभी भक्तों को ऐसी समझ देते हैं कि, भले ही उनका पूरा रूप पहुंच से बाहर है, फिर भी भक्त हर जगह उनकी दिव्य मौजूदगी का अनुभव करके अनोखी भक्ति में स्थिर हो सकता है।