
इस सेक्शन में कर्म योग का तरीका और स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धि) की शुरुआत के बारे में बताया गया है।
योग का कौशल और स्थिर बुद्धि की नींव: गीता के दूसरे अध्याय के श्लोक 49 से 60 का गहन विश्लेषण
Bhagavat Gita का दूसरे अध्याय, ‘सांख्य योग’, आत्मा के रोज़ाना ज्ञान और धर्म के पालन के सिद्धांतों से जुड़ा है। स्थापना के बाद, अब प्रैक्टिकल तरीके पर फोकस किया गया है। श्लोक 47 और 48 में निष्काम कर्म की नींव रखने के बाद, श्री कृष्ण श्लोक 49 से 60 में बताते हैं कि निष्काम भावना को कैसे मज़बूत करें, और स्थिर बुद्धि (स्थितप्रज्ञ) वाले व्यक्ति के लक्षण क्या हैं। चलिए शुरू करते हैं।
1.बुद्धि योग की श्रेष्ठता और कर्म में कुशलता (श्लोक 49-53)

Bhagavat Gita श्री कृष्ण यह साफ़ करते हैं कि फल (सकम कर्म) चाहने वाला कर्म कितना हल्का है, और उससे कितना मुक्त है। इसके लिए बुद्धि योग सबसे अच्छा कैसे है?
श्लोक 49:
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाध्नज्जय। बुद्धु शरणमनविच कृपणः फलहेतवः ॥ 49।
अर्थ: हे धनंजय (अर्जुन), फल की चाहत वाला कर्म बुद्धि के योग की तुलना में बहुत नीच (अवरम्) है। तुम बुद्धि की शरण में जाओ (निस्वार्थ भाव से)। जो लोग फल के पीछे भागते हैं, वे कंजूस होते हैं।
विश्लेषण: Bhagavat Gita श्री कृष्ण ने सकाम कर्म को ‘अवरम्’ (नीच) बताया है। जो लोग सिर्फ़ फल पाने की इच्छा से कर्म करते हैं, उन्हें ‘कृपणाः’ (कृपणाः, कंजूस) कहा जाता है, क्योंकि वे आत्मा के बड़े लक्ष्य को छोड़कर, सिर्फ़ कुछ समय के भौतिक नतीजों के पीछे भागते हैं।
श्लोक 50:
बुद्धियुक्तो जहातिः उभे सुकृतदुष्कृते। तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्। 50।
अर्थ: बुद्धि से लैस इंसान इस दुनिया में पुण्य और पाप दोनों को छोड़ देता है। इसलिए तुम योग में लग जाओ। काम में कुशलता ही योग है।
विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक कर्म योग की परिभाषा और उसके फायदे बताता है। जो इंसान बिना स्वार्थ के बुद्धि से काम करता है, वह पुण्य (अच्छा फल) और पाप (बुरा फल) दोनों के बंधन से मुक्त हो जाता है। ऐसा होता है। यहाँ “योग कर्मसु कौशलम्” (काम में कुशलता ही योग है) गीता के सबसे मशहूर सूत्रों में से एक है। कुशलता का मतलब है नतीजे की परवाह किए बिना काम करना।

