Bhagavat Gita : अठारहवाँ अध्याय (मोक्ष संन्यास योग) – श्लोक 51 से 60: ब्रह्म की प्राप्ति, परा भक्ति और प्रकृति का बंधन
अठारहवें अध्याय के पहले हिस्सों (श्लोक 49-50) में, भगवान कृष्ण ने बताया कि नैष्कर्म्य सिद्धि (कर्म के फलों से मुक्ति) पाने के बाद कोई ब्रह्म को कैसे पाता है, और अब वे इसे संक्षेप में समझाएंगे। श्लोक 51 से 60 में, वे ज्ञान योग और भक्ति योग के सबसे ऊंचे शिखरों को मिलाकर परम प्राप्ति का रास्ता बताते हैं, और अर्जुन को युद्ध में उसका कर्तव्य समझाते हैं।
ये श्लोक गीता के सभी योगों को मिलाकर परम मोक्ष का रास्ता दिखाते हैं।

खंड 1: ब्रह्म की प्राप्ति का मार्ग – ज्ञान योग का शिखर (श्लोक 51, 52, 53)
Bhagavat Gita नैष्कर्म्य (बिना आसक्ति के कर्म करना) की अवस्था प्राप्त करने के बाद, साधक अब ब्रह्म को पाने के लिए तैयार है। यह प्रक्रिया पूरी तरह से आंतरिक संयम और ज्ञान पर आधारित है।
1.1. श्लोक 51 और 52 का विस्तृत विश्लेषण: ब्रह्म प्राप्ति के चरण
बुद्ध्या विशुद्ध्या युक्तो धृत्याईत्मानं नियम्य च । शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥51॥
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ॥ ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥52॥
अर्थ: शुद्ध बुद्धि पाकर, धृति से आत्मा (मन) को कंट्रोल करना, शब्दों का त्याग करना, राग-द्वेष दूर करना; अकेले रहना, कम खाना, वाणी, शरीर और मन को कंट्रोल करना, लगातार ध्यान में लगे रहना और वैराग्य (ब्रह्म को पाने के लिए तैयार होना) की शरण लेना।
विस्तृत विश्लेषण:
ये श्लोक साधना के मुख्य आठ चरणों के बारे में बताते हैं:
- बुद्धया विशुद्धया युक्तः: सात्विक बुद्धि से सत्य और असत्य में अंतर समझना (श्लोक 30)।
- धृत्याઽઽતનાનં नियम्य च: सात्विक धृति से मन को कंट्रोल करना (श्लोक 33)।
- शब्दादिन वेसियां त्यक्त्व: ध्वनि (श्रवण), स्पर्श (त्वचा), रूप (दृष्टि), स्वाद (स्वाद) और गंध (नाक) जैसे इंद्रिय विषयों का त्याग करना।
- राग-द्वेषौ युद्धस्य च: चीज़ों के प्रति इच्छा (आकर्षण) और घृणा (नफ़रत) का त्याग करना।
- विविक्तसेवी: एकांत और पवित्र जगह पर रहना।
- लघुवासी: हल्का और सात्विक खाना खाना।
- यत्वक-काय-मनसा: वाणी, शरीर और मन को पूरी तरह से कंट्रोल में रखना।
- ध्यानयोगपरः नित्यम्: लगातार ध्यान में डूबे रहना।
इस तरीके से साधक ज्ञान योग के सबसे ऊँचे लेवल पर पहुँचता है।
1.2. श्लोक 53 का विस्तृत विश्लेषण: ब्रह्मप्राप्ति और शांति
अहं बलं दर्पं काम क्रोधं परिग्रहम्। विमुच्य निर्मम: शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥53॥
अर्थ: Bhagavat Gita अहंकार, बल (ईर्ष्या से पैदा होने वाली ताकत), गर्व (घमंड), वासना (सुख की इच्छा), गुस्सा और मोह (सामूहिकता) को पूरी तरह छोड़कर, जो मोह से मुक्त (निर्मम:) और शांत है, वह ब्रह्म (ब्रह्मभूयाय कल्पते) को पाने के लायक हो जाता है।
विस्तृत विश्लेषण:
