Bhagavat Gita (भागवद गीता) : गीता के सत्रहवें अध्याय के श्लोक 15 से 21 तक का गहन विश्लेषण

भगवद् गीता: अध्याय सत्रहवें (श्रद्धात्रयविभाग योग) – श्लोक 15 से 21: वाणी, मन और दान के त्रिविध रूपों का गहन विश्लेषण

Bhagavat Gita के सत्रहवें अध्याय के पूर्वार्ध (श्लोक 8 से 14) में, भगवान कृष्ण तपस्या के तीन रूपों – आहार, यज्ञ और शारीरिक तपस्या – का वर्णन करते हैं। अब, श्लोक 15 से 21 में, भगवान तपस्या के अन्य दो महत्वपूर्ण रूपों – वाचिक तपस्या (वाणी पर नियंत्रण) और मानसिक तपस्या (मन पर नियंत्रण) – के साथ-साथ दान की तीन विधियों का गहन विश्लेषण करते हैं।

ये श्लोक मनुष्य के सूक्ष्मतम कर्मों के माध्यम से उसके आंतरिक स्वरूप को पहचानने की कुंजी प्रदान करते हैं। वाणी और मन दो सबसे शक्तिशाली साधन हैं, और इन पर नियंत्रण ही व्यक्ति को सात्विक पूर्णता की ओर ले जाता है।

खंड 1: दो अन्य प्रकार के प्रायश्चित – मौखिक और मानसिक (श्लोक 15, 16)

Bhagavat Gita श्लोक 14 में शारीरिक तपस्या का वर्णन करने के बाद, अब भगवान वाणी और मन से किए जाने वाले तप के रूपों का वर्णन करते हैं। ये तीनों तपस्याएँ, जब सात्विक भाव से की जाती हैं, तो आत्मशुद्धि प्रदान करती हैं।

1.1. श्लोक 15 का विस्तृत विश्लेषण: वाचिक तपस्या – वाणी का संयम और पवित्रता

अनुद्वेगकरं वाकं सत्यं प्रियहितं च यत । स्वध्यायाभ्यसनं चाइव वानमयं तप उच्यते ॥15॥

अर्थ: जो वाणी किसी को चिन्ता (चिंता या अशांति) न दे, सत्य हो, प्रिय हो, कल्याणकारी हो और शास्त्रों के अध्ययन (स्वध्याययाभ्यसनम्) के समान हो, उसे वाचिक तपस्या कहते हैं।

विस्तृत व्याख्या:

Bhagavat Gita वाचिक तपस्या का अर्थ है वाणी का उचित प्रयोग। इस तप के चार मुख्य स्तंभ हैं:

अनुद्वेगकारं वाक्यम् (अशांत न करने वाली वाणी): वाणी ऐसी होनी चाहिए जिससे किसी को क्रोध, भय या पीड़ा न हो। वाणी सदैव शांत और संयमित होनी चाहिए।

सत्यम् (सत्य): वाणी सदैव सत्य पर आधारित होनी चाहिए।

प्रियम् (प्रिय): वाणी मधुर होनी चाहिए, क्योंकि कटु सत्य भी हानिकारक हो सकता है।

हितम् (लाभदायक): वाणी न केवल सत्य और प्रिय हो, बल्कि वक्ता और श्रोता दोनों के लिए हितकारी भी हो। यदि सत्य प्रिय या हितकारी न हो, तो मौन रहना ही श्रेयस्कर है।

स्वाध्यायाभ्यासनम् (शास्त्रों का अध्ययन): मोक्ष की ओर ले जाने वाले शास्त्रों, मंत्रों और स्तोत्रों का नियमित जप और अध्ययन भी वाणी का एक उत्कृष्ट तप है।

इन चार लक्षणों का पालन करना आसान नहीं है, लेकिन जो इन नियमों का पालन करता है, उसकी वाणी शक्तिशाली और शुद्ध हो जाती है।

1.2. श्लोक 16 का विस्तृत विश्लेषण: मानसिक तप – मन की पवित्रता और संयम

मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः । भावसंशुद्धिरित्तपो मानसमुच्ये ॥16॥

अर्थ: मन की प्रसन्नता (शांति), सौम्यता, मौन, आत्मसंयम और भावों की पवित्रता – इसे मानसिक तप कहते हैं।

विस्तृत व्याख्या:

Bhagavat Gita मानसिक तप सबसे सूक्ष्म और कठिन तप है, जो आत्मा की शुद्धि के लिए अनिवार्य है। इस तप के पाँच अंग हैं:

मनः प्रसादः (मन की प्रसन्नता/शांति): मन को सदैव शांत और स्थिर रखना। ईर्ष्या, द्वेष और चिंता से मुक्त रहना।

सौम्यत्वम् (सौम्यता): मन में कठोरता, कुटिलता या कुटिलता न रखना। दूसरों के प्रति प्रेम और मैत्री का भाव रखना।

