
भगवद् गीता: अध्याय सोलहवाँ (दैवासुरसम्पद्विभाग योग) – श्लोक 9 से 16: आसुरी प्रवृत्तियों, इरादों और विनाशकारी मार्गों का चित्रण
Bhagavat Gita के सोलहवाँ अध्याय के प्रथम आठ श्लोकों में भगवान कृष्ण दैवी और आसुरी अवस्थाओं के मूल गुणों का वर्णन करते हैं। अब, श्लोक 9 से 16 में, भगवान आसुरी प्रवृत्ति वाले लोगों के विचारों, जीवनशैली, अहंकारी इरादों और विनाशकारी कार्यों का गहन मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक वर्णन करते हैं। ये श्लोक बताते हैं कि कैसे अज्ञानता और अहंकार व्यक्ति के जीवन का केंद्र बन जाते हैं और इसके क्या परिणाम होते हैं।
ये आठ श्लोक आसुरी लोगों के जीवन को तीन मुख्य भागों में विभाजित करते हैं: (1) उनका विनाशकारी स्वभाव, (2) उनकी अंतहीन इच्छाएँ और गलत इरादे, और (3) उनका अहंकारी और दंभी दृष्टिकोण।
खंड 1: संसार का विनाशकारी और बुरा व्यवहार (श्लोक 9-10)

Bhagavat Gita भगवान श्रीकृष्ण सबसे पहले राक्षसों की क्रूरता और अज्ञानता के कारण होने वाले बुरे कर्मों का वर्णन करते हैं।
1.1. श्लोक 9 का विस्तृत विश्लेषण: विनाश और पतन
एतं दृष्टमवष्टभ्य नष्टतमनोऽलपुद्धयः। प्रभावान्त्युग्रक्रमणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥9॥
अर्थ: ऊपर वर्णित (श्लोक 8 में) राक्षसी दृष्टिकोण को धारण करके, वे (राक्षसी लोग) भ्रष्ट आत्माएँ (अपना वास्तविक स्वरूप भूल चुके), मंदबुद्धि (सत्य और असत्य का भेद न जान पाने वाले) बन जाते हैं और हिंसक कर्म (भयानक, क्रूर कर्म) करते हैं। वे संसार का नाश करने और उसके शत्रु (हानिकारक) बनकर घूमने के लिए ही जन्म लेते हैं।
विस्तृत व्याख्या:
Bhagavat Gita दुष्ट आत्मा का अर्थ: राक्षस लोग अपने वास्तविक दिव्य स्वरूप को भूल चुके होते हैं। वे स्वयं को केवल भौतिक शरीर, इंद्रियाँ और मन ही मानते हैं। इस आत्म-विस्मृति के कारण, वे क्रूर कर्म करने से नहीं हिचकिचाते।
अल्पबुद्धय: (मंदबुद्धय): उनकी बुद्धि भौतिक सफलता और इंद्रिय सुखों तक ही सीमित रहती है। वे जीवन, धर्म और अध्यात्म के गहन सत्यों को समझने की क्षमता खो देते हैं। यद्यपि उनकी बुद्धि तीक्ष्ण होती है, फिर भी वह छोटी होती है क्योंकि वह क्षणिक वस्तुओं पर केंद्रित रहती है।
उग्र कर्मण: (भारी कर्म): राक्षस लोगों के कर्म क्रूर प्रकृति के होते हैं। वे हिंसा, शोषण, अन्याय और धर्म के विनाश में लिप्त रहते हैं। उनका मानना है कि शक्ति ही सत्य है और इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कोई भी अनैतिक साधन उचित है।
क्षय जगत: अहिता: (संसार के विनाश के लिए): राक्षसी लोग अपने स्वार्थ में इतने लीन होते हैं कि उनके कर्म न केवल स्वयं का, बल्कि समाज और संपूर्ण प्रकृति का भी विनाश कर देते हैं। उन्हें दूसरों के दुखों की कोई चिंता नहीं होती, इसलिए वे संसार के शत्रु के समान होते हैं।
