Bhagavat Gita (भागवद गीता) : गीता के सत्रहवें अध्याय के श्लोक 8 से 14 तक का गहन विश्लेषण

भगवद् गीता: अध्याय सत्रहवें (श्रद्धात्रय विभाग योग) – श्लोक 8 से 14: आहार, यज्ञ और तप के त्रिविध रूपों का गहन विश्लेषण

Bhagavat Gita के सत्रहवें अध्याय के पहले सात श्लोकों में, भगवान कृष्ण ने तीन प्रकार की श्रद्धा (सात्विक, राजसिक, तामसिक) की पहचान की। उन्होंने कहा कि व्यक्ति की श्रद्धा उसके स्वभाव का प्रतिबिंब होती है। अब, श्लोक 8 से 14 में, भगवान इस श्रद्धा की व्यावहारिक अभिव्यक्ति को तीन मुख्य क्रियाओं में वर्गीकृत करते हैं: आधार (भोजन), यज्ञ (पूजा/बलिदान) और तप (तपस्या)।

ये श्लोक आध्यात्मिक जीवन के मूल सिद्धांतों को प्रकट करते हैं, यह समझाते हुए कि हम क्या खाते हैं, हम किस प्रकार पूजा करते हैं और हम किस प्रकार अभ्यास करते हैं, ये सभी हमारी आंतरिक गुणात्मक अवस्था (गुण) को दर्शाते हैं।

खंड 1: तीन प्रकार के भोजन का वर्गीकरण (श्लोक 8, 9, 10)

Bhagavat Gita भोजन न केवल शरीर का पोषण करता है, बल्कि मन और बुद्धि की प्रकृति को भी सीधे प्रभावित करता है। इसलिए, भोजन के प्रकारों का वर्णन पहले किया गया है।

1.1. श्लोक 8 का विस्तृत विश्लेषण: सात्विक भोजन – स्वास्थ्य और सुख का स्रोत

आयुःसत्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः । रस्याः सनिग्धाः सथिरा हृद्या आहाराः सात्विकप्रियायाः ॥8॥

अर्थ: जो भोजन आयु, सत्व, बल, स्वास्थ्य, सुख और प्रेम (आनंद) को बढ़ाता है; जो भोजन रसयुक्त, रसयुक्त, रसयुक्त (पचाने में आसान) और हृदय को प्रिय हो, ऐसा भोजन सात्विक लोगों को प्रिय होता है।

विस्तृत विश्लेषण:

Bhagavat Gita छह प्रकार के लाभकारी गुण: सात्विक भोजन के सेवन से मानव जीवन में छह मुख्य लाभ होते हैं:आयुष्य (दीर्घायु): शरीर को रोगों से मुक्त रखकर आयु बढ़ाता है।

सत्व (पवित्रता): मन में शांति, स्थिरता और दिव्य गुणों की वृद्धि करता है।

बल (शक्ति): न केवल शारीरिक, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति भी बढ़ाता है।

आरोग्य (स्वास्थ्य): शरीर को रोगों से मुक्त रखता है।

सुख (शांति): मन को प्रसन्न और शांत रखता है।

प्रीति/आनंद: हृदय में प्रेम और संतुष्टि की भावना उत्पन्न करता है।

भोजन के गुण:रस्य: भोजन में मध्यम मात्रा में मिठास होनी चाहिए, जो पोषक तत्वों से भरपूर हो।

स्निग्धा: भोजन में घी या तेल जैसे वसायुक्त पदार्थ उचित मात्रा में होने चाहिए, जिससे यह पचने में आसान हो और शरीर के तत्वों का पोषण करे।

स्थिरः (स्थिरता प्रदान करने वाला): ऐसा भोजन जो शरीर में लंबे समय तक शक्ति बनाए रखे।

हृद्याः (हृदय को प्रिय): वह भोजन जो भावना से बनाया गया हो और स्वादिष्ट हो, संतुष्टि प्रदान करता हो।

