
मोक्ष के दो मार्ग: अविनाशी धाम और समय का रहस्य (गीता आठवां अध्याय 21-28)
Bhagavat Gita का आठवां अध्याय ‘अक्षरब्रह्म योग’ मौत के समय ज्ञान और भक्ति के ज़रिए पाने का सबसे अच्छा रास्ता है। इसे पाने के तरीके बताता है। पिछले श्लोकों (8.11-20) में, भगवान ब्रह्मा ने दिन और रात के चक्र और शाश्वत और अविनाशी तत्व के बारे में बताया है। बताया है।
Bhagavat Gita इन आखिरी आठ श्लोकों (8.21-28) में, कृष्ण मौत के बाद के दो पड़ावों, परम अविनाशी निवास के स्वरूप को साफ़ करते हैं। गतियों (शुक्ल और कृष्ण) का रहस्य बताते हैं, और यह भी कि भक्ति कर्म, ज्ञान और तपस्या से ज़्यादा अनोखी क्यों है। वह यह साबित करके चैप्टर खत्म करते हैं कि यह सबसे अच्छा है।

परम अविनाशी निवास (श्लोक 21-22)
Bhagavat Gita भगवान ने श्लोक 20 में जो शाश्वत अव्यक्त भावना बताई है, उसे यहाँ समझाया गया है। वह दी गई है, और वहाँ पहुँचने का रास्ता भी बताया गया है।
श्लोक 21:
अव्यक्तोक्षर इत्युक्तस्तमाहु परम गतिम्। यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम् ॥ 21 ॥
अर्थ: जो अव्यक्त है उसे अक्षर (अविनाशी) कहते हैं, और उसे परम गति कहते हैं। जिसे पाकर वापस नहीं लौटना पड़ता, वही मेरा परम धाम है।
श्लोक 22:
पुरुष स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्तवनन्याया। यस्यन्स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं तत्म् ॥ 22॥
अर्थ: हे पार्थ! जिसके अंदर सभी भूत (प्राणी) रहते हैं और जिसके द्वारा यह पूरी दुनिया मौजूद है, वह परम पुरुष है। यह केवल अनन्य भक्ति से ही प्राप्त किया जा सकता है।
विश्लेषण: Bhagavat Gita धाम का रूप: भगवान का धाम अव्यक्त (इंद्रियों से ऊपर) और अक्षर (क्यारे नाश पाल्मे) તેવું) છે। वह परम अवस्था (मोक्ष) है, जहाँ पहुँचने के बाद आत्मा को पुनर्जन्म (नि निवर्तान्ते) नहीं लेना पड़ता।
पाने का रास्ता: यह परम सत्ता योग या ज्ञान के मुश्किल कामों से नहीं, बल्कि सिर्फ़ अनोखी भक्ति से मिलती है। इसे सिर्फ़ भक्ति (भक्त्या लभ्यस त्व्व अनन्या) से ही पाया जा सकता है। अनोखी भक्ति का मतलब है किसी और की परवाह किए बिना अपना मन सिर्फ़ भगवान पर लगाना।
सर्वव्यापकता: श्लोक 22 यह फिर से बताता है कि परम सत्ता सभी जीवों के दिलों में रहती है और पूरी दुनिया में फैली हुई है।

दो गतियों का रहस्य: शुक्ल और कृष्ण (श्लोक 23-26)
Bhagavat Gita अब कृष्ण समय का राज़ बताते हैं, जब योगी अपना शरीर छोड़ता है, तो उसे मोक्ष मिलता है या वह वापस आ जाता है। इस समय के दो रास्ते ‘शुक्ल (रोशनी)’ और ‘कृष्ण (अंधेरा)’ के नाम से जाने जाते हैं।
श्लोक 23:
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः। प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भारतर्षभा ॥23 ॥
अर्थ: हे भारत श्रेष्ठ! जिस समय योगियों ने शरीर छोड़ा, उस समय की अनावृत्ति और आवृत्ति, मैं तुम्हें समय बताता हूँ।
श्लोक 24: शुक्ल गति (प्रकाश का मार्ग)
अग्निर्ज्योतिरह शुक्लः शन्मासा उत्तरायणम्। तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनः ॥ 24 ॥
अर्थ: अग्नि, प्रकाश, दिन, शुक्ल पक्ष और उत्तरायण के छह महीने – जो लोग इस मार्ग से ब्रह्म को जानते हैं। शरीर छोड़कर, वह ब्रह्म को प्राप्त करता है।
श्लोक 25: कृष्ण गति (अंधकार का मार्ग)
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः शन्मासा दक्षिणायनम्। तत्र चन्द्रसं ज्योतिरयोगी प्राप्य निवर्तते ॥ 25॥
अर्थ: धुआँ, रात, साथ ही कृष्ण पक्ष और दक्षिणायन के छह महीने – जो योगी इस तरह शरीर छोड़ता है, वह चाँद की रोशनी (स्वर्गीय सुख) पाकर फिर से वापस आ जाता है।
श्लोक 26:
शुक्लकृष्णे गति ह्यते जगतः शाश्वते मते। 26॥
अर्थ: दुनिया के दो रास्ते, उज्जवल (शुक्ल) और अंधकारमय (कृष्ण), शाश्वत माने गए हैं। एक (शुक्ल) से बिना दोहराव वाली गति (मोक्ष) मिलती है, और दूसरे (कृष्ण) से फिर वापस आना पड़ता है।
विश्लेषण: Bhagavat Gita समय की भूमिका: इन श्लोकों में समय का ज़िक्र (दिन, रात, शाम, उत्तरायण/दक्षिणायन) है। अर्चि मार्ग (शुक्ल गति) और धूम मार्ग (कृष्ण गति) के निशान हैं, जो उपनिषदों से आते हैं।
शुक्ल गति: यह देवयान मार्ग है, जो बुद्धिमान और शुद्ध उपासकों के लिए है। इस प्रकाश के मार्ग से जाने वाला जीव धीरे-धीरे ब्रह्म को प्राप्त करता है और कभी वापस नहीं आता।
कृष्ण गति: यह पितृ मार्ग है। जो योगी इस मार्ग पर चलता है, वह स्वर्ग (चांदनी) के सुख भोगने के बाद दोबारा जन्म लेता है।
सनातन मार्ग: श्लोक 26 इन दो मार्गों को दुनिया के शाश्वत (अनंत) मार्गों के रूप में स्थापित करता है।