1.2. श्लोक 10 का विस्तृत विश्लेषण: इच्छा पूर्ति के लिए ढोंग
कामश्रित्य दुष्पुरं दंभमानमदानवितः। मोहं घृतवतसद्ग्रहणप्रवर्तन्ता तेशुचिव्रतः ॥10॥
अर्थ: (उनकी) अतृप्त इच्छाएँ होती हैं, वे पाखंड, अभिमान और नशे से भरे होते हैं, और मोहवश अधार्मिक इच्छाओं को अपनाते हैं, अशुद्ध व्रतों का पालन करते हैं और बुरे कर्मों में लिप्त रहते हैं।
विस्तृत व्याख्या:
Bhagavat Gita दुष्पुरम कामम् (अतृप्त इच्छाएँ): आसुरी लोगों की इच्छाएँ कभी तृप्त नहीं होतीं। एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी उत्पन्न हो जाती है। यह अंतहीन लालसा उन्हें निरंतर प्रेरित करती रहती है। वे अपनी अंतहीन इच्छाओं को ही जीवन का उद्देश्य मानते हैं।
पाखंड, अभिमान और नशा:
पाखंड: धर्मी होने का दिखावा करना, परन्तु अपने हृदय में छल-कपट रखना।
अहंकार: पूजा और सम्मान की अत्यधिक अपेक्षाएँ रखना।
नशा: धन, पद, शक्ति या सौंदर्य के अभिमान में मदिरापान करना।
मोहता ग्रहित्वा असदग्रह: वे अपने स्वार्थी लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए गलत और अधर्मी सिद्धांतों का पालन करते हैं। जैसे, “जो जीतता है वही सही है,” “शक्ति ही धर्म है,” “आनंद ही मोक्ष है।” ये गलत विचार उनके अधर्म को वैचारिक आधार प्रदान करते हैं।
अशुचिव्रत: (अशुद्ध व्रत/नियम): वे पवित्रता (स्वच्छता) में विश्वास नहीं करते। यदि वे किसी व्रत या नियम का पालन भी करते हैं, तो वह पाखंड से भरा होता है और अपवित्र उद्देश्यों के लिए होता है।
खंड 2: अंतहीन चिंताएँ और अहंकारी संकल्प (श्लोक 11, 12)

Bhagavat Gita राक्षसों का आंतरिक जगत सदैव चिंताओं, मृगतृष्णा जैसी आशाओं और अधार्मिक लक्ष्यों से भरा रहता है।
2.1. श्लोक 11 का विस्तृत विश्लेषण: चिंताओं और भोगों में डूबा हुआ
चिंतामापरिमेयान च प्रलयंतमुपाश्रित:। कामोपाभोगपरं एतावादितिष्टिया: ॥11॥
अर्थ: (वे) ऐसी चिंताओं में उलझे रहते हैं जो अंत तक तृप्त नहीं हो सकतीं। उनका मानना है कि सुख ही सर्वोच्च लक्ष्य है और जीवन में उससे बढ़कर कुछ भी नहीं है।
विस्तृत व्याख्या:
Bhagavat Gita प्रलयन्तं चिन्तं (मृत्युपर्यन्त चिंता): आसुरी व्यक्ति का मन सदैव चिंताओं और भय में डूबा रहता है। वे भविष्य की योजनाओं, शत्रुओं के भय, धनहानि के भय और ईर्ष्या में डूबे रहते हैं। उनकी चिंताएँ इतनी अंतहीन होती हैं कि वे मृत्युपर्यन्त उनका पीछा नहीं छोड़तीं।
कामोपभोगपरम् (सुख ही परम लक्ष्य है): आसुरी मानसिकता का सर्वोच्च सिद्धांत आनंद है। वे मानते हैं कि इंद्रियों के माध्यम से भौतिक सुखों का भोग करना ही जीवन का अंतिम और सर्वोच्च लक्ष्य है।
