
दिव्य दृष्टि: दुनिया को देखने के लिए योग की शुरुआत (गीता ग्यारह अध्याय 1-11)
Bhagavat Gita के आखिरी चैप्टर को ‘विश्वरूप दर्शन योग’ कहा जाता है। यह अध्याय ग्यारह पूरी गीता का सबसे नाटकीय और भक्ति वाला शिखर है। पिछले दसवें चैप्टर में, श्री कृष्ण ने अपनी सबसे बड़ी शक्तियों के बारे में बताया और बताया। कहा कि पूरा ब्रह्मांड उनके एक हिस्से में समाया हुआ है।
Bhagavat Gita इन शुरुआती श्लोकों (11.1-11) में, भगवान के वचनों से अर्जुन का विश्वास मज़बूत होता है, वह रूप देखने की रिक्वेस्ट करता है, और जवाब में श्री कृष्ण उसे दिव्य दृष्टि देते हैं। हमें दुनिया के रूप की एक झलक दिखाते हैं। यह पल एक भक्त के तौर पर अर्जुन के लिए सबसे बड़ा अनुभव होता है।
अर्जुन का मोहभंग और स्वीकृति (श्लोक 1-4)

Bhagavat Gita दसवें अध्याय का उपदेश सुनकर अर्जुन अब कृष्ण की सर्वोच्चता को पूर्णतः स्वीकार कर लेता है। और एक बड़ा अनुरोध करता है।
श्लोक 1:
अर्जुन उवाच। मदनुग्रहाय परमं गुह्यमाध्यात्मसंज्ञातम्। यत्त्व्योक्तं वचस्तेन मोहोयम् विगतो मम् ॥ 1॥
अर्थ: अर्जुन ने कहा: जो मुझ पर कृपा करता है, वह परम गुप्त (गुप्त) अध्यात्म संज्ञित है। उसने वचन दिया और कहा, “उसके द्वारा मेरा यह मोह दूर हो गया है।”
श्लोक 2:
भवाप्ययु हि भूतानां श्रुतौ विस्तारशो मया। त्वत्तः कमलपत्राक्ष महत्म्यम्पी चाव्याम् ॥ 2॥
अर्थ: हे कमल के पत्तों के समान नेत्रों वाले! प्राणियों की उत्पत्ति और विनाश (भवप्ययु) मैंने आपसे विस्तारपूर्वक सुना, तथा आपका अमर माहात्म्य भी सुना।
विश्लेषण: Bhagavat Gita दया का नतीजा: अर्जुन मानते हैं कि कृष्ण ने जो ज्ञान (अध्यात्मसंज्ञितम्) दिया, उससे उन पर कृपा हुई है।
मोह का अंत: यह ज्ञान सुनने के बाद, अर्जुन का अपने टीचर और रिश्तेदारों से मोह (आयाम) पूरी तरह से दूर हो गया।
ज्ञान का आधार: अर्जुन ने सुना कि कैसे भगवान ही जानवरों की रचना और विनाश का कारण हैं, और उनकी महानता कभी खत्म न होने वाली है।
श्लोक 3:
एवमेतद्याथात्था त्वमात्मानम परमेशरवा। द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥ 3॥
अर्थ: हे भगवान! यह बिल्कुल वैसा ही है जैसा आप खुद से कहते हैं। हे पुरुषोत्तम! अब मैं आपका दिव्य रूप देखना चाहता हूँ।
श्लोक 4:
मन्यसे यदि तच्चक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो। योगेश्वर ततो मे तं दर्शयात्मानम्व्यं ॥ 4॥
अर्थ: हे प्रभु! अगर आपको लगता है कि यह मुझे दिखाई दे सकता है, तो हे योगेश्वर! मुझे अपना अविनाशी रूप दिखाइए।
विश्लेषण: Bhagavat Gita देखने की इच्छा: अर्जुन अब सिर्फ सुनने के बजाय सीधे अनुभव करना चाहते हो (द्रष्टुम इच्छामि)। ‘ऐश्वरं रूपम्’ का मतलब है भगवान का सर्वशक्तिमान रूप।
शील और शर्त: अर्जुन बहुत विनम्रता से पूछता है कि अगर कृष्ण मानते हैं कि मैं उन्हें देख सकता हूँ (मान्यसे यदि तच्चक्यम्), तभी कृपया मुझे दिखाएँ। इससे पता चलता है कि वह जानते हैं कि यह देखना आम नहीं है।
दिव्य दृष्टि का वरदान और दुनिया के रूप का शुरुआती विवरण (श्लोक 5-11)

Bhagavat Gita अर्जुन की भक्ति और विश्वास देखकर, श्री कृष्ण अब उसे यह दिव्य रूप दिखाने के लिए तैयार हैं।
श्लोक 5:
श्री भगवान बोलते हैं। पश्य में पार्थ रूपाणि शतशोतः सहस्रश। नानाविधानि दिव्यानि नानावरणाकृतिनी च। 5॥
अर्थ: श्री भगवान ने कहा: हे पार्थ! तुम मेरे सैकड़ों और हजारों प्रकार के, दिव्य, विभिन्न रंग और आकार वाले हो। ने जो।
श्लोक 6:
पश्यादित्यां वसुं रुद्रनाश्विनौ मरुतस्तथा। बहुन्यद्ष्टपुर्वानी पश्याश्चर्यनी भारत ॥ 6॥
अर्थ: हे भारत! तुम आदित्यों (12), वसुओं (8), रुद्रों (11), अश्विनीकुमारों (2) और मरुतों (49) को देख रहे हो। अनगिनत अजूबे देखो जो तुमने पहले कभी नहीं देखे।
विश्लेषण: Bhagavat Gita अलग-अलग रूप: भगवान अर्जुन से कहते हैं कि वह सिर्फ़ एक नहीं बल्कि हज़ारों दिव्य रूप देखेंगे, जो अलग-अलग रंग और आकार के होंगे।
सभी देवताओं का समावेश: सभी मुख्य वैदिक देवता जैसे आदित्य, वसु, रुद्र वगैरह दुनिया के रूप में शामिल हैं। समावेशी रूप में देखना कहलाता है। इससे फिर से यह साबित होता है कि वे सभी भगवान का ही हिस्सा हैं।
श्लोक 7:
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्यद्य सचराचरं। मम देहे गुदाकेश यच्चान्यद् द्रष्टुमिच्छसि ॥ 7 ॥
अर्थ: हे गुदाकेश! आज मेरे इस शरीर में तुम जंगम और अचल सहित पूरी दुनिया को एक जगह (एकस्थं) रहते हुए देखो, और जो कुछ भी तुम देखना चाहते हो, उसे भी देखो।

