
भगवद् गीता: अध्याय सोलहवाँ (दैवासुरसम्पद्विभाग योग) – श्लोक 1 से 8: दैवी और आसुरी सम्पदा का आरंभ और व्यापक विश्लेषण
Bhagavat Gita भगवद्गीता के अध्याय सोलहवाँ को ‘दैवासुरसम्पद्विभाग योग’ के नाम से जाना जाता है। पंद्रहवें अध्याय में भगवान कृष्ण ने अपने परम स्वरूप ‘पुरुषोत्तम’ का ज्ञान प्रदान किया। अब, इस सोलहवें अध्याय में, वे बताते हैं कि क्या मनुष्य इस परम ज्ञान को प्राप्त करने में सक्षम है, और इसका कारण मनुष्य के आंतरिक स्वभाव के दो परस्पर विरोधी तत्व हैं – दैवी गुण (दैवी गुण) और आसुरी गुण (आसुरी गुण)।
Bhagavat Gita इस अध्याय के प्रथम आठ श्लोक मानव स्वभाव का निदान हैं। प्रथम तीन श्लोक मुक्ति की ओर ले जाने वाले छब्बीस दैवी गुणों का विस्तृत वर्णन करते हैं, जबकि श्लोक 4 से 8 आसुरी गुणों, उनके फलों और संसार के प्रति उनके विनाशकारी दृष्टिकोण पर विस्तार से प्रकाश डालते हैं।
1.खंड 1: दैवी संपत्ति – जीवन का आधार और मोक्ष का कारण (श्लोक 1, 2, 3)

Bhagavat Gita भगवान कृष्ण ने यहाँ दैवी संपदा से उत्पन्न महापुरुषों के गुणों का विस्तार से वर्णन किया है। ये गुण केवल आचरण ही नहीं, बल्कि जीवन-पद्धति का आधार भी हैं।
1.1. श्लोक 1 का विस्तृत विश्लेषण: आंतरिक पवित्रता और स्थिरता
अभ्याम सत्वसंसुधिरज्ञानयोग सुरकाण्यानस्च्च स्वधुरज्ञानस्च्च स्वधुयायस्तप आरज्वम् ॥1 ॥
- अभयम् (भय का अभाव): यह दिव्य गुणों का आधार है। व्यक्ति सभी भयों से कब मुक्त होता है? जब वह शरीर को अपनी आत्मा मानना बंद कर देता है। बुद्धिमान लोग समझते हैं कि आत्मा अमर है, इसलिए मृत्यु या विपत्ति का कोई भय नहीं रहता। अभयम् मानसिक स्थिरता का अंतिम परिणाम है, जिसके बिना कोई आध्यात्मिक प्रगति संभव नहीं है।
- सत्त्वसंशुद्धि (सार की शुद्धता): इसका अर्थ केवल शारीरिक शुद्धता ही नहीं, बल्कि मन, हृदय और बुद्धि की शुद्धता भी है। सत्त्वसंशुद्धि ईर्ष्या, छल, कपट और स्वार्थ जैसी अशुद्धियों से मन की मुक्ति है। शुद्ध मन में आत्म-ज्ञान प्रतिबिम्बित होता है।
- ज्ञान-योग-व्यवस्था: ज्ञान का अर्थ है आत्मा और अनात्म का बोध, और योग का अर्थ है परमात्मा से मिलन। यह गुण दर्शाता है कि व्यक्ति ने न केवल ज्ञान प्राप्त कर लिया है, बल्कि अपने जीवन में ज्ञान को दृढ़तापूर्वक स्थापित कर लिया है और योग के माध्यम से परम सत्य को प्राप्त कर लिया है।
- दान: दान केवल धन या वस्तु का दान नहीं है। दान तीन प्रकार का होता है: सत्वगुणी दान (उचित भावना, समय और इच्छा के साथ), रजोगुणी दान (फल की आशा के साथ), और तमोगुणी दान (अपात्र के प्रति अनादर के साथ)। दिव्य पुरुष निःस्वार्थ भाव से दान करता है, जो आसक्ति का त्याग है।
- दमश्च (इंद्रियों का संयम): इंद्रियों को सांसारिक सुखों की चाहत से रोकना। इस दमन का अर्थ दमन नहीं, बल्कि उचित नियंत्रण है। संयम के बिना मन अशांत रहता है और साधना में स्थिरता का अभाव होता है।