एतवता इति निष्कर्ष: (यही सब है): वे जीवन में धर्म, मोक्ष, अध्यात्म या सदाचार जैसे किसी उच्च लक्ष्य को स्वीकार नहीं करते। उनके लिए, ‘जो कुछ भी विद्यमान है, वह यह भौतिक संसार और इसके सुख हैं।’ यही संकीर्ण दृष्टिकोण उनके सभी बुरे कर्मों का स्रोत है।
2.2. श्लोक 12 का विस्तृत विश्लेषण: आशा के बंधन
आशापशातिरब्द्धाःकामक्रोधपरायण: एहन्ते कम्भोगार्थमन्येनार्थसंचयन् ॥12॥
अर्थ: वे काम और क्रोध से भरे हुए हैं, वासना (आशापाश) के सैकड़ों बंधनों से बंधे हुए हैं। वे अपनी वासनाओं और तृष्णाओं की पूर्ति के लिए अन्यायपूर्वक धन संचय करने की निरंतर इच्छा रखते हैं।
विस्तृत व्याख्या:
Bhagavat Gita आशापाश: धन का अन्यायपूर्ण संचय: अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए उन्हें अपार धन की आवश्यकता होती है, और इस धन को प्राप्त करने में उन्हें न्याय और अन्याय में कोई अंतर नहीं दिखता। चोरी, धोखाधड़ी, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, शोषण – किसी भी तरह से धन संचय करना उनका धर्म बन जाता है।
खंड 3: अहंकारी निर्णय और अहंकारी योजनाएँ (श्लोक 13, 14, 15, 16)

Bhagavat Gita अगली चार पंक्तियाँ राक्षसों की अहंकारी मानसिकता को उनकी वर्तमान उपलब्धियों और भविष्य की महत्वाकांक्षाओं पर आधारित ‘संवाद’ के रूप में दर्शाती हैं।
3.1. श्लोक 13-14: स्वाभिमान की बात करें
इदमाद्या मया लब्धामिदं प्रापस्याम् मनोरथम्। इदमस्तेदमपि मे भविष्यति पुनर्धानम्। ॥13॥
असः मया हतः शत्रुर्निष्य चप्रणापि। ईश्वरोरोमनहं भोगा सिद्धोमन बलवंसुखि। ॥14॥
अर्थ: (श्लोक 13): “आज मैंने यह प्राप्त कर लिया है, और मैं यह इच्छा भी पूरी करूँगा। मेरे पास बहुत धन है, और भविष्य में मैं और भी अधिक धन प्राप्त करूँगा।”
अर्थ: (श्लोक 14): “मैंने उस शत्रु का वध कर दिया है, और मैं अन्य शत्रुओं का भी वध करूँगा। मैं ईश्वर हूँ, मैं भोक्ता हूँ, मैं पूर्ण, शक्तिशाली और सुखी हूँ।”
विस्तृत व्याख्या:
Bhagavat Gita अहंकार की त्रिमूर्ति (इदा, आद्या, माया): एक आसुरिक व्यक्ति का जीवन इन तीन शब्दों के इर्द-गिर्द घूमता है: “आज,” “मैं,” और “यह वस्तु।” वह केवल वर्तमान भौतिक उपलब्धियों को ही सत्य मानता है।
दृढ़ संकल्प और आत्म-प्रशंसा: “मैं यह प्राप्त करूँगा,” “मेरे पास यह है,” जैसे संकल्प और शब्द उसके मन में निरंतर घूमते रहते हैं। वह सदैव अपनी महानता का गुणगान करता रहता है।
शत्रुओं का नाश: आसुरिक स्वभाव में ईर्ष्या और द्वेष प्रबल होते हैं। वे तभी सफल महसूस करते हैं जब वे अपने “शत्रुओं” (प्रतिस्पर्धियों) का नाश करने में सक्षम होते हैं। ये शत्रु न केवल मनुष्य हो सकते हैं, बल्कि धार्मिक या नैतिक मूल्य भी हो सकते हैं।
झूठी ईश्वरीयता: “मैं ईश्वर हूँ, मैं भोक्ता हूँ” – यह घोषणा राक्षसी मानसिकता की पराकाष्ठा है। वे मानते हैं:
मैं ईश्वर हूँ: मैं नियन्ता हूँ, मैं सर्वोच्च हूँ, मुझसे ऊपर कोई नहीं है।