- छह मुख्य बुराइयों को छोड़ना: यह श्लोक अंदर की रुकावटों को छोड़ने की ओर इशारा करता है।
- ब्रह्मभूयाय कल्पते (ब्रह्म बनने के लायक): इसका मतलब ब्रह्म बनना नहीं है, बल्कि ब्रह्म को पाने के लिए तैयार होना है। इस अवस्था में, ज्ञान योग से गुणों के बंधन से मुक्त होकर आत्म-ज्ञान में स्थापित हो जाता है।
- अकर्म के फल का फल: जब कोई अहंकार और मोह को छोड़ देता है, तो उसे पूरी शांति मिलती है।

खंड 2: परा भक्ति का परम रहस्य (श्लोक 54, 55)
Bhagavat Gita ब्रह्म को पाने के ज्ञान योग की पराकाष्ठा के बाद, भगवान भक्ति की सबसे ऊँची अवस्था – परा भक्ति – का रहस्य बताते हैं, जो मुक्ति का आखिरी पड़ाव है।
2.1. श्लोक 54 का विस्तृत विश्लेषण: ब्रह्मभूत अवस्था और भक्ति
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति । समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्ति लभते पराम् ॥54॥
अर्थ: जो ब्रह्मभूत है (ब्रह्म की प्राप्ति में स्थित), जिसकी आत्मा खुश है, न दुखी होती है और न ही इच्छा करती है। वह सभी प्राणियों के लिए समान भावना रखता है और मेरी परा भक्ति (सर्वोच्च भक्ति) प्राप्त करता है।
विस्तृत विश्लेषण:
- ब्रह्मभूत:: ज्ञान के माध्यम से आत्म-ज्ञान प्राप्त करके शांति में स्थापित होना।
- प्रसन्नात्मा: आंतरिक शांति और संतोष से भरी आत्मा।
- न शोचति न काङ्क्षति: अतीत के लिए कोई दुख नहीं और भविष्य के लिए कोई उम्मीद या इच्छा नहीं।
- समः सर्वेषु भूतेषु: आत्म-ज्ञान के कारण, वह सभी प्राणियों में एक ही परम सत्ता को देखता है।
- मद्भक्तिं लभते परम (सर्वोच्च भक्ति): यहाँ भगवान एक बड़ा राज़ बताते हैं: ब्रह्मज्ञान और निष्काम कर्म से मिली स्थिरता (ब्रह्मभूत अवस्था) ही परा भक्ति की नींव है। भक्ति में ज्ञान पूरा होता है।
2.2. श्लोक 55 का विस्तृत विश्लेषण: भक्ति के माध्यम से ईश्वर की प्राप्ति और मोक्ष
भक्त्या माम्भिजानाति यावन्याश्चास्मि तत्त्वतः। ततो मा तत्त्वतो गणत्वा विशते तदानन्तरम् ॥55॥
अर्थ: Bhagavat Gita भक्ति से वह मुझे सही मायने में (तत्त्वतः) जान लेता है कि मैं कितना महान हूँ (यवन) और मैं कौन हूँ (यश्च अस्मि)। फिर, मुझे सही मायने में (तत्त्वतः) जानकर, वह तुरंत मुझमें (विशते) प्रवेश कर जाता है।
विस्तृत विश्लेषण:
- माम् अभिजानाति (मुझे जानता है): यह ज्ञान सिर्फ़ बौद्धिक नहीं, बल्कि अनुभव से होता है।
- यवन यश्च अस्मि तत्त्वतः: परमपिता परमात्मा की विभूति और उनके मूल रूप (अनंत, सच्चिदानंद) को सही मायने में जानना।
- विशते तदनंतरम् (तुरंत मुझमें प्रवेश करना): भक्ति मोक्ष का आखिरी दरवाज़ा है। इस ज्ञान के बाद, साधक भगवान के साथ एक हो जाता है, यानी मोक्ष प्राप्त करता है।
- निष्कर्ष: गीता के अनुसार, ज्ञान और कर्म का नतीजा आखिरकार भक्ति है, और भक्ति ही मोक्ष का आखिरी ज़रिया है।

भाग 3: कर्म पर नियंत्रण और ईश्वर की शरण (श्लोक 56, 57, 58)
Bhagavat Gita भक्ति योग के ज्ञान के बाद, भगवान फिर से कर्म योग पर आते हैं और बताते हैं कि सभी कर्म करके भी कैसे मुक्ति मिल सकती है।
3.1. श्लोक 56 का विस्तृत विश्लेषण: सभी कर्म करके भी मुक्ति
सर्वकरमाण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।मत्परसादादवाप्नोति शष्वतं पदमव्यायम् ॥56॥
अर्थ: जो भक्त मेरी (मद्व्यपाश्रयः) शरण लेता है, भले ही वह हमेशा सभी कर्म करता हो, मेरी कृपा (मत्परसादात्यात्रयाः) से शाश्वत और अविनाशी अवस्था (मोक्ष) को प्राप्त करता है।
विस्तृत विश्लेषण:
- सर्वा कुर्वाण्यपि कुर्वाण्य� मद्व्यापाश्रयः (मेरी शरण में): अपने कर्मों को पूरी तरह से भगवान को समर्पित करना और उनकी आज्ञा का पालन करना।
- मत्प्रसादात (मेरी कृपा से): साधक को कर्म योग और भक्ति योग के ज़रिए मेहनत करनी चाहिए, लेकिन आखिर में मोक्ष भगवान की कृपा (प्रसाद) से ही मिलता है।
3.2. श्लोक 57 का डिटेल्ड एनालिसिस: कर्म के फल का समर्पण
चेतसा सर्वकरमाणि मयि संन्यस्य मत्परः । बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥57॥
अर्थ: Bhagavat Gita अपने मन से सभी कर्म मुझे समर्पित करके (संन्यास्य), मुझे अंतिम लक्ष्य (मत्परः) मानकर, और बुद्धियोग में शरण लेकर, तुम्हें लगातार अपने मन को मुझमें स्थिर करके (मच्छित्तः) एक हो जाना चाहिए।
विस्तृत विश्लेषण:
- चेत शरीर से कर्म करो, लेकिन मन से फल और कर्ता होने का भाव मुझे समर्पित कर दो।
- मत्परः (अंतिम लक्ष्य): भगवान ही अंतिम लक्ष्य है, और कुछ नहीं।
- बुद्धियोगमुपाश्रित्य: बुद्धि (सात्विक बुद्धि) का इस्तेमाल करो।
- मच्छित्तः सदातम भव (मन लगातार मुझमें लगाओ): यही भक्ति योग का क्रम है। भगवान का लगातार स्मरण करने से ही कर्मों के बंधन से मुक्ति मिल सकती है।
3.3. श्लोक 58 का विस्तृत विश्लेषण: कृपा और मोह का त्याग
मच्छित्तः सर्वदुर्गानि मत्परसादत्रिष्यसि । अथ चेत्वमहान श्रभ्गानि मत्परसादत्रिष्यसि । अथ चेत्वमहान श्रोष्यसि ॥58॥
मतलब: मुझमें मन लगाकर, तुम मेरी कृपा से सभी बाधाओं (मुश्किलों) को पार कर जाओगे। लेकिन अगर तुम अहंकार (अहंकार) के कारण मेरी बातें नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट (विनाक्ष्यसि) हो जाओगे।
विस्तृत विश्लेषण:
- सर्व दुर्गमि तारिष्यसि (सभी मुश्किलों से परे): भगवान की कृपा से आप जीवन की सभी मुश्किलों और बंधनों से आज़ाद हो जाएँगे।
- अहंकारत न श्रोष्यसि (अहंकार के कारण नहीं सुनेंगे): अगर अर्जुन ‘मैं नहीं लड़ूँगा’ के अहंकार में रहे, तो वह गलत कामों में भागीदार बन जाएँगे।
- विनाक्ष्यसि (नष्ट हो जाएँगे): यहाँ ‘नष्ट’ होने का मतलब शारीरिक मृत्यु नहीं, बल्कि आध्यात्मिक पतन, खुद को सही समझने से भ्रष्ट होना और मोक्ष के मार्ग से भटक जाना है।

भाग 4: प्रकृति का बंधन और प्रकृति की प्रेरणा (श्लोक 59, 60)
Bhagavat Gita भगवान अब अर्जुन को याद दिलाते हैं कि मनुष्य प्रकृति के गुणों से कितना बंधा हुआ है और प्रकृति की शक्ति से बचना कितना असंभव है।
4.1. श्लोक 59 का विस्तृत विश्लेषण: मिथ्या संकल्प और प्रकृति की शक्ति
यदाहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मान्यसे। मित्याष्टे विश्वास्ते प्रक्षते प्रक्षत्वां नियोक्षयती ॥59॥
अर्थ: यदि आप अहंकार की शरण लेते हैं और मानते हैं कि ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’, तो आपका संकल्प व्यर्थ है (मिथ्याएश भियासः)। क्योंकि प्रकृति (आपका स्वभाव) आपको निश्चित रूप से युद्ध में शामिल करेगी।
विस्तृत विश्लेषण:
मिथ्याएश भियासः: अर्जुन का युद्ध न करने का संकल्प मिथ्या है, क्योंकि यह भावनात्मक है, ज्ञान पर आधारित नहीं है।
प्रकृति: त्वान नियोक्ष्यति (प्रकृति आपको बांधेगी): अर्जुन का स्वभाव क्षत्रिय (वीर, दृढ़) का है। उसके अंदर के गुण उसे शांत बैठने नहीं देंगे। उसके क्षत्रिय धर्म का आवेग उसे लड़ने के लिए मजबूर कर ही देगा।
4.2. श्लोक 60 का विस्तृत विश्लेषण: स्वभाव बंधनों से मुक्ति का मार्ग
स्वद्वाजेन कौन्तेय निबद्ध: स्वेन कर्मणा। कर्तुण नेचसि यनमोहत्करिष्यस्यावशोपित तत् ॥60॥
अर्थ: हे कौन्तेय, तुम अपने स्वाभाविक कर्म से बंधे हो। इसलिए, तुम जो कर्म आसक्ति के कारण नहीं करना चाहते, वह भी करोगे, भले ही वह अनिच्छा से (अनैच्छिक) हो।
विस्तृत विश्लेषण:
- स्वभावजेन निबद्धः: व्यक्ति अपने स्वभाव (पिछले कर्मों के गुण, गुण) से इतना बंधा होता है कि वह उसके विरुद्ध कार्य नहीं कर सकता।
- मोहात यत न इचासि: अर्जुन आसक्ति (प्रेम, दया) के कारण युद्ध नहीं करना चाहता।
- करिष्यसि अवसः अपि तत् (अनैच्छिक रूप से भी करना पड़ेगा): भले ही अर्जुन अभी युद्ध से भाग जाए, अपने क्षत्रिय स्वभाव के कारण, वह कहीं भी शांति से नहीं बैठ पाएगा। वह दूसरी लड़ाई लड़ेगा या भीतर ही भीतर संघर्ष में रहेगा।
- निष्कर्ष: ये श्लोक अर्जुन को यह मानने पर मजबूर करते हैं कि उसके स्वभाव से बचा नहीं जा सकता, लेकिन वह अपने स्वाभाविक कर्मों को निष्काम भाव से (भक्ति के माध्यम से) करके उससे मुक्त हो सकता है।

निष्कर्ष: ज्ञान, भक्ति और कर्तव्य का संगम
Bhagavat Gita के अठारहवें अध्याय के ये श्लोक (51 से 60) त्याग योग के मूल में सबसे ऊँचे सत्यों का कलेक्शन हैं:
ब्रह्म की प्राप्ति: आसक्ति और अहंकार को छोड़कर, और मन, इंद्रियों और जीवन पर कंट्रोल पाकर, साधक ब्रह्म की स्थिति को प्राप्त करता है।
पारलौकिक भक्ति का मार्ग: ब्रह्म को पाने के बाद, सिर्फ़ आत्म-ज्ञान में स्थित व्यक्ति ही ईश्वर की पारलौकिक भक्ति प्राप्त करता है, और उस भक्ति के ज़रिए ईश्वर को पाकर मुक्ति प्राप्त करता है।
कर्तव्य की अनिवार्यता: इंसान अपने स्वभाव से बंधा हुआ है। इसलिए, स्वाभाविक कर्म को छोड़ने का निश्चय बेकार है। मुक्ति का एकमात्र मार्ग ईश्वर की शरण में जाना, सभी कर्म उन्हें सौंप देना, और निडर होकर अपना कर्तव्य करना है।
इन श्लोकों के ज़रिए, भगवान कृष्ण न सिर्फ़ अर्जुन को लड़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, बल्कि उसे कर्म की पवित्रता और मोक्ष के गहरे रहस्य से भी अवगत कराते हैं।