ज्ञान का फल और भक्ति की श्रेष्ठता (श्लोक 27-28)
Bhagavat Gita आखिर में, कृष्ण के भक्त को श्रेष्ठता और ज्ञान मिलने का जो आखिरी नतीजा होता है, वह इन दोनों रास्तों का ज्ञान पा लेता है। आइए समझाते हैं।
श्लोक 27:
नैते श्रीति पार्थ जननयोगी मुह्यति कश्चन। तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥27 ॥
अर्थ: हे पार्थ! कोई भी योगी इन दोनों रास्तों को जानकर मोहित नहीं होता। इसलिए हे अर्जुन! तुम हर समय योगयुक्त (भक्ति में दृढ़) रहो।
विश्लेषण: Bhagavat Gita योगी को अब समय के इन दो रास्तों के बारे में पता चल गया है। वह जानता है कि कौन सा रास्ता पुनर्जन्म की ओर ले जाता है और कौन सा रास्ता मोक्ष की ओर ले जाता है। यह ज्ञान मिलने के बाद, वह अपने कर्मों और यादों से कृष्ण के रास्ते का शिकार नहीं होता। इसलिए, कृष्ण अर्जुन को हमेशा योग में रहने की सलाह देते हैं।
श्लोक 28:
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्। अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परम स्थानमुपैति चाद्यम्। 28॥
अर्थ: जो योगी इन (ऊपर बताए गए सच) को जानता है, जो वेदों की पढ़ाई, यज्ञ, तपस्या और दान में लगा रहता है। पुण्य का फल कहलाता है, वह सबसे ऊपर होता है और उस परम स्थान (भगवान के घर) की ओर ले जाता है जो सबका आरंभ है। मिलता है।
विश्लेषण: Bhagavat Gita भक्ति की श्रेष्ठता: यह श्लोक आठवें अध्याय का निष्कर्ष है। वेदों की पढ़ाई, यज्ञ करना, तपस्या करना या दान देना – इन सभी कामों से जो पुण्य और फल मिलते हैं, उन सबसे बड़ा फल उस योगी को मिलता है जो भगवान को उनके असली रूप में जानता है और भक्ति करता है।
अंतिम लक्ष्य: इस ज्ञान के ज़रिए योगी परम स्थानं उपैति च आध्याम् (सबसे पुराना और सबसे बड़ा निवास) तक पहुँचता है। प्राप्त करता है। इससे यह साबित होता है कि भक्ति (निष्काम भक्ति) ही मोक्ष का सबसे अच्छा और सीधा रास्ता है।

निष्कर्ष
Bhagavat Gita के आठवें अध्याय (8.21-8.28) के आखिरी श्लोक मोक्ष के रास्ते की पूरी तस्वीर बताते हैं। है:
सनातन धाम: भगवान का घर अविनाशी, बिना दिखे और दोबारा नहीं आता। यही परम गति है।
पाने का तरीका: इस परम सत्ता को सिर्फ़ अनन्य भक्ति से ही पाया जा सकता है।
समय के नियम: मौत के बाद दो रास्ते हैं: शुक्ल गति (जो मोक्ष की ओर ले जाती है) और कृष्ण गति (जो स्वर्ग की ओर ले जाती है। खुशी देती है और दोबारा जन्म देती है।
भक्त की जीत: जो योगी इन दोनों गतियों का राज़ जानता है, वह मोहित नहीं होता।
सबसे अच्छा कर्म: अनन्य भक्ति, वेदों की पढ़ाई, यज्ञ, तपस्या और दान से मिलने वाला फल। यह इससे कई गुना बेहतर है, जो योगी को सीधे परम स्थान (भगवान के घर) तक ले जाता है।
इस तरह, कृष्ण भरोसा दिलाते हैं कि अपना कर्तव्य करते हुए, एक मन से भक्ति में दृढ़ रहना चाहिए, यह मुक्ति के लिए सबसे बड़ी साधना है।