Bhagavat Gita (भागवद गीता) : गीता के अठारहवाँ अध्याय के श्लोक 61 से 70 तक का गहन विश्लेषण

Bhagavat Gita अठारहवाँ अध्याय (मोक्ष संन्यास योग) – श्लोक 61 से 70: भगवान की सर्वव्यापकता, सबसे गुप्त शिक्षा, और समर्पण का मार्ग

अठारहवें अध्याय के पहले के हिस्सों (श्लोक 41 से 60) में, भगवान कृष्ण ने आत्म-साक्षात्कार, आत्म-साक्षात्कार, ब्रह्म की प्राप्ति और दिव्य भक्ति के रास्तों के बारे में बताया है। श्लोक 60 में, उन्होंने अर्जुन को याद दिलाया कि वह अपने स्वभाव से बंधा हुआ है। अब श्लोक 61 से 70 में, भगवान इस बंधन से आज़ाद होने का एकमात्र तरीका – पूरा सरेंडर – बताते हुए अपना आखिरी उपदेश देने की तैयारी करते हैं। यह हिस्सा भगवान की सबसे ताकतवर चीज़ का गहरा ज्ञान देता है।

ये श्लोक दिखाते हैं कि इंसान की कोशिशों की एक सीमा होती है, और मुक्ति के लिए, इंसान को भगवान की हर जगह मौजूदगी को मानना ​​होगा और उनके सामने सरेंडर करना होगा।

Bhagavat gita

भाग 1: परमेश्वर की सर्वशक्तिमानता और नियंत्रण (श्लोक 61, 62)

Bhagavat Gita भगवान अब साफ़-साफ़ कहते हैं कि दुनिया की सारी ताकत उनके कंट्रोल में है। यह बात अर्जुन को अपना ‘कर्तापन’ छोड़कर सरेंडर करने के लिए मोटिवेट करती है।

1.1. श्लोक 61 का डिटेल्ड एनालिसिस: भगवान का अंदरूनी रूप
ईश्वरः सर्वरभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।भ्रामयानसर्वभूतानि यंत्रारूढानि ॥61॥

अर्थ : हे अर्जुन, भगवान सभी जीवों के दिलों (हृद्देशे) में रहते हैं। और माया के ज़रिए, वह सभी जीवों को एक मशीन (यंत्ररुधानी) की तरह घुमाते (घुमाते) हैं।

विस्तृत विश्लेषण:

  • ईश्वरः सर्वरभूतानाम: भगवान सिर्फ़ किसी दूर स्वर्ग में नहीं हैं, बल्कि हर जीव के दिल में आत्मा के रूप में रहते हैं – यही भगवान का अंदरूनी रूप है।
  • कठपुतली चलाने वाले का भ्रम: यह एक ज़रूरी मिसाल है। शरीर एक मशीन की तरह है। जैसे कठपुतली चलाने वाला पर्दे के पीछे होता है, वैसे ही भगवान अपनी माया (प्रकृति की शक्ति) से हर जीव को कंट्रोल करते हैं।
  • भ्रम: भगवान की माया हर जीव को उसके कर्मों और गुणों के अनुसार लगातार दुनिया में भटकाती रहती है।
  • अर्जुन को संदेश: अर्जुन का न लड़ने का इरादा भी आखिरकार टूट जाएगा, क्योंकि उसका शरीर और मन भगवान के नियम (प्रकृति) के कंट्रोल में हैं।

1.2. श्लोक 62 का डिटेल्ड एनालिसिस: सरेंडर करने का आदेश
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत तत्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाष्टान्म प्राप्स्य शाश्वतम् ॥62॥

अर्थ : Bhagavat Gita हे भारत (अर्जुन), अपनी पूरी भावनाओं (सर्व भावेन) के साथ उन्हें सरेंडर कर दो। उनकी कृपा (तत्प्रसादत) से तुम्हें परम शांति और शाश्वत निवास (मोक्ष) मिलेगा।

विस्तृत विश्लेषण:

