Bhagavat Gita (भागवद गीता) : गीता के सत्रहवें अध्याय के श्लोक 22 से 28 तक का गहन विश्लेषण

भगवद गीता: अध्याय सत्रहवें (श्रद्धात्रय विभाग योग) – श्लोक 22 से 28: तामसी दान और ‘ओम तत् सत्’ का गूढ़ रहस्य

Bhagavat Gita के सत्रहवें अध्याय के पूर्वार्ध में भगवान कृष्ण ने भोजन, यज्ञ, तप और दान के सात्विक और राजसिक स्वरूपों का वर्णन किया है। अब, इन अंतिम श्लोकों (22 से 28) में, वे पहले तामसिक दान का वर्णन करते हैं, फिर ‘ॐ तत् सत्’ जैसे परम पवित्र मंत्र का रहस्य प्रकट करते हैं, जो समस्त पुण्य-पाप से परे है। अंत में, भगवान किसी भी कर्म की सफलता के लिए श्रद्धा और दिव्य भावना के महत्व की व्याख्या करते हैं।

ये श्लोक मनुष्य को यह शिक्षा देते हैं कि कोई भी कर्म बाह्य कर्म से नहीं, बल्कि आंतरिक भावना से शुद्ध होता है, और श्रद्धा के बिना कर्म अंततः निष्फल हो जाता है।

खंड 1: तामसी दान का स्वरूप (श्लोक 22)

Bhagavat Gita पिछले श्लोक (20 और 21) में सात्विक और राजसिक दान का वर्णन करने के बाद, अब भगवान तीसरे और सबसे निम्न प्रकार के दान, तामसिक दान का वर्णन करते हैं।

1.1. श्लोक 22 का विस्तृत विश्लेषण: तामसिक दान-तिरस्कार और अयोग्यता

आदेशकाले यद्दनमपात्रेभ्यश्च दीयते। असत्कृतमवज्ञानत तत्तमसमुदाहृतम् ॥22॥

अर्थ: जो दान गलत देश (स्थान) में, गलत समय पर, गलत लोगों को दिया जाता है और वह भी तिरस्कारपूर्ण (असत्कृतम्) और अपमानजनक भाव (अवज्ञातम्) से, वह दान तामसिक कहलाता है।

विस्तृत विश्लेषण:

Bhagavat Gita तामसिक दान अज्ञान एवं असंस्कृति का प्रतीक है। इस दान में चार मुख्य दोष हैं:

आदेशकाले (अनुचित स्थान और समय):

आदेश: वह स्थान अशुद्ध है जहाँ दान का दुरुपयोग होता है या जहाँ दान देने से पाप बढ़ता है (जैसे जुआघर में शराब पिलाना)।

अकाल: जब दान की आवश्यकता न हो या समय बीत चुका हो।

अपात्रभ्यश्च (अयोग्य को): दान उन लोगों को दिया जाता है जो आलसी हों, बुरी आदतों के आदी हों या जो दान का उपयोग गलत कार्यों के लिए करते हों।

असत्कृतम् (तिरस्कारपूर्वक): जब दान देते समय दाता के मन में आदर या सम्मान की भावना न हो। दान फेंक दिया जाता है या अपमानजनक तरीके से दिया जाता है।

अवज्ञातम (अपमानजनक तरीके से): दान देने वाले को नीचा दिखाने या शर्मिंदा करने के इरादे से दान देना।

परिणाम: तामसिक दान से न तो देने वाले को कोई पुण्य मिलता है और न ही लेने वाले को कोई लाभ होता है। यह दान केवल अज्ञानता और असंस्कृति का प्रदर्शन है, जो तामसिक आस्था का प्रतीक है।

खंड 2: परम सत्य का मंत्र – ‘ॐ तत् सत्’ का रहस्य (श्लोक 23, 24, 25)

Bhagavat Gita तीन गुणों (आहार, त्याग, तपस्या, दान) के अनुसार कर्मों का वर्णन पूरा करने के बाद, भगवान कृष्ण अब गुणों (गुणातीत) से परे जाने का मार्ग बताते हैं। यह तरीका है ब्रह्म के तीन प्रतीकात्मक नामों – ‘ओम तत् सत्’ की शरण लेना।

2.1. श्लोक 23 का विस्तृत विश्लेषण: ब्रह्म के तीन नाम

ॐ तत् सत् इति निर्जतो ब्राह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञानस्त्रिविधः। ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥23॥

अर्थ: ‘ॐ तत् सत्’ – इस प्रकार शास्त्रों में ब्रह्म के तीन प्रकार के संकेत माने गए हैं। इसी (संकेत) के माध्यम से ब्राह्मण, वेद और यज्ञ

विस्तृत विश्लेषण:

Bhagavat Gita ब्रह्म का त्रिगुण संकेत: ‘ॐ तत् सत्’ कोई साधारण शब्द नहीं है, बल्कि परम सत्य (ब्रह्म) का प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड का मूल है।

