Bhagavat Gita (भागवद गीता) :गीता के तेरहवां अध्याय के श्लोक 25 से 35 तक का गहन विश्लेषण

मोक्ष का अंतिम मार्ग: समदर्शन और प्रकृति के भेदों का ज्ञान (गीता तेरहवां अध्याय 25-35)

Bhagavat Gita भगवद गीता का तेरहवां अध्याय ‘क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ योग सेक्शन’ योग के ज्ञान की गहरी जानकारी देता है। पूरा होने की ओर। पिछले श्लोकों (13.1-24) में, श्रीकृष्ण ने क्षेत्र (शरीर), क्षेत्रज्ञ (आत्मा), ज्ञाना और 20 गुणों का ज्ञान और प्रकृति और पुरुष के मेल का रहस्य समझाया।

Bhagavat Gita इन आखिरी श्लोकों (13.25-35) में, श्री कृष्ण अब मोक्ष के अलग-अलग प्रैक्टिकल रास्ते बताते हैं, जो हर तरह के इंसान के लिए मौजूद हैं। समभाव को सबसे बड़ा धर्म बताकर, वे प्रकृति और पुरुष के बीच के हमेशा रहने वाले फर्क को समझाते हैं, जो इस चैप्टर का आखिरी और सबसे बड़ा उसूल है।

1.मोक्ष पाने के अलग-अलग तरीके (श्लोक 25-26)

Bhagavat Gita पहले श्लोक 24 में ज्ञान, ध्यान और कर्मयोग के बारे में बताया गया था। अब भगवान दूसरे आसान तरीकों के बारे में बताते हैं।

श्लोक 25:

अन्ये त्वेवम्जानन्त्ः श्रुत्वान्येभ्य उपसाते. ठेपि चातितारंत्येव मृत्युं श्रुतिपरायनाः॥ 25

अर्थ: कुछ लोग इसे (क्षेत्र-क्षेत्रजघ्नाना भेद) ऐसे न जानते हुए भी, दूसरे लोग इसे सुनते हैं और पूजा करते हैं। जो लोग भक्ति (श्रुतिपरायण) से सुनते हैं, वे भी पक्के इरादे से मौत के संसार सागर को पार कर जाते हैं। वह बह जाता है।

श्लोक 26:

यावत्संजायते किंचित्सत्त्वं स्थावरजंगमम्। क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तविद्धि भरतर्षभ ॥ 26

अर्थ: हे भारत श्रेष्ठ! जितने भी चलने-फिरने वाले जानवर पैदा होते हैं, वे सब इस क्षेत्र में फैले हुए हैं और इस क्षेत्र के ज्ञान के संयोग से ही ज्ञान पैदा होता है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita सुनने और भक्ति का महत्व: श्लोक 25 भक्ति का रास्ता सभी के लिए आसान बनाता है। जिन लोगों में गहरे ज्ञान के साथ ध्यान करने की क्षमता नहीं है, वे भी सत्संग (दूसरों से सुनना) में जा सकते हैं और श्रद्धा (श्रुतिपरायण) के साथ पूजा करके मोक्ष पा सकते हैं। यह सुनना ही भक्ति की शक्ति है।

सृष्टि की शुरुआत: श्लोक 26 पूरी सृष्टि के बनने का मूल कारण दिखाता है: क्षेत्र (बेजान शरीर) और क्षेत्रज (आत्मा) का मेल। इन दोनों के मिलने से ही जीव बनते हैं।

2.समभाव और शाश्वत सत्य (श्लोक 27-29)

Bhagavat Gita ये श्लोक ज्ञान के मूल सिद्धांत पर ज़ोर देते हैं, जो बंधन से आज़ाद होने के लिए ज़रूरी है।

श्लोक 27:

सम सर्वेषु भूतेषु तिष्ठंतं परमेश्वरम्। विनाश्यत्स्वविनाश्यंतं यः पश्यति स पश्यति ll 27 ll

अर्थ: जो इंसान सभी नाशवान जानवरों में अविनाशी भगवान को बराबर भाव से देखता है – वही असलियत में देखने वाला है।

श्लोक 28:

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थीमीश्वरम्। न हीनस्त्यात्मनऽआत्मनं ततो याति परं गतिम् ॥ 28

अर्थ: क्योंकि भगवान को हर जगह बराबर मौजूद देखकर, वह (इंसान) अपनी आत्मा के साथ खुद को खत्म कर लेता है। वह ऐसा नहीं करता, और इसीलिए उसे आखिरी लक्ष्य (मोक्ष) मिल जाता है।

श्लोक 29:

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियामाणानि सर्वशः । यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥ 29

अर्थ: जो मनुष्य हर तरह के कर्मों को प्रकृति से होते हुए देखता है और आत्मा को अकर्ता देखता है। (जो कर्म नहीं करता) देखता है – वही असल में देखता है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita समदृष्टि का सिद्धांत: श्लोक 27-28 ज्ञान का सबसे बड़ा फल है: समदृष्टि। इसका मतलब है कि शरीर नाशवान होने पर भी, परमात्मा (क्षेत्रजृ) उसमें वैसे ही रहता है जैसे सभी जानवरों में रहता है। और अविनाशी है।

आत्महत्या का अभाव: समदर्शन से व्यक्ति किसी से द्वेष या हिंसा नहीं करता। ‘न हिनस्त्यात्मन आत्मनम्’ यानी ईश्वर को सर्वत्र समान देखकर, वह कभी किसी दूसरी आत्मा को नहीं जानता। नष्ट नहीं करता, और इस तरह खुद को भी नष्ट नहीं करता। यही अहिंसा और अद्वैत का मूल आधार है।

न करने वाली आत्मा: श्लोक 29 ज्ञान योग का मुख्य सिद्धांत बताता है: कर्म प्रकृति करती है, आत्मा सिर्फ़ एक गवाह है। जो व्यक्ति आत्मा को न करने वाले के रूप में देखता है, वह उसे वैसा ही देखता है जैसा वह असल में है, कर्म के बंधन से मुक्त हो जाता है।

3.क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का अंतिम भेद (श्लोक 30-32)

Bhagavat Gita श्री कृष्ण अब ज्ञान का अंतिम निष्कर्ष देते हैं जिससे इस अध्याय का शीर्षक सार्थक हो जाता है।

श्लोक 30:

यदा भूतपृथग्भवमेक्षमनुपश्यति। तत् एव च ​​विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ 30

अर्थ: जब मनुष्य सभी प्राणियों के अलग-अलग गुणों (शरीर) को एक परमात्मा में स्थित देखता है और केवल इसी के द्वारा वह संपूर्ण का विस्तार देखता है – तब वह ब्रह्म को प्राप्त करता है।

श्लोक 31:

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्माऽयमव्ययः । शरीरस्थोऽपि कौनतेय न करोति न लिप्यते ॥ 31

अर्थ: हे कौन्तेय! सनातन, गुणों से रहित और अविनाशी होने के कारण, यह भगवान शरीर में रहते हुए भी न तो करता है, न भोगता है।

श्लोक 32:

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादकशं नोप्लिप्यते। सर्वत्र व्याप्तितो देहे तत्त्वम् नोपलिप्यते ॥ 32

अर्थ: जैसे सर्वत्र व्याप्त आकाश सूक्ष्म होने के कारण कहीं भी लीन नहीं होता, वैसे ही आत्मा भी शरीर में निवास करती है। सर्वत्र विद्यमान होने पर भी वह लिप्त नहीं होती।

विश्लेषण: Bhagavat Gita ब्रह्म की प्राप्ति: श्लोक 30 में अद्वैत का सिद्धांत है। मोक्ष तब प्राप्त होता है जब व्यक्ति यह समझ जाता है कि भिन्न-भिन्न शरीर (प्राणी) भिन्न-भिन्न दिखाई देने पर भी उनका मूल तत्व एक ही ईश्वर है। इस एकता का दर्शन ही ब्रह्म की प्राप्ति है।

आत्मा का निर्विशेषत्व: श्लोक 31-32 में ईश्वर/आत्मा के निर्विशेष स्वरूप का वर्णन है। आत्मा नित्य, गुणवान और अविनाशी है। शरीर में रहते हुए भी वह कोई कर्म नहीं करता और किसी कर्म में लिप्त नहीं होता। इसकी तुलना आकाश से की गई है। जैसे आकाश सर्वत्र है परंतु किसी वस्तु से आसक्त नहीं है, वैसे ही आत्मा शरीर के दोषों से मुक्त रहती है।

4.ज्ञान का फल और अध्याय की पूर्णता (श्लोक 33-35)

Bhagavat Gita आखिरी श्लोकों में भगवान क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के बीच का अंतर जानने के आखिरी फायदे पर ज़ोर देते हैं। है।

श्लोक 33:

यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नम लोकमिमं रविः। क्षेत्रं क्षेत्रीय तथा कृष्णं प्रकाशयति भारत ॥33

अर्थ: हे भारत! जैसे एक ही सूरज पूरी दुनिया को रोशन करता है, वैसे ही क्षेत्रज्ञ (आत्मा) भी पूरे इलाके (शरीर) को रोशन करती है। पब्लिश करती है।

श्लोक 34:

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमंतरं ज्ञानचक्षुषा। भूतप्रकृति मोक्षं च ये विदुर्यंति ते परम् ॥ 34

अर्थ: जो मनुष्य ज्ञानरूपी नेत्रों से क्षेत्र और ज्ञानरूपी क्षेत्र के इस भेद को देखते हैं, और पशु स्वभाव से मुक्त होने का मार्ग जानते हैं – वे परम तत्व को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 35:

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः । मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपद्यते ॥ 35

अर्थ: इस प्रकार के क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञान को संक्षेप में कहा गया। मेरा भक्त इसे जानकर मेरे आनंद (परमगति) को प्राप्त होता है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita ज्ञान का प्रकाश: श्लोक 33 में क्षेत्रज्ञ (आत्मा) की तुलना सूर्य से की गई है। जैसे सूर्य पूरे संसार को प्रकाशित करता है, वैसे ही आत्मा चेतना द्वारा पूरे शरीर (क्षेत्र) को प्रकाशित करती है।

ज्ञान रूपी चक्षु: श्लोक 34 में, ‘ज्ञान रूपी चक्षु’ (आत्मा और अनात्मा का भेद जानने के लिए ज्ञान रूपी चक्षु) की आवश्यकता है। इस ज्ञान से व्यक्ति प्रकृतिमोक्ष (प्रकृति के बंधन से मुक्त होने का रास्ता) को जानता है और परम तत्व तक पहुँचता है।

भक्तियोग का समावेश: श्लोक 35 में, श्री कृष्ण पूरे अध्याय का सारांश देते हैं। वे फिर से इस बात पर ज़ोर देते हैं कि ‘मद्भक्त एतद्विग्न्याय’ – मेरा भक्त इस क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञान को ठीक से जानता है। मेरी भावनाओं को जानने से प्राप्त होता है। यह ज्ञान योग के अंत में भी भक्ति की सर्वोच्च आवश्यकता को पूरा करता है।

निष्कर्ष

Bhagavat Gita भगवद् गीता के तेरहवां अध्याय (13.25-13.35) के ये आखिरी श्लोक फिलॉसफी का ज्ञान और प्रैक्टिकल मोक्ष के रास्ते का पूरा नज़ारा दिखाते है। मोक्ष का अंतिम मार्ग: समदर्शन और प्रकृति के भेदों का ज्ञान मोक्ष के अलग-अलग तरीके, ज्ञान का आखिरी सिद्धांत, समता का महत्व और ज्ञान का क्षेत्र। आखिरी अंतर के सिद्धांत को पूरी तरह से साफ़ करेगा।

मोक्ष की आसानी: सुनने और भक्ति से भी मोक्ष मिल सकता है। किया जा सकता है, जिससे पता चलता है कि ज्ञान सभी के लिए आसान है।

समदर्शन: सभी जानवरों में एक ही अविनाशी आत्मा को देखना ही सच्चा फिलॉसफी है जो आत्महत्या को रोकता है और हिंसा से आज़ाद करता है।

निष्क्रिय आत्मा: आत्मा शरीर के कामों से अनासक्त होती है, और वह आसमान की तरह पवित्र होती है। इस फर्क को जानने से कर्म के बंधन से मुक्ति मिलती है।

ज्ञान का फल: ज्ञान की आँखों से क्षेत्र और ज्ञान के क्षेत्र के बीच का फर्क जानने से परम सत्य मिलता है। पाना ही इस चैप्टर का आखिरी और ज़रूरी मैसेज है।

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