  • शरणम गच्छ (सरेंडर): जब कोई इंसान यह महसूस करता है कि उसका अपना कंट्रोल सीमित है (श्लोक 61), तो मोक्ष का एकमात्र रास्ता सरेंडर है।
  • सर्व भावेन: सरेंडर सिर्फ बाहरी काम में ही नहीं, बल्कि पूरे अंदरूनी एहसास (मन, बुद्धि, अहंकार) के साथ किया जाना चाहिए।
  • तत्प्रसादत परम शांतिम: मोक्ष इंसानी कोशिशों का नतीजा नहीं है, बल्कि भगवान की कृपा (प्रसाद) का नतीजा है।
  • शाश्वत स्थान: यह वह स्थान है जहाँ जन्म और मृत्यु का चक्र समाप्त होता है – मोक्ष।
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खंड 2: गीता के गुप्त उपदेश (श्लोक 63, 64)

Bhagavat Gita भगवान अब प्रवचन के आखिरी पड़ाव में आते हैं, जहाँ वे खुद ज्ञान की कैटेगरी बताते हैं और सबसे सीक्रेट सीक्रेट बताते हैं।

2.1. श्लोक 63 का डिटेल्ड एनालिसिस: आखिरी टेस्ट और आज़ादी

इति ते ज्ञानमाख्याद्गुह्यतरं मया विमृष्ण यथेच्छसि तथा कुरु ॥63॥

अर्थ : इस तरह मैंने तुम्हें सबसे सीक्रेट (गुह्याद् गुह्यातरं) ज्ञान बताया है। तुम्हें इस पूरे (ज्ञान) के बारे में अच्छी तरह सोचना चाहिए (विमृष्य) और जैसा चाहो वैसा करना चाहिए (यथेच्छस्य तथा कुरु)।

विस्तृत विश्लेषण:

  • गुह्याद् गुह्यातरं ज्ञानम्: सरेंडर का रास्ता और भगवान का सर्वव्यापी रूप गीता का सबसे सीक्रेट सीक्रेट है।
  • विमृष्य एतद् अशेषेन (इसके बारे में अच्छी तरह सोचो): भगवान अर्जुन पर ज्ञान नहीं थोपते। वह उसे तर्क, ज्ञान और भक्ति के सभी रास्ते दिखाता है, और अब उसे अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करने की आज़ादी देता है।
  • यथेच्छसि तथा कुरु (जैसा चाहो वैसा करो): यह श्लोक इंसान की आज़ाद मर्ज़ी की अहमियत दिखाता है। आखिरी फ़ैसला उसका अपना होता है। भगवान गाइड है, रूलर नहीं।

2.2. श्लोक 64 का डिटेल्ड एनालिसिस: सबसे बड़ा राज़ (सर्वगुह्यतमम्)
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।इष्टोऽसि मे द्रधमिति तातो वक्ष्यामि ते हीतम् ॥64॥

अर्थ : Bhagavat Gita मेरी सबसे बड़ी बात फिर से सुनो, जो सबसे राज़ (सर्वगुह्यतमम्) है। तुम मेरे सबसे प्यारे हो (इष्टोपཽसि मे द्रधमम्), इसलिए मैं तुम्हारे भले के लिए यह कहूँगा (ते हितम्)।

विस्तृत विश्लेषण:

  • सर्वगुह्यतमं परमं वच: यह श्लोक गीता की सबसे ज़रूरी और आखिरी सीख बताता है, जो नीचे दिए गए श्लोकों (65, 66) में आती है।
  • इष्टोसि मे द्रुधम: भगवान इस ज्ञान को देने के पीछे का कारण बताते हैं – अर्जुन के लिए उनका निस्वार्थ प्रेम। यह प्रेम ज्ञान का रूप तय करता है।
  • प्रेम की शक्ति: जब ज्ञान, बुद्धि और तर्क पूरे हो जाते हैं, तो सिर्फ़ प्रेम ही व्यक्ति को अंतिम सत्य तक ले जाता है। यह श्लोक भक्ति योग की सबसे बड़ी खासियत बताता है।
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खंड 3: मोक्ष का चार-सूत्र महामंत्र (श्लोक 65)

Bhagavat Gita श्लोक 64 में बताया गया सबसे गुप्त राज़ अब श्लोक 65 में बताया गया है।

3.1. श्लोक 65 का डिटेल्ड एनालिसिस: मोक्ष का सीधा रास्ता
मनमना भव मद्भक्तो मद्याजी मा नमस्कुरु ।मामेवाष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रतियोऽसि मे ॥65॥