आध्यात्मिक शक्ति: भगवान कहते हैं कि ये तीन शब्द इतने शक्तिशाली हैं कि सृष्टि के आरंभ में इन्हीं के द्वारा:

ब्रह्म: (ब्रह्म): ब्रह्म ज्ञान के वाहकों की रचना हुई।

वेद: ज्ञान के स्रोत वेदों की रचना हुई।

यज्ञ: (यज्ञ): और धार्मिक कर्मों के मार्ग यज्ञों की रचना हुई।

अर्थात् इन तीन शब्दों का स्मरण करने से कोई भी कर्म गुणों के बंधन से मुक्त होकर सीधे ब्रह्म से जुड़ जाता है।

2.2. श्लोक 24 का विस्तृत विश्लेषण: ‘ओम’ का महत्व

तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञादन्तपःक्रियुदानतपः। प्रवर्ते विधन्ते विधनोक्तः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥24॥

अर्थ: अत: ब्रह्मवादियों के शास्त्रों में वर्णित यज्ञ, दान और तप आदि कर्म सदैव ‘ॐ’ के उच्चारण से प्रारम्भ किये जाते हैं।

विस्तृत विश्लेषण:

Bhagavat Gita ब्रह्मवादी : जो ब्रह्मज्ञान को सर्वोपरि मानते हैं, ऐसे साधक।

‘ओम’ का कार्य:आरंभ : ‘ॐ’ को आरंभ (शुरुआत) माना गया है। कोई भी धार्मिक कार्य, मंत्र जाप या ध्यान की शुरुआत ‘ॐ’ से होती है।

ब्रह्म से संबंध : ‘ओम’ परमात्मा के निर्गुण और सगुण स्वरूप की ध्वनि है। कार्य के आरंभ में ‘ॐ’ का उच्चारण करने से वह कार्य तुरंत ब्रह्म की शक्ति से जुड़ जाता है, जिससे कार्य में आने वाले सभी दोष या दोष दूर हो जाते हैं।

2.3. श्लोक 25 का विस्तृत विश्लेषण: ‘तत्’ का महत्त्व

तदित्यनभिसंधाय फलं यज्ञतपःक्रियः । दानक्रियाश्च विधाः क्रियांतपःक्रियंतपः ॥25॥

अर्थ: ‘तत्’ (अ) शब्द का उच्चारण करके, वे लोग जो किसी फल की आशा नहीं रखते और मोक्ष के इच्छुक हैं, यज्ञ, तप और दान जैसे विभिन्न कर्म करते हैं।

विस्तृत विश्लेषण:

Bhagavat Gita ‘तत्’ का अर्थ: ‘तत्’ का अर्थ है ‘वह’, जो एक सर्वनाम है और ईश्वर का सूचक है। यहाँ ‘वह’ का अर्थ है संसार में जो कुछ भी दिखाई देता है, जो अंततः ब्रह्म ही है।

‘तत्’ का कार्य:निष्कामता: मोक्ष की इच्छा रखने वाले साधक ‘तत्’ कहकर कर्म करते हैं। इसका अर्थ है कि ‘यह कर्म मैंने नहीं किया, बल्कि सर्वशक्तिमान ईश्वर ने किया है।’

फलत्याग: ‘तत्’ का उच्चारण व्यक्ति को फल की आशा से मुक्त कर देता है, क्योंकि वह मानता है कि कर्म भी ब्रह्म का है और उसका फल भी ब्रह्म को ही समर्पित है।

खंड 3: ‘सत्य’ का महत्व और असत्य के परिणाम (श्लोक 26, 27, 28)

Bhagavat Gita अंतिम तीन श्लोकों में भगवान ‘सत्’ शब्द की परिभाषा और उसका महत्त्व बताते हैं।

3.1. श्लोक 26 का विस्तृत विश्लेषण: ‘सत्’ का महत्त्व

सदभे साधुभावे च सदित्येत्प्रयुज्यते कर्मणी तथा सच्छबदः पार्थ युज्यते ॥26॥

अर्थ: हे पार्थ, ‘सत्’ शब्द का प्रयोग सद्गुण (गुण के रूप में) और सद्गुण (गुण के रूप में) के अर्थ में किया जाता है। साथ ही, ‘सत्’ शब्द का प्रयोग प्रशंसनीय (श्रेष्ठ) कर्मों के लिए भी किया जाता है।

विस्तृत विश्लेषण:

Bhagavat Gita ‘सत्’ का अर्थ: ‘सत्’ का अर्थ है ‘अस्तित्व’ और ‘सत्य’। जो तीनों कालों में विद्यमान है, वह ‘सत्’ है।