1.2. श्लोक 9 का विस्तृत विश्लेषण: राजसिक भोजन – दुःख और रोग का स्रोत

कत्वम्ललवणात्युष्णतीक्षणरुक्षविदाहिनः । आहारा राजसस्युष्णामयप्रदाहिनः ॥9॥

अर्थ: जो भोजन कड़वा, खट्टा, नमकीन, अत्यधिक गर्म, तीखा, रूखा और जलन पैदा करने वाला हो, ऐसा भोजन राजसिक लोगों को प्रिय होता है। वह भोजन दुःख, शोक और रोग का कारण होता है।

विस्तृत व्याख्या:

Bhagavat Gita सात प्रकार के असंतुलित स्वाद: राजसिक भोजन इंद्रियों को उत्तेजित करने वाला होता है, जिससे तृष्णा बढ़ती है:

कड़वा: उदाहरण के लिए, बहुत अधिक मिर्च।

खट्टा: अचार या बहुत खट्टी चीज़ें।

नमकीन: बहुत अधिक नमक।

गर्म: बहुत गर्म पेय या भोजन।

तीखा: मसालेदार या उत्तेजक भोजन।

रूखा: चिकनाई रहित भोजन शरीर को कठोर बनाता है।

विदाहिनः (जलन पैदा करने वाला): पाचन तंत्र में जलन पैदा करने वाला भोजन।

परिणाम: राजसिक भोजन अंततः शरीर और मन में अशांति पैदा करता है।

दुख: अत्यधिक भोग की अतृप्त लालसा के कारण होने वाला कष्ट।

शोक: भोगी हुई वस्तुओं के खो जाने का भय और उससे उत्पन्न होने वाला दुःख।

आम (रोग): इंद्रियों की अधिकता के कारण शरीर में रोग उत्पन्न होते हैं।

1.3. श्लोक 10 का विस्तृत विश्लेषण: तामसिक भोजन – जड़ता और अशुद्धता का स्रोत

यतयं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्। उच्छिष्टमपि चामेध्यभोजं तमस्प्रियम् ॥10॥

यतायाम्: बहुत समय से पका हुआ, स्वादहीन, दुर्गंधयुक्त, बासी और अशुद्ध भोजन तामसिक लोगों को प्रिय होता है।

विस्तृत व्याख्या:

Bhagavat Gita छह प्रकार की अशुद्धियाँ: तामसिक भोजन शरीर और मन में जड़ता और अशुद्धता पैदा करता है।

यतायाम: वह भोजन जो तीन घंटे या उससे अधिक समय तक पकाया गया हो और फिर से गर्म किया गया हो।

गतरसम: वह भोजन जिसका स्वाद या पोषक तत्व नष्ट हो गए हों।

पूति (बदबूदार): जिससे दुर्गंध आती हो।

पर्युषितम् (बासी): जो एक दिन या उससे अधिक समय से बासी हो।

उचिष्टम् (अशुद्ध): दूसरों द्वारा खाया गया भोजन।

अमेध्यम् (अशुद्ध): मांस, मादक पदार्थ या धार्मिक या स्वास्थ्य की दृष्टि से अशुद्ध भोजन।

परिणाम: यह तामसिक आहार तामसिक व्यक्ति को आलस्य, प्रमाद, अज्ञानता और रोगों की ओर धकेलता है।

खंड 2: त्रिगुणी यज्ञ (कर्म) का वर्गीकरण (श्लोक 11, 12, 13)

Bhagavat Gita यज्ञ का अर्थ है शुद्ध भावना से किया गया कार्य या पूजा। उद्देश्य एवं भावना के आधार पर यह यज्ञ भी तीन प्रकार का होता है।

2.1. श्लोक 11 का विस्तृत विश्लेषण: सात्विक यज्ञ – कर्तव्य और शांति

अफलाकंक्षीभिर्यज्ञो विद्दृष्टो य इज्यते। यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥11॥

अर्थ: जो यज्ञ फल की इच्छा न करके केवल ‘यज्ञ करना मेरा कर्तव्य है’ ऐसा मन करके शास्त्र विधि के अनुसार किया जाता है, वह यज्ञ सात्विक होता है।

विस्तृत व्याख्या:

Bhagavat Gita अफलाकंक्षीभिहिः (फल की आशा के बिना): सात्विक यज्ञ का मुख्य उद्देश्य निष्काम कर्म योग है। यज्ञ का फल स्वर्ग या भौतिक सुख प्राप्त करना नहीं, बल्कि परम पुरुष की प्रसन्नता के लिए कर्तव्य-भावना से यज्ञ करना है।

विधिदृष्टा (शास्त्रीय विधि): यह यज्ञ शास्त्रों और धार्मिक ग्रंथों द्वारा निर्धारित विधि के अनुसार किया जाता है, अर्थात उचित सामग्री, समय और विधि का पालन किया जाता है।

यष्ठव्यं एव इति (कर्तव्य भावना): ‘मुझे यज्ञ अवश्य करना चाहिए, क्योंकि यह मेरा कर्तव्य है।’ यह भावना हृदय में स्थिर होती है। यह सात्विक कर्म है, जो मन को पवित्रता और शांति प्रदान करता है।

2.2. श्लोक 12 का विस्तृत विश्लेषण: राजसिक यज्ञ – दिखावा और स्वार्थ

अभिसंध्याय तु फलं दंभरथम्पि चैव यत् । इज्यते भारतश्रेष्ठ तं यज्ञ विद्धि राजसं ॥12॥

अर्थ: हे भरतश्रेष्ठ (अर्जुन), जो यज्ञ फल प्राप्ति के साथ-साथ दिखावे के उद्देश्य से भी किया जाता है, उसे तुम राजसिक समझो।

विस्तृत व्याख्या:

Bhagavat Gita अभिसंध्या फलम् (फल प्राप्ति का उद्देश्य): राजसिक यज्ञ का मुख्य उद्देश्य स्वर्ग, धन, पुत्र, पत्नी या भौतिक सुख प्राप्त करना है। वे यज्ञ को एक ‘सौदा’ मानते हैं जिसके बदले में धर्म को भौतिक वस्तुएँ प्राप्त होती हैं।

दंभरथम (ढोंग का उद्देश्य): राजसिक यज्ञ में दिखावा और प्रदर्शन होता है। वे समाज में अपना सम्मान बढ़ाने, प्रसिद्धि पाने या स्वयं को धार्मिक सिद्ध करने के लिए यज्ञ करते हैं।

अशांति: ये यज्ञ फल की आशा और दिखावे से भरे होते हैं, इसलिए ये मन को शांति नहीं देते, बल्कि तृष्णा और चिंता को बढ़ाते हैं।

2.3. श्लोक 13 का विस्तृत विश्लेषण: तामसिक यज्ञ – आस्था और अनुष्ठान का अभाव

विधिहिनमसृष्टानां मंत्रिहिनमदक्षणं मन्तरिहिनमदक्षणम्। श्रद्धाविरहिनं यज्ञं तमसं परिचक्षते ॥13

अर्थ: जो यज्ञ बिना अनुष्ठान, बिना भोजन वितरण, बिना मंत्र, बिना दक्षिणा और बिना श्रद्धा के होता है, वह तामसी यज्ञ कहलाता है।

विस्तृत व्याख्या:

Bhagavat Gita विधिहीनम् (अनुष्ठान के बिना): शास्त्रोक्त नियमों का पालन न करना।

अश्रिष्ट अन्नम् (भोजन वितरण के बिना): यज्ञ में ब्राह्मणों या गरीबों को भोजन न देना।

मंत्रहीनम् (बिना मंत्र के): मंत्रों का ठीक से पाठ न करना या मंत्रों का अभाव होना।

दक्षिणाम् (बिना दक्षिणा): यज्ञ करने वाले ब्राह्मण या पंडित को उचित दक्षिणा न देना।

श्रद्धाविरहितम् (विश्वास रहित): यज्ञ में कोई भावना या श्रद्धा नहीं होती। यह केवल एक बोझिल कर्म है।

परिणाम: तामसी यज्ञ से कोई शुभ फल प्राप्त नहीं होता। यह केवल समय और ऊर्जा की बर्बादी है, अज्ञानता और जड़ता का प्रतीक है।