अर्थ : मेरा ध्यान करो, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो, और सिर्फ़ मुझे ही प्रणाम करो। तुम सिर्फ़ मुझे ही पाओगे (माम एवाष्यसि)। तुम मेरे प्यारे हो, इसलिए मैं तुम्हें सच्चा वचन देता हूँ (सत्यं ते प्रतिजाने)।

विस्तृत विश्लेषण:

यह श्लोक भक्ति का चार-तरफ़ा सीधा रास्ता है, जो बिना किसी और मुश्किल के मोक्ष देता है:

  • मनमना भव (मेरा ध्यान करो): लगातार मेरे ख्यालों में डूबे रहो। यह ध्यान का आसान तरीका है।
  • मद्भक्तः (मेरे भक्त बनो): मेरे प्रति प्यार और विश्वास रखो।
  • मद्याजी (मेरी पूजा करो): सभी कर्मों को त्याग समझो और उन्हें मुझे (कर्म योग) समर्पित कर दो।
  • माम नमस्कारुरू (मुझे नमस्कार): विनम्रता के साथ समर्पण स्वीकार करो।
  • फल: माम एवैष्यसि (तुम मुझे पाओगे)। यह भगवान का दिया हुआ सच्चा वादा है।

खंड 4: सभी धर्मों का त्याग – महाशरणागति (श्लोक 66)

Bhagavat Gita श्लोक 65 में चार सूत्र देने के बाद, भगवान मोक्ष का सबसे बड़ा और सबसे बड़ा रहस्य बताते हैं – सभी धर्मों का त्याग।

4.1. श्लोक 66 का डिटेल्ड एनालिसिस: सबसे रहस्यमय श्लोक
सर्वधर्मानपरित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥66॥

अर्थ : सभी धर्मों को छोड़कर (सर्वधर्मान् परित्यज्य) और सिर्फ मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा (मोक्षयिष्यामि)। शोक मत करो (मा शुचाः)।

विस्तृत विश्लेषण:

  • सर्वधर्म परित्यज्य: इसका मतलब सिर्फ बाहरी धार्मिक कामों को छोड़ना नहीं है, बल्कि सभी तरह के बंधन वाले धर्मों (खुद, दूसरे धर्म, विश्वास) और उनके फलों की आसक्ति को छोड़कर, सिर्फ भगवान के प्रति समर्पण का धर्म अपनाना भी है।
  • मां एकं शरणं व्रज (सिर्फ मेरी शरण में आओ): यह अनन्य भक्ति और पूर्ण समर्पण का आदेश है।
  • अहम् त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि (मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त करूंगा): यह भगवान का दिया गया सबसे बड़ा आश्वासन है। अगर भक्त सच्चे मन से समर्पण स्वीकार करता है, तो भगवान खुद उसे उसके सभी कर्मों के बंधन से मुक्त कर देते हैं।
  • मा शुचः (शोक मत करो): भगवान यह आखिरी आश्वासन अर्जुन को युद्ध के पाप के कारण हुए दुख को दूर करने के लिए देते हैं।
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खंड 5: गीता के ज्ञान के प्रचार का रहस्य (श्लोक 67, 68, 69)

Bhagavat Gita भगवान अब बताते हैं कि यह सबसे गुप्त ज्ञान किसे दिया जाना चाहिए और इसके प्रचार का क्या फल है।

5.1. श्लोक 67 का विस्तृत विश्लेषण: ज्ञान का स्वामी

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन । न चाशुश्रूष्वे वाच्यं न च मान योऽभ्यसूयति ॥67॥

अर्थ: आपको यह (ज्ञान) ऐसे व्यक्ति को कभी नहीं बताना चाहिए जो तपस्वी न हो, जो भक्त न हो, जो सुनना न चाहता हो और जो मेरी निंदा (अभ्यासूयति) करता हो।

विस्तृत विश्लेषण:

  • ज्ञान के चार स्वामी:
  • नातपस्काच: ​​​​जिसमें आध्यात्मिक अनुशासन (तपस्या) की कमी हो।
  • नाभक्ताय: जिसमें भगवान के प्रति प्रेम या विश्वास न हो।
  • न चाशुश्रूष्शुश्वे: जिसमें ज्ञान सुनने की आंतरिक इच्छा न हो।
  • न च मा योઽभ्यसूयति: जो भगवान में दोष ढूंढता है या उनकी आलोचना करता है।
  • उद्देश्य: यह इस ज्ञान के महत्व को बनाए रखने और इसे केवल सही व्यक्ति को देने का आदेश है।