श्लोक 51:
कर्मजन बुद्धियुक्त हि फलं त्यक्त्वा मनीषिनः। जन्मबंधनविनिर्मुक्तः पदं गच्चन्त्यनामयम् ॥ 51 ॥
अर्थ: निस्वार्थ बुद्धि वाले बुद्धिमान लोग अपने कर्मों के फल को छोड़ देते हैं और जन्म पाते हैं। वह बंधन से मुक्त हो जाता है और रोग-मुक्त अवस्था (मोक्ष) को प्राप्त करता है।
विश्लेषण: Bhagavat Gita निष्काम कर्म योग का अंतिम उद्देश्य स्पष्ट है: जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्ति पाना। यह मोक्ष केवल फलों को त्यागने से ही संभव होता है।
श्लोक 52:
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिव्यतितरिष्यति। तदा ज्ञातासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ll। 52॥
अर्थ: जब तुम्हारी बुद्धि आसक्ति के दलदल को पूरी तरह पार कर लेगी, तो तुम सुन पाओगे और जो भी सुनेगा, उससे मुझे वैराग्य मिल जाएगा।
विश्लेषण: Bhagavat Gita आसक्ति ही अर्जुन के दुख का मूल कारण थी। जब ‘मोहकलिलं’ (मोहनु कादव) हट जाता है, तो व्यक्ति ‘निर्वेदं’ (वैराग्य) प्राप्त कर लेता है। इसका मतलब है कि व्यक्ति को इस बात की चिंता नहीं रहती कि उसे और क्या सुनना या जानना चाहिए, क्योंकि उसने सच जान लिया है।
श्लोक 53:
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला। समाधवाचला बुद्धस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥ 53॥
अर्थ: जब आप समाधि में थे, तब आपका मन श्रुतियों (वेदों के कर्मकांड) से भटक गया था। (स्वयं के रूप में) आप अचल और स्थिर हो जाएँगे, तब आपको योग मिलेगा।
विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक बुद्धि की स्थिरता का महत्व दिखाता है। जब तक बुद्धि शास्त्रों की अलग-अलग बातों में भटकती रहती है, तब तक मोक्ष संभव नहीं है। आत्म-चिंतन में स्थिर (अचला) होने पर ही मनुष्य को योग (आत्म-साक्षात्कार) मिलता है। કરે છે.

2.स्थितप्रज्ञता के प्रश्नोत्तर का आरम्भ (श्लोक 54-60)
Bhagavat Gita बुद्धि की स्थिरता के बारे में सुनने के बाद, अर्जुन अब एक ऐसे मनुष्य के बारे में सवाल करता है जिसकी बुद्धि स्थिर है।
श्लोक 54:
अर्जुन उवाच की भाषा: स्थितप्रज्ञस्य समाधिस्थस्य केशव। स्थितधीः किं प्रभाशेत् किमासीत् व्रजेत् किम् ॥ 54॥
अर्थ: अर्जुन ने कहा: हे केशव (कृष्ण), जो समाधि (मन की चेतना) में स्थित है। मनुष्य की क्या विशेषताएं हैं? स्थिर बुद्धि वाला वह मनुष्य कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?
विश्लेषण: Bhagavat Gita यह सवाल न केवल ज्ञान बल्कि अभ्यास भी मांगता है। अर्जुन जानना चाहता है कि ज्ञान वाले व्यक्ति का आचरण (भाषा-बोलना, बैठना-बैठना, व्रजेत-चालूण) कैसा होता है? यह सवाल गीता की सबसे बड़ी शिक्षाओं में से एक की शुरुआत करता है।
श्लोक 55:
श्री भगवानुवाच प्रजाहति यदा कमंसरवनपार्थ मनोगतां। आत्मन्येवत्मना तुष्ठः स्थितप्रज्ञास्तदोच्यते ॥ 55॥
अर्थ: श्री भगवान ने कहा: हे पार्थ, जब कोई इंसान अपने मन की सभी इच्छाओं को पूरी तरह से त्याग देता है। अगर कोई ऐसा करता है, और आत्मा के ज़रिए आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, तो उसे स्थितप्रज्ञ कहते हैं।
विश्लेषण: Bhagavat Gita यह स्थितप्रज्ञ की पहली और मुख्य परिभाषा है। स्थिर बुद्धि वाला इंसान वह है जिसके मन से इच्छाएं पूरी तरह से चली गई हैं, और जिसकी खुशी बाहरी चीज़ों में नहीं, बल्कि अपनी आत्मा में है (आत्मन्येवात्मनं तुष्टः)।