मैं भोक्ता हूँ: केवल मुझे ही भोगने का अधिकार है।
मैं पूर्ण हूँ: मैंने सब कुछ प्राप्त कर लिया है।
मैं बलवान और सुखी हूँ: शक्ति और सुख मेरे हैं।
3.3. श्लोक 15-16: धन, शक्ति और पतन का मार्ग
अधुऽऽऽजनवानस्मि कोཽन्योཽस्ति समान प्रेम। यक्ष्य दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञविमोहितः ॥15॥
अन्येच्छत्वभरंता मोहजालसमवृताः। प्रसक्तः कामभोगेषु पातान्ति नरकेशुचौ ॥16॥
अर्थ: (श्लोक 15): “मैं धनवान हूँ, मैं उच्च कुल का हूँ। मेरे समान और कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा और (दिखावे के लिए) सुख भोगूँगा।” – इस प्रकार वे अज्ञान से मोहित हो जाते हैं।
अर्थ: (श्लोक 16): नाना प्रकार की चिंताओं से व्याकुल, मोह के जाल में घिरे और इंद्रिय सुखों में आसक्त, ये लोग अंततः अपवित्र नरक (अशुचौ नरके) में गिरते हैं।
विस्तृत व्याख्या:
Bhagavat Gita अध्याद्भिजानवानास्मि (धन और कुल का अभिमान): आसुरी व्यक्ति अपने धन (अध्याद्भिजानवानास्मि) और उच्च कुल (अभिजान) पर अभिमान करता है। वह स्वयं को अन्य सभी से श्रेष्ठ समझता है।
दिखावटी कर्म: “यक्षया (मैं यज्ञ करूँगा), दास्यामि (मैं दान दूँगा)।” ये कर्म दिखावे के लिए, स्वर्ग प्राप्ति के लिए होते हैं, लेकिन हृदय में पवित्रता का अभाव होता है।
मोह में फँसे हुए: आसुरी व्यक्तियों की अनेक चिंताएँ (अनेकचित्तविभ्रंति) उन्हें निरंतर मोह में फँसाए रखती हैं। वे मोह के जाल में इतने उलझे रहते हैं कि उनसे मुक्त होना उनके लिए असंभव हो जाता है।
अंतिम अवस्था (पतन्ति नरके): इंद्रिय सुखों में अत्यधिक आसक्ति (प्रसक्त:) और अज्ञान के कारण आसुरी व्यक्ति पतित हो जाते हैं। मृत्यु के बाद, वे अपवित्र नरक (अशुचौ नरके) में गिरते हैं, जो उनकी क्रूर और पापमय जीवनशैली का परिणाम है।

निष्कर्ष: राक्षसी मार्ग और उसके परिणाम
Bhagavat Gita के 16वें अध्याय के इस मध्य भाग के श्लोक (9 से 16) आसुरी प्रवृत्तियों वाले जीवन का संपूर्ण चित्र प्रस्तुत करते हैं। यह चित्र न केवल आसुरी प्रवृत्तियों की पहचान के लिए है, बल्कि हमारे अपने मन में ऐसे विचारों और संकल्पों की पहचान के लिए भी है।
आसुरी प्रवृत्तियों का सारांश:
अज्ञान दृष्टि: ईश्वरविहीन संसार को सुख और वैभव का स्थान मानना।
अनंत वासना: अतृप्त इच्छाओं और चिंताओं का निरंतर चक्र।
विनाशकारी कर्म: अन्याय से धन अर्जित करना और हिंसक कर्मों से संसार का विनाश करना।
अंतिम अवस्था: अहंकार, आसक्ति और सुख के कारण आसक्ति के जाल में फँसकर नरक में पहुँचना।
भगवान कृष्ण का यह वर्णन मनुष्य को चेतावनी देता है कि यदि वह जीवन में धर्म, सत्य और दैवीय गुणों का त्याग कर केवल अहंकार और स्वार्थ का अनुसरण करता है, तो उसका मार्ग, चाहे वह भौतिक सफलताओं से भरा ही क्यों न हो, अंततः दुख और विनाश की ओर ले जाएगा।