5.2. श्लोक 68 और 69 का विस्तृत विश्लेषण: गीता उपदेश का फल

य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ह्याती भक्तेष्वभिधास्यति ह्॥68॥

न च तस्मानुष्याष्ठु कश्चिन्मनुष्णु कश्चिन्मे प्रियक्तमः भ्यतमः भ्यातरो ​​​​भुवि ह्॥69॥

अर्थ: Bhagavat Gita भवित मनुष्यों में मुझसे अधिक प्रिय कर्म (प्रियकृततमः) करने वाला कोई नहीं है, और पृथ्वी पर कभी भी उससे अधिक प्रिय (प्रियतरः) कोई नहीं होगा।

विस्तृत विश्लेषण:

  • महत्व: गीता के प्रचार की महिमा इन श्लोकों में है।
  • भक्तेषु अभिधास्थी (भक्तों को उपदेश): यह ज्ञान सिर्फ़ भक्तों को ही देना है, क्योंकि सिर्फ़ वही इसे मान सकते हैं।
  • परा भक्ति का फल: जो व्यक्ति गीता का उपदेश करता है, वह भगवान की परा भक्ति पाकर मोक्ष पाता है।
  • सर्वोत्तम प्रियकृतमः जो ज्ञान का प्रचार करता है, वह भगवान की नज़र में सबसे प्रिय है।

खंड 6: गीता सुनने और पढ़ने का फल (श्लोक 70)

Bhagavat Gita ज्ञान के उपदेशक के अलावा, भगवान गीता की शिक्षाओं के श्रोता और पाठक को भी महिमा देते हैं।

4.1. श्लोक 70 का विस्तृत विश्लेषण: गीता का अध्ययन और श्रवण
अध्येश्यते च य इमं धर्म्यं संवद्मावयोः ।ज्ञानेन तेनाहिष्टः स्यामित्तः स्यामित्यषा मम मतिः ॥70॥

अर्थ: मेरा मानना ​​है कि जो व्यक्ति हम दोनों के बीच इस धार्मिक संवाद (धर्मया संवादम्) का अध्ययन (अध्येश्यते) करेगा, वह ज्ञान के द्वारा मेरी (इष्टः स्याम्) पूजा करेगा।

विस्तृत विश्लेषण:

  • धर्म्यं संवद्मावद्मावद्मा (धार्मिक संवाद): गीता का स्वरूप धर्म, नैतिकता और कल्याण के संवाद का है।
  • अध्यते च (पढ़ाई करेगा): गीता का पाठ करना और उसके अर्थ पर विचार करना।
  • ज्ञानेन इष्टः स्याम (ज्ञान से पूजा): गीता पढ़ना, ज्ञान से भगवान की पूजा करने जैसा ही है।
  • निष्कर्ष: गीता पढ़ने वाला और सुनने वाला दोनों ही कर्मों से मुक्त हो जाते हैं और भक्ति में लग जाते हैं।
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निष्कर्ष: अनंत कृपा और सर्वोच्च समर्पण

Bhagavat Gita के अठारहवें चैप्टर के ये श्लोक (61 से 70) पूरी गीता का दिल और सार हैं:

सब जगह मौजूद शक्ति: भगवान हर जीव के दिल में हैं और कुदरत की शक्ति से दुनिया को कंट्रोल करते हैं।

मोक्ष का एकमात्र रास्ता: इंसान की खुद की कोशिशों की एक सीमा होती है। मोक्ष के लिए भगवान के सामने सरेंडर करना ज़रूरी है।

सबसे गुप्त शिक्षा: मोक्ष का सीधा रास्ता है मन, भक्ति, पूजा और नमस्कार के ज़रिए भगवान में लीन हो जाना।

सर्वधर्म परित्यज्य: सभी धर्मों से लगाव छोड़कर, सिर्फ़ भगवान के सामने सरेंडर करना चाहिए।

कृपा का भरोसा: सरेंडर के ज़रिए, भगवान खुद भक्त को सभी पापों से आज़ाद कर देते हैं।

इस शिक्षा के ज़रिए, अर्जुन को अपने शक से बाहर आने और बिना स्वार्थ के अपना फ़र्ज़ निभाने का आखिरी हुक्म मिलता है।

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