प्रयोग के तीन प्रकार:सदभे (अस्तित्व): परमात्मा के अस्तित्व के लिए।

साधुभावे (उत्कृष्टता): अच्छे लोगों, कुलीनता और कल्याणकारी भावनाओं के लिए।

प्रशस्ते कर्माणि (उत्कृष्ट कर्म): ऐसे कर्म जो निःस्वार्थ, धर्ममय और समाज के लिए हितकारी हों।

संक्षेप में, ‘सत्’ श्रेष्ठता, शुभता और शाश्वतता का प्रतीक है। जब किसी यज्ञ, तप या दान में ‘सत्’ की भावना होती है, तो वह कर्म सर्वश्रेष्ठ हो जाता है।

3.2. श्लोक 27 का विस्तृत विश्लेषण: ‘सत्’ का आधार

यज्ञे तपसि दाने च सतिः सदिति चोच्यते के रेव तदर्थियं सदित्ये वाभिधियाते ॥27॥

अर्थ: यज्ञ, तप और दान में जो स्थिरता होती है, उसे भी ‘सत्’ कहते हैं। और उस (ब्रह्म) के उद्देश्य से किए गए कर्म को भी ‘सत्’ कहते हैं।

विस्तृत विश्लेषण:

Bhagavat Gita स्थिति: सत् इति (स्थिरता): यदि किसी कर्म में स्थिरता और दृढ़ता है, तो वह ‘सत्’ गुण का कर्म है। उदाहरण के लिए, तप को बीच में न छोड़ना।

तदर्थ्यं कर्म (ब्रह्म के लिए कर्म): जो कर्म ईश्वर प्राप्ति, ईश्वर की प्रसन्नता या जगत कल्याण के लिए किया जाता है (यज्ञ, तप, दान), वह कर्म भी ‘सत्’ गुण का होता है। यह कर्म गुणों के बंधन से मुक्ति दिलाता है।

3.3. श्लोक 28 का विस्तृत विश्लेषण: श्रद्धा रहित कर्मों की असफलता

अश्रद्धया हुतं दतं तपस्तप्तं कृतं च यत्य असदित्युच्यते पार्थ नच तत्प्रेत्य नो इह ॥28॥

अर्थ: हे पार्थ, श्रद्धा रहित कोई भी कर्म, चाहे वह यज्ञ, दान, तप या अन्य कोई भी कर्म हो, ‘असत्’ (असफल) कहलाता है। उसका (कर्म) न तो परलोक (प्रेत्य) में फल मिलता है और न ही इस लोक (इह) में।

विस्तृत विश्लेषण:

Bhagavat Gita आश्रद्धया (श्रद्धा रहित): यह श्लोक संपूर्ण अध्याय का सारांश है। सत्रहवाँ अध्याय श्रद्धा के महत्व पर बल देता है। यदि कोई व्यक्ति निर्धारित अनुष्ठानों का पालन करता है, किन्तु श्रद्धा का अभाव रखता है, तो वह कर्म निष्फल हो जाता है।

असत् इत्युच्यते: श्रद्धा के बिना किया गया कर्म ‘असत्’ (मिथ्या) माना जाता है। उसका अस्तित्व ही नहीं है।

न इह न प्रेत्य (इस लोक या परलोक में कोई फल नहीं): इन कर्मों से वर्तमान जीवन में कोई आध्यात्मिक या भौतिक लाभ नहीं मिलता, न ही मृत्यु के बाद कोई उच्च पद प्राप्त होता है।

निष्कर्ष: यह श्लोक पुनः स्थापित करता है कि किसी कर्म का बाह्य रूप नहीं, बल्कि उसके पीछे की श्रद्धा और भावना ही उसे मूल्यवान बनाती है।

निष्कर्ष: उत्कर्ष का मार्ग

Bhagavat Gita के सत्रहवें अध्याय के ये अंतिम श्लोक मनुष्य को गुणों के बंधन से मुक्त होने का स्पष्ट मार्ग दिखाते हैं:

निवारण: काम, क्रोध और लोभ से प्रेरित बुरे कर्मों का पूर्णतः त्याग करना।

शुद्धि का आधार: यज्ञ, तप और दान जैसे कर्म सात्विक भाव से करना।

ब्रह्म के प्रति समर्पण: प्रत्येक कर्म के आरंभ में ‘ॐ तत् सत्’ का उच्चारण करके अपने कर्मों को ब्रह्म को समर्पित करना। इससे व्यक्ति कर्मफल की आशा से मुक्त हो जाता है और सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

श्रद्धा का सर्वोच्च स्थान: अंतिम संदेश यह है कि श्रद्धा के बिना किया गया कोई भी कर्म निष्फल है। आंतरिक श्रद्धा ही आपके जीवन और कर्मों को सफल बनाती है।

यह अध्याय मनुष्य को अपने आंतरिक गुणों का अवलोकन करने, सात्विक जीवनशैली अपनाने और परम सत्य ‘ॐ तत् सत्’ के प्रति समर्पण करने के लिए प्रेरित करता है।

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