खंड 3: त्रिविध तपस्याओं का वर्गीकरण (श्लोक 14)

Bhagavat Gita तप का अर्थ है इंद्रियों, शरीर और प्राणिक क्रियाओं को नियंत्रित करके लक्ष्य की ओर बढ़ना। यह तप तीन स्तरों पर किया जाता है: शारीरिक, वाचिक और मानसिक। श्लोक 14 में केवल शारीरिक तप का वर्णन है, जो अन्य दो तपों का आधार है।

3.1. श्लोक 14 का विस्तृत विश्लेषण: शारीरिक तप का वर्गीकरण

देवद्विजगुरुप्राज्ञानं शौचमार्जवम् । ब्रह्मचर्यमहिंसा च शरीरं तप उच्यते ॥14

अर्थ: ईश्वर, द्विज (ब्राह्मण), गुरु और प्रज्ञा (ज्ञानी) की पूजा, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा – इसे शारीरिक तप कहते हैं।

विस्तृत व्याख्या:

Bhagavat Gita भगवान यहाँ शारीरिक तप के पाँच मुख्य घटकों का वर्णन करते हैं, जो सात्विक तप के आधार हैं:

  1. पूजा: आतिथ्य और सेवा के लिए शरीर का उपयोग।

देवपूजा: मूर्तियों, मंदिरों और दैवीय शक्तियों की पूजा।

द्विजपूजन: ब्राह्मणों (वेद और ज्ञान के ज्ञाता) का सम्मान करना।

गुरुपूजन: माता-पिता, शिक्षकों और दीक्षा देने वाले गुरुओं का सम्मान करना।

प्रज्ञापूजन: ज्ञानी, बुद्धिमान और अनुभवी लोगों का सम्मान करना।

  1. शौचम् (पवित्रता): बाह्य शुद्धि (स्नान, स्वच्छ वस्त्र) और आंतरिक शुद्धि (मन को राग-द्वेष से मुक्त रखना)।
  2. आर्जवम् (सरलता): शरीर की गतिविधियों, आसनों और मुद्राओं में सरलता, दिखावे या कुटिलता का अभाव।
  3. ब्रह्मचर्य: केवल यौन संयम ही नहीं, बल्कि सभी इंद्रियों को सुख और तृप्ति से दूर रखकर ब्रह्म (सत्य) में स्थिर रहना।
  4. अहिंसा: शरीर के माध्यम से किसी को पीड़ा या चोट न पहुँचाना।

महत्व: ये सभी पाँच कर्म शरीर द्वारा किए जाने वाले सात्विक तप हैं, जो मनुष्य को आध्यात्मिक पथ पर आगे बढ़ने के लिए भौतिक आधार प्रदान करते हैं।

उपसंहार: आंतरिक विश्वास का प्रदर्शन

Bhagavat Gita के सत्रहवें अध्याय के ये श्लोक (8 से 14) श्रद्धा के सिद्धांत को अत्यंत व्यावहारिक स्तर पर लाते हैं:

भोजन का महत्व: भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं है, बल्कि मन और बुद्धि का आधार है। सात्विक भोजन मन को शांति और आनंद प्रदान करता है, जबकि राजसिक और तामसिक भोजन अशांति और जड़ता लाता है।

कर्म का उद्देश्य: यज्ञ (कार्य) अपने फल की आशा के कारण राजसिक या तामसिक हो जाता है। केवल कर्तव्य-भावना से किया गया यज्ञ ही सात्विक होता है।

तप का उद्देश्य: शारीरिक तप का उद्देश्य मान-सम्मान प्राप्त करना या शरीर को कष्ट पहुँचाना नहीं, बल्कि शरीर को ईश्वरीय सेवा के लिए तैयार करना होना चाहिए।

इस ज्ञान के माध्यम से, व्यक्ति सचेतन रूप से सात्विक भोजन, यज्ञ और तप का चयन कर सकता है, जिससे उसकी आंतरिक प्रकृति उन्नत होती है और वह मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ता है।

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