
धर्म का प्रभाव: गीता के पहले अध्याय के श्लोक 13 से 24 का गहराई से विश्लेषण
Bhagavat Gita के पहले अध्याय के श्लोक 1 से 12 में कौरव सेना और पितामह भीष्म के शंख बजाने की आवाज़ का परिचय दिया गया है। जय। यह सिंहनाद युद्ध की शुरुआत का ऐलान था। अब श्लोक 13 से 24 में पांडवों के ज़बरदस्त जवाबी हमले, श्री कृष्ण और अर्जुन के दिव्य काम के बारे में बताया गया है। युद्ध के मैदान में अर्जुन के दुख का महत्व और पहला पल दिखाया गया है।
आइए इन ज़रूरी श्लोकों और उनके गहरे मतलब को विस्तार से समझते हैं।

1.पांडवों का उत्साहपूर्ण जवाब (श्लोक 13 से 19)
Bhagavat Gita भीष्म के शंखनाद से कौरवों में जोश भर गया, लेकिन पांडवों ने और भी ज़ोरदार आवाज़ से जवाब दिया, जिससे जीत में उनका आत्मविश्वास और नैतिक ताकत दिखाई दी।
श्लोक 13:
ततः शंखाच भेर्यश्च पावनकगोमुखाः । सहसैवाभ्यहन्यंत स शब्दस्तुमुलोऽभवत्त ॥ 13॥
अर्थ: फिर (भीष्म के शंख बजाने के बाद) शंख, ढोल, नगाड़े, सींग और गोमुख (तुरही) एक साथ बज उठे, और वह आवाज़ बहुत भयानक थी।
विश्लेषण: यह आवाज़ पांडव पक्ष से आती है। कौरवों ने सिर्फ़ एक शंख बजाया, जबकि पांडवों ने कई वाद्य यंत्रों की ज़बरदस्त आवाज़ की। यह ‘तुमुलह’ शब्द (भयानक आवाज़) बताता है कि पांडवों का नैतिक बल कौरवों से ज़्यादा मज़बूत है।
Bhagavat Gita श्री कृष्ण और अर्जुन का दिव्य शंख बजाना (श्लोक 14-15)
पांडव पक्ष से सबसे ज़रूरी जवाब श्री कृष्ण और अर्जुन का आता है।
श्लोक 14:
श्वेतैर्हयुक्ते महति स्यान्दना स्थिततोने माधवः पांडवचैव द्वियु शंखौ प्रधानमतुः ॥ 14 ॥
अर्थ:श्री कृष्ण (माधव) और अर्जुन (पांडव), जो सफेद घोड़ों से खींचे जा रहे एक शानदार रथ पर बैठे थे, ने भी अपने दिव्य शंख बजाए।
विश्लेषण: सफेद घोड़ों से खींचा जा रहा और शानदार अर्जुन का रथ न्याय और निष्पक्षता का प्रतीक है। सबसे ज़रूरी, ‘दैवी शंख’ (दो दिव्य शंख)। यह घोषणा युद्ध को एक साधारण लड़ाई से न्याय और अन्याय की दिव्य लड़ाई में बदल देती है। ‘माधव’ और ‘पांडव’ शब्द श्री कृष्ण के दिव्य अधिकार और अर्जुन की श्रेष्ठता की पुष्टि करते हैं।

श्लोक 15:
पांचजन्यं हृषिकेश देवदत्तं धनं जनंजय। पौंड्रं दधमाव महाशन भीमकर्मा वृकोदर: ॥ 15 ॥
अर्थ: हृषिकेश (श्री कृष्ण) ने पांचजन्य शंख बजाया, धनंजय (अर्जुन) ने देवदत्त शंख बजाया, और महान शंख वृकोदर (भीम) ने पांचजन्य शंख बजाया।
विश्लेषण: यहां, मुख्य योद्धाओं के शंखों को खास नाम दिए गए हैं। हर शंख किसी खास कैरेक्टर के गुणों और शक्तियों को दिखाता है। श्री कृष्ण का ‘पांचजन्य’ और अर्जुन का ‘देवदत्त’ सबसे बड़ी दिव्यता को दिखाता है। भीम का ‘पौंड्र’ उनकी बहुत ज़्यादा शक्ति को दिखाता है।
Bhagavat Gita दूसरे महान योद्धाओं के