श्लोक 8:
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेइव स्वचक्षुषा। दिव्य ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्। 8॥
अर्थ: लेकिन तुम मुझे अपनी आँखों से नहीं देख सकते। इसलिए मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि (चक्षु) देता हूँ। मेरे दिव्य योग (शक्ति) को देखो।
विश्लेषण: Bhagavat Gita दुनिया का एकीकरण: भगवान कहते हैं कि पूरी भौतिक दुनिया उनके रूप में एक जगह है। शामिल है।
सीमित इंसानी आँख: श्लोक 8 बहुत ज़रूरी है। भगवान यह साफ़ करते हैं कि उनका विशाल रूप इंसानों की शारीरिक आँखों से नहीं देखा जा सकता।
दिव्य दृष्टि का वरदान: इसलिए, कृष्ण ने अर्जुन को ‘दिव्य ददामि ते चक्षु’ कहकर दिव्य दृष्टि का वरदान दिया। वरदान देते हैं, जिससे वह भगवान की अद्भुत योग शक्ति (योगं ऐश्वर्य) देख सकता है।
श्लोक 9:
संजय उवाच। एवमुक्त्वा ततो राजन् महायोगेश्वरो हरिः। दर्शयामास पार्थय परम रूपमैश्वरम् ॥ 9॥
अर्थ: संजय ने कहा: हे राजा (धृतराष्ट्र)! ऐसा कहकर महान योगेश्वर हरि (कृष्ण) ने पार्थ (अर्जुन) को अपना परम दिव्य रूप दिखाया।
श्लोक 10-11:
अने कवचत्रयमाणेकादभूतदर्शनम्। अनेकद्व्याभरन् दिव्यानेकोड्यातायुधम॥ 10 ॥ दिव्यमाल्यम्बरधरं दिव्यगंधनुलेपनम्। सर्वाशाचर्यमयं देवमनन्तं विश्वातोमुखम्॥ 11॥
अर्थ: (वह रूप क्या था?) उसके अनेक मुख और नेत्र थे, अनेक अद्भुत दृश्य थे, अनेक दिव्य आभूषणों से सुशोभित था, अनेक दिव्य शरीर थे और अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित था। दिव्य माला और कपड़े पहनने वाले, दिव्य खुशबू से सने, सभी अजूबों से भरे, अनंत और वह हर तरफ मुंह करने वाले दिव्य रूप थे।
विश्लेषण: Bhagavat Gita संजय का विवरण: यहां संजय (जिन्हें व्यासजी से दिव्य दृष्टि मिली है) धृतराष्ट्र को दुनिया के रूप के दर्शन का शुरुआती विवरण देते हैं।
विशालता: इस रूप की खास बात इसकी अनंतता है – कई चेहरे, कई आंखें, कई हथियार, दिव्य कपड़े और खुशबू से भरे हुए। वह सर्वाश्चर्यामयम (सभी अजूबों से भरे हुए) और विश्वतोमुखम (सभी दिशाओं में मुंह किए हुए) थे।

निष्कर्ष
Bhagavat Gita के अगियार्म अध्याय के ये शुरुआती श्लोक (11.1-11.11) अर्जुन की भक्ति यात्रा में सबसे ज़रूरी हैं। ये मोड़ लाते हैं:
मोह से मुक्ति: दसवें अध्याय का अर्जुन का गुप्त ज्ञान, इसे सुनें। वह अपनी मोह से मुक्त हो जाता है और कृष्ण को परम ब्रह्म मान लेता है।
सीधे अनुभव की इच्छा: सिर्फ़ ज्ञान से संतुष्ट न होकर, वह भगवान के दिव्य योग का सीधा अनुभव करना चाहता है। देखने की गुज़ारिश करता है, लेकिन विनम्रता से अपनी सीमाओं को मान लेता है।
ईश्वरीय कृपा: भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि उनका अनंत रूप उसकी भौतिक आँखों से नहीं देखा जा सकता। दिव्य दृष्टि का आशीर्वाद देते हैं।
विश्वरूप की शुरुआत: संजय बताते हैं कि भगवान महायोगेश्वर ने अपना अनंत रूप अर्जुन को दिखाया, जिसमें एक चेहरा, अनंत आँखें और सर्वव्यापी रूप था, जिसमें पूरी जीवित दुनिया एक है। जगह समाई हुई थी।
यह दिव्य दृष्टि पाकर, अर्जुन अब भगवान के विशाल और भयानक सार्वभौमिक रूप को देखेगा, जो इस अध्याय के अगले श्लोकों का विषय है।