मौन: केवल वाणी का मौन ही नहीं, बल्कि मन को बार-बार आने वाले विचारों के शोर से मुक्त करना भी मौन है। मौन आत्म-चिंतन का आधार है।

आत्मविनिग्रह: मन को विषयों की ओर भागने से रोकना। मन को सदैव शुभ और सद्विचारों में स्थिर रखना।

भावसंशुद्धि: हृदय में छल, कपट, ईर्ष्या और घृणा जैसी अशुद्ध भावनाओं का त्याग करना और प्रेम व करुणा जैसी शुद्ध भावनाओं का विकास करना।

खंड 2: तीन प्रकार का प्रायश्चित (श्लोक 17, 18, 19)

Bhagavat Gita शारीरिक, वाचिक और मानसिक तपस्याओं के सात्विक स्वरूप की व्याख्या करने के बाद, भगवान अब इन तपस्याओं के गुणों के अनुसार उनके भेदों का वर्णन करते हैं।

2.1. श्लोक 17 का विस्तृत विश्लेषण: सात्विक तपस्याएँ – जड़ और स्थिर

श्रद्धया परया तप्तं तपसत्तत त्रिविधं नरैः । अफलाकंक्षिभिर्युकांकशिभिर्युकटेः ॥17॥

अर्थ: जब संयमी और अविचल मनुष्य इन तीन प्रकार की तपस्याओं (शारीरिक, वाचिक और मानसिक) को परम श्रद्धा के साथ करते हैं, तब उन्हें सात्विक कहते हैं।

विस्तृत व्याख्या:

Bhagavat Gita श्रद्धया परया (सत्रद्धय): सात्विक तपस्या केवल नियमों का पालन नहीं है, बल्कि परमेश्वर में दृढ़ श्रद्धा और विश्वास के साथ की जाती है।

त्रिविधं तपः (तीन प्रकार): जब शारीरिक, वाचिक और मानसिक तपस्या सामंजस्यपूर्वक की जाती है।

अफलाकांक्षीभिः (फल की इच्छा रहित): इस तप का उद्देश्य मोक्ष या आत्मशुद्धि है, इसमें भौतिक फल की कोई अपेक्षा नहीं होती। यह निष्फल तप है।

युक्तैः (योगी/संयामी): जो मन और इंद्रियों को वश में करके तप करते हैं। यह तप मन को शांति प्रदान करता है और आध्यात्मिक उन्नति में सहायक होता है।

2.2. श्लोक 18 का विस्तृत विश्लेषण: राजसिक तपः – सम्मान और पूजा के लिए

सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चाइव यत्य । क्रियाते तदिह प्रोकतं राजसं चलमध्रुवम् ॥18॥

अर्थ: जो तप स्वागत (आमंत्रण), सम्मान और पूजा प्राप्त करने के उद्देश्य से, तथा पाखंड सहित किया जाता है, उसे यहाँ राजसिक कहा गया है। यह तप चंचल और अध्रुवादी है।

विस्तृत व्याख्या:

Bhagavat Gita सत्कार-मान-पूजर्थम्: राजसिक तप का उद्देश्य समाज में बाह्य प्रशंसा और प्रतिष्ठा प्राप्त करना है। यह तप ‘लोगों को दिखाने के लिए’ किया जाता है।

दंभेन चैव (दिखावे सहित): इसमें आंतरिक शुद्धता का अभाव होता है और यह केवल दिखावे के लिए होता है।

चलम् (चंचल) और अध्रुवम् (अस्थायी): इस तप का फल चंचल होता है। यह केवल तब तक रहता है जब तक सम्मान मिलता है। जब सम्मान नहीं मिलता, तो व्यक्ति तप त्याग देता है। राजसिक तप अंततः अहंकार और अशांति को जन्म देता है।

2.3. श्लोक 19 का विस्तृत विश्लेषण: तामसिक तप – जड़ता और विनाश

मूढग्रहेणात्मनो यत्पीडया क्रियाते तपः । परस्योतसादनार्थं वा तत्तमसमुदाहृतम् ॥19॥

अर्थ: जो तपस्या मूर्खतापूर्ण हठ (मुधगर्ह), अपने शरीर को कष्ट पहुँचाने (आत्मनाह पीड्याम) और दूसरों का नाश करने की नीयत से की जाती है, उसे तामसी कहते हैं।

विस्तृत व्याख्या:

Bhagavat Gita मुधगर्हाहना (मूर्खतापूर्ण हठ): तामसी तपस्या बुद्धि का प्रयोग किए बिना, केवल हठ या जड़ता के कारण की जाती है (जैसे श्लोक 5-6 में वर्णित अमानवीय तपस्या)।

आत्मनाह पीड्यामनाह (शरीर को कष्ट): जैसे, लंबे समय तक अन्न-जल का त्याग करना, जिससे शरीर का नाश होता है। यह अज्ञानतावश किया गया तप है।