- यज्ञ: केवल कर्म ही नहीं, बल्कि परमात्मा की प्रसन्नता के लिए निःस्वार्थ भाव से किया गया प्रत्येक कर्म यज्ञ है। इसमें जीवों की सेवा, राष्ट्र सेवा, पर्यावरण संरक्षण और पंचमहायज्ञों का पालन शामिल है।
- स्वाध्याय: शास्त्रों का नियमित और गहन अध्ययन, जो मुक्ति और मोक्ष की ओर ले जाता है। आत्म-चिंतन और आत्मनिरीक्षण के माध्यम से अपने वास्तविक स्वरूप को समझने का प्रयास।
- तप: शारीरिक (ईश्वर, गुरु की आराधना), वाचिक (सत्य, सद्वाणी) और मानसिक (मन की शांति, मौन) – ये तीन तप के स्तर ईश्वर प्राप्ति के लिए आवश्यक हैं।
- आर्जवम्: विचार, वाणी और कर्म में सरलता और प्रत्यक्षता। जो भीतर है उसे बाह्य रूप से अभिव्यक्त करना। कपट का पूर्ण अभाव।

1.2. श्लोक 2 का विस्तृत विश्लेषण: Bhagavat Gita व्यावहारिक नैतिकता और करुणा
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यगः शांतिप्रशुनम्। दया भूतेशवलोलुप्तमर्द्वं हृराचापलम् ॥2॥
- अहिंसा: अहिंसा परम धर्म है। इसमें न केवल शारीरिक हिंसा का त्याग, बल्कि मन और वाणी से किसी को भी हानि न पहुँचाना भी शामिल है। दिव्य स्वभाव वाला व्यक्ति अन्य प्राणियों के कल्याण की भावना से जीवन व्यतीत करता है।
- सत्यम्: जो देखा, सुना या अनुभव किया है, उसे हित की भावना से बोलना। यदि सत्य बोलने से दूसरों को हानि पहुँचती है, तो उस सत्य का त्याग कर देना चाहिए।
- अक्रोध: क्रोध बुद्धि का नाश करता है। ईश्वरीय सत्ता क्रोध के कारणों को नियंत्रित करती है और क्षमा द्वारा कामना को शांत करती है।
- त्याग: यहाँ त्याग का अर्थ है सुखद वस्तुओं और सुख के साधनों के प्रति आसक्ति का त्याग। यह अनासक्ति का द्योतक है।
- शांति: शांति वह अवस्था है जब मन बाहरी परिस्थितियों के बदलने पर भी स्थिर और अविचल रहता है।
- अपैषुनम् (क्रोध का अभाव): दूसरों की आलोचना न करना, उनकी अनुपस्थिति में उनकी बुराई न करना, या ईर्ष्यालु शब्दों का प्रयोग न करना। एक दिव्य व्यक्ति सदैव रचनात्मक संवाद में संलग्न रहता है।
- दया भूतेषु (सभी प्राणियों के प्रति करुणा): केवल मनुष्यों के प्रति ही नहीं, बल्कि सभी प्राणियों के प्रति करुणा और सहानुभूति रखना।
- अलोलुप्तवम् (निर्भयता): लोभ पाप का मूल है। इंद्रिय सुखों या धन के प्रति अत्यधिक आसक्ति या वासना न रखना।
- मार्दवम् (विनम्रता): स्वभाव से कठोर न होना, बल्कि कोमल, विनम्र और मधुर होना।
- ह्री (शर्म): कोई नीच, अयोग्य या अशोभनीय कार्य करने में लज्जा महसूस करना। यह हृदय के सार को दर्शाता है।
- अचपलम् (स्थिरता): मन, वाणी और कर्म में स्थिर रहना। जल्दबाजी, उत्सुकता या बेचैनी का अभाव।
1.3. श्लोक 3 का विस्तृत विश्लेषण: Bhagavat Gita आंतरिक शक्ति और त्याग
तेज: क्षमा: यौन अनैतिकता का भय। भवन्ति सम्पन्दं दैवेम्भिजातस्य भारत ||3||
- तेजः (तेज): यह केवल भौतिक तेज नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक शक्ति, निर्भयता और सकारात्मकता का प्रभाव है, जो ईश्वरीय व्यक्तित्व से निःसृत होता है।