श्लोक 56:
दुखेष्वनुद्विग्नमनाह सुखेषु विगतस्पृहः. वीतरागभयक्रोधः स्थितधीरमुनिरुच्यते॥ 56॥
अर्थ: जिसका मन दुखों से विचलित नहीं होता, जिसे सुखों की इच्छा नहीं होती, और जिस ऋषि से आसक्ति, भय और क्रोध दूर हो गए हैं, उसे स्थिर बुद्धि वाला कहा जाता है।
विश्लेषण: Bhagavat Gita ये स्थितप्रज्ञ की आंतरिक मनोवैज्ञानिक विशेषताएं हैं। वह सुख और दुख के द्वंद्वों से मुक्त है और मुख्य रूप से ‘वीतरागभयक्रोधः’ (वीतरागभयक्रोधः) से मुक्त है।
श्लोक 57:
यः सवर्तवाराणभिष्णेहस्तत्प्रप्या सुभाशुभम्। नाभिनन्दति न देवेस्ति तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठा ॥ 57॥
अर्थ: जो व्यक्ति हर जगह आसक्ति से मुक्त है, जिसे अच्छी या बुरी चीजें मिलने पर खुशी नहीं होती। न ही वह द्वेष रखता है, उसकी बुद्धि स्थिर है।
विश्लेषण: Bhagavat Gita यहाँ स्थितप्रज्ञ की बाहरी साधना बताई गई है। वह पक्षपात से मुक्त है। अगर उसे अच्छा (सफलता, प्रशंसा) मिलता है तो वह खुश नहीं होता, और अगर उसे बुरा (असफलता, आलोचना) मिलता है तो वह घृणा महसूस नहीं करता।
श्लोक 58:
यदा संहर्ते चायं कुर्मोङ्गनिव सर्वश। इन्द्रियानिन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठा ॥ 58॥
अर्थ: जब यह इंसानी कछुआ अपने अंगों को सिकोड़ लेता है, तो उसकी इंद्रियां सभी तरह की कामुक चीज़ों से दूर हो जाती हैं, और उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है।
विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक इंद्रियों पर कंट्रोल का एक बहुत अच्छा उदाहरण है। कछुए की तरह, स्थिर बुद्धि वाला इंसान अपनी मर्ज़ी से इंद्रियों को चीज़ों से हटा सकता है। यह इंद्रियों पर कंट्रोल स्थिर बुद्धि के लिए ज़रूरी है।

श्लोक 59:
विषय विनिवर्तन्ते निरहरस्य देहिनः। रसावर्जनं रसोपायस्य परम दृष्ट्वा निवर्तते ॥59॥
अर्थ: जो रोगी भोजन नहीं कर रहा है, उसके शरीर की वस्तुएं भले ही चली जाएं, लेकिन उन वस्तुओं में रुचि (आसक्ति) बनी रहती है। हालांकि, इस स्थितप्रज्ञ की रुचि भी परम तत्व (आत्मा) को देखने के बाद निवृत्त हो जाती है।
विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक इंद्रियों के नियंत्रण और आसक्ति से मुक्ति के बीच का अंतर बताता है। केवल उपवास के बाहरी त्याग से वस्तुओं का त्याग होता है, लेकिन उसका स्वाद मन में बना रहता है। लेकिन ईश्वर (परम दृष्ट्वा) का अनुभव होने के बाद, इन विषयों में रुचि भी चली जाती है।
श्लोक 60:
यततो ह्यापि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः। इन्द्रियाणि प्रमाथिनी हरन्ति प्रसभं मनः ॥60॥
अर्थ: हे गणिका, इंद्रियां उस आदमी को भी जबरदस्ती दूर भगा देती हैं जो कोशिश करता है और समझदार है। उसका मन हरा हो जाता है।
विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक इंद्रियों को कंट्रोल करने की चुनौतियों के बारे में चेतावनी देता है। भले ही इंसान समझदार हो और कोशिश करे, लेकिन बेकाबू इंद्रियां उसके मन को चीज़ों की तरफ खींच सकती हैं।

निष्कर्ष: स्थितप्रज्ञा की ओर पहला कदम
Bhagavat Gita श्लोक 49 से 60 का यह हिस्सा कर्म योग और स्थितप्रज्ञा के ज्ञान को प्रैक्टिकल रूप देता है। श्री कृष्ण बताते हैं कि असली हुनर काम करना है लेकिन नतीजों से बेफिक्र रहना है। इंद्रियों पर कंट्रोल और खुद को खुश रखना ही स्थिर बुद्धि की नींव है। इसी नींव के आधार पर, आगे के श्लोकों में श्री कृष्ण इंद्रियों पर कंट्रोल न रखने का महत्व समझाएंगे। इसके नतीजे कितने गंभीर होते हैं।