पर स्योत्सादार्थम् (दूसरों का नाश): तामसिक तपस्या का उद्देश्य प्रायः शक्ति प्राप्त करना और दूसरों को हानि पहुँचाना, ईर्ष्या से प्रेरित शत्रु का नाश करना, या बुरी सिद्धियाँ प्राप्त करना होता है।

खंड 3: त्रिगुणात्मक दान का वर्गीकरण (श्लोक 20, 21)

Bhagavat Gita तपस्या के बाद, भगवान अब दान का वर्णन करते हैं। दान त्याग का प्रतीक है और अपने उद्देश्य व विधि के अनुसार यह भी तीन प्रकार का होता है।

3.1. श्लोक 20 का विस्तृत विश्लेषण: सात्विक दान – कर्तव्य और निरर्थकता

दवायमिति इद्दनान दयतेऽ। देशे काले च पात्रे च तद्दन सात्विकं स्मृतम् 20।

अर्थ: जो दान इस भावना से दिया जाता है कि ‘दान देना मेरा कर्तव्य है’, बदले में किसी लाभ (अनुपकारिण) के बिना, और जो सही देश, सही समय और सही व्यक्ति को दिया जाता है, वह सात्विक माना जाता है।

विस्तृत व्याख्या:

Bhagavat Gita दतव्यम् इति (कर्तव्य भावना): सात्विक दान का उद्देश्य ‘कर्तव्य’ निभाना है, बदले में कुछ पाना नहीं।

अनुपकारिण (बदले में कुछ भी नहीं): दान ऐसे व्यक्ति को दिया जाना चाहिए जो भविष्य में आपकी मदद या लाभ न कर सके। यदि आप किसी ऐसे व्यक्ति को देते हैं जो आपका भला करेगा, तो वह दान नहीं, बल्कि व्यापार बन जाता है।

देश, काल और पात्र (तीन पवित्रताएँ):

देश (स्थान): पवित्र स्थान, मंदिर, जहाँ ज़रूरतमंद लोग रहते हैं।

काल (समय): त्यौहार, संकट के समय या जब कोई व्यक्ति वास्तव में ज़रूरतमंद हो।

पात्र (व्यक्ति): एक गुणी, विद्वान, धार्मिक या सचमुच ज़रूरतमंद व्यक्ति।

सात्विक दान हृदय में त्याग और आनंद लाता है।

3.2. श्लोक 21 का विस्तृत विश्लेषण: राजसिक दान – फल और दुःख की आशा

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनःप्राप्ति। दीयते च परिक्लिष्टं तद्दनं राजसं स्मृतम् ॥21॥

अर्थ: लेकिन जो दान बदले में उपकार पाने की नीयत से, या फल की नीयत से और मन में दुःख या व्यथा के साथ दिया जाता है, वह राजसिक माना जाता है।

विस्तृत व्याख्या:

Bhagavat Gita प्रत्युपकारथम (प्रतिशोध की आशा): दाता भविष्य में उस व्यक्ति से सहायता, राजनीतिक लाभ या सामाजिक सम्मान पाने की आशा रखता है।

फलम् उद्दिष्य (फल का उद्देश्य): स्वर्ग में स्थान, धन में वृद्धि या अन्य भौतिक फलों की आशा।

परिक्लिष्टम् (दुःख सहित): दान देते समय मन में असंतोष या दुःख होता है, जैसे ‘मुझे इतना देना था!’ यह दान उदारता नहीं, बल्कि लज्जापूर्ण होता है।

राजसिक दान मन में अशांति और अहंकार लाता है।

निष्कर्ष: पवित्रता का त्रिवेणी संगम

Bhagavat Gita के सत्रहवें अध्याय के ये श्लोक (15 से 21) आध्यात्मिक जीवन के तीन महत्वपूर्ण स्तंभों का रहस्य उजागर करते हैं:

तप की सिद्धि: पूर्ण आत्म-शुद्धि केवल शारीरिक, वाचिक और मानसिक तप के संयोजन से ही प्राप्त होती है। वाणी और मन पर नियंत्रण साधना की सबसे बड़ी चुनौती है।

पुण्य की कसौटी: तीनों प्रकार के तप और दान का अंतिम उद्देश्य ही उसका पुण्य निर्धारित करता है। निःस्वार्थता की भावना ही सात्विक पुण्य की कुंजी है।

त्याग का स्वरूप: दान केवल धन देना नहीं है, बल्कि कर्तव्य की भावना से, योग्य व्यक्ति को, बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के, दान करना है, जिसका अर्थ अंततः राजसिक और तामसिक प्रवृत्तियों का त्याग है।

इस ज्ञान के माध्यम से, व्यक्ति अपने कर्मों के गुणों को जान सकता है और जीवन में सात्विक पुण्य को सचेतन रूप से ग्रहण कर मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है।

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