- क्षमा: अपनी शक्ति के बावजूद दूसरों के अपराधों को क्षमा करने की महानता। क्षमा वीरता का प्रतीक है।
- धृति: चाहे कितनी भी विपत्ति, असफलता या दुःख क्यों न हो, मन को स्थिर और अविचल रखने की शक्ति।
- शौचम् (पवित्रता): आंतरिक (राग और द्वेष से मुक्त मन) और बाह्य (स्वच्छ शरीर) पवित्रता।
- अद्रोहाः (घृणा का अभाव): किसी के प्रति घृणा, शत्रुता या ईर्ष्या की भावना न रखना।
- नतिमनिता (सम्मान का अभाव): सम्मान, पूजा या महत्व की अत्यधिक अपेक्षा न रखना। आत्म-प्रशंसा या दंभ का त्याग करना।
निष्कर्ष: जिस व्यक्ति में ये छब्बीस गुण होते हैं, उसे दिव्य वरदानों के साथ जन्मा हुआ माना जाता है। इन गुणों का विकास ही मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य है।

2.खंड 2: राक्षसी ग्रसना – अंधकार और बंधन का मार्ग (श्लोक 4, 5)
Bhagavat Gita अब श्रीकृष्ण आसुरी स्वभाव के मनुष्यों के गुणों और उनके चरम फल का वर्णन करते हैं।
2.1. श्लोक 4 का विस्तृत विश्लेषण: अहंकार और कठोरता
दंभो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पौरुषमेव च। अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ संपदमासूर्यम् ॥4॥
- ढोंग: वह व्यक्ति जो बाहरी तौर पर धार्मिक, बुद्धिमान या गुणी होने का दिखावा करता है, भले ही वह आंतरिक रूप से अशुद्ध हो।
- दर्प: अपनी शक्ति, धन, सुंदरता या पद का अभिमान, जो दूसरों का तिरस्कार करने के लिए प्रेरित करता है।
- अभिमानश्च: आत्म-श्रेष्ठता की भावना, जहाँ व्यक्ति का सम्मान नहीं किया जाता या वह अपने गुरु की शिक्षाओं को स्वीकार नहीं करता।
- क्रोध: निरंतर उत्तेजना और विनाशकारी आवेग जो स्वयं और दूसरों का विनाश करते हैं।
- पुरुष्यम: वाणी और व्यवहार में निर्दयता, क्रूरता और असंवेदनशीलता।
- अजानम्: आत्म-ज्ञान और ईश्वरीय सत्य का पूर्ण अभाव। अज्ञान आसुरी गुणों का मूल है, क्योंकि यह आसक्ति और अहंकार को जन्म देता है।
2.2 श्लोक 5 पर टिप्पणी: Bhagavat Gita मार्ग और गति
दिव्यसंपादविमोक्षाय निबन्दयासूरी माँ। माता शुच सम्पदं दैविम्भिजतोसि पाण्डव ||5||
आसुरी और दैवी मार्गों के परिणाम: भगवान स्पष्ट करते हैं कि दैवी मार्ग का लक्ष्य मोक्ष (विमोक्ष) है, जबकि आसुरी मार्ग का लक्ष्य बंधन (बंधन और संसार का चक्र) है। आसुरी गुण आत्मा को पूर्ण अंधकार और दुःख में डुबो देते हैं।
अर्जुन को सांत्वना: शोकग्रस्त अर्जुन को सांत्वना देते हुए, श्रीकृष्ण कहते हैं, “शोक मत करो, तुम दैवी मार्ग पर जन्मे हो।” यह कथन अर्जुन के दिव्य स्वभाव की पुष्टि करता है।

3.खंड 3: राक्षसी मानसिकता का सैद्धांतिक विश्लेषण (श्लोक 6, 7, 8)
Bhagavat Gita अब श्री कृष्ण राक्षसी लोगों की मानसिकता के मूल सिद्धांतों का विश्लेषण करते हैं, जो उन्हें अधर्म की ओर ले जाते हैं।
3.1. श्लोक 6: स्पष्ट विभाजन
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽसमिन्दैव असुर एव च। दैवो विस्तारः प्रोक्त असुरं पार्थ मे शृषु ॥6॥
मनुष्य के दो ही मूल स्वभाव हैं- दैवीय या आसुरी। यह कोई धार्मिक भेद नहीं, बल्कि आंतरिक गुणों का भेद है। अब तक दैव का विस्तार से वर्णन हो चुका है, अब आसुरी प्रकृति के मूल विचारों को सुनने का आदेश है।
3.2. श्लोक 7: Bhagavat Gita आचरण और सत्य का अभाव
प्रत्विं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुरः। न शौचं न नापि चाचचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥7॥
आसुरी प्रवृत्तियों के विनाशकारी विचारों की व्याख्या करते हुए, श्रीकृष्ण उनके तीन मूल दोषों का उल्लेख करते हैं:
- कर्म-त्याग का अज्ञान: आसुरी प्रवृत्तियाँ धर्म या शास्त्रों द्वारा बताए गए कर्म (धार्मिक त्याग) और अधार्मिक त्याग के बीच का अंतर नहीं जानतीं। वे केवल अपनी इच्छाओं और स्वार्थ को ही धर्म मानते हैं।
- पवित्रता और आचरण का अभाव: वे आंतरिक या बाह्य पवित्रता में विश्वास नहीं करते। नैतिकता, सदाचार और सही आचरण उनके जीवन में गौण हैं।
- सत्य का अभाव: वे ईमानदारी और नैतिक मूल्यों को महत्व नहीं देते। उनके लिए, झूठ और छल उनके लक्ष्यों को प्राप्त करने का एक साधन हैं।

3.3. श्लोक 8 का विस्तृत विश्लेषण: Bhagavat Gita नास्तिक और भौतिकवादी दृष्टिकोण
असत्यप्रतिष्ठाम् ते जगदाहुर्नीश्वरम्। अपरस्परसंभूतं किम्न्यात्कमहैतुकम ॥8॥
यह श्लोक राक्षसी मानसिकता के चार गहन स्तंभों को उजागर करता है, जो आधुनिक नास्तिक और भौतिकवादी विचारधारा का आधार भी हैं:
- असत्यम् (संसार मिथ्या है): उनका मानना है कि इस संसार में कोई आध्यात्मिक सत्य नहीं है। जीवन का कोई महान उद्देश्य नहीं है; सब कुछ निरर्थक है।
- अप्रस्थस्थम् (निराधार): उनका मानना है कि इस संसार का कोई नैतिक आधार या धार्मिक व्यवस्था नहीं है। नैतिकता केवल मानव निर्मित है, और इसे तोड़ने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता।
- अनीश्वरम् (ईश्वरविहीन): वे किसी भी रचयिता, नियंत्रक या किसी भी दैवीय शक्ति के अस्तित्व को पूरी तरह से नकारते हैं। उनका जीवन पूरी तरह से उनकी अपनी शक्ति और इच्छाओं पर आधारित है।
- कामहितुकम् (केवल वासना का परिणाम): उनका मानना है कि ब्रह्मांड की रचना किसी दैवीय शक्ति का परिणाम नहीं है, बल्कि केवल एक पुरुष और एक स्त्री के मिलन, अर्थात् यौन इच्छा का परिणाम है। वे जीवन के मूल कारण को भौतिक और जैविक स्तर तक सीमित रखते हैं।

निष्कर्ष: आंतरिक विकल्प का महत्व
Bhagavat Gita के 16वें अध्याय के ये पहले आठ श्लोक मानव स्वभाव का गहन मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं।
श्रीकृष्ण हमें याद दिलाते हैं कि हम कौन से बीज बोते हैं, यह हमारा चुनाव है। निर्भयता, सत्य और करुणा पर आधारित दैवी संपदा मुक्ति की ओर ले जाती है। जबकि पाखंड, अज्ञान और अहंकार पर आधारित आसुरी संपदा हमें अंधकारमय भविष्य और बंधन की ओर ले जाती है। इस अध्याय का आरंभ हमें अपने आंतरिक स्वरूप को पहचानने और सचेतन रूप से ईश्वरीय मार्ग चुनने के लिए प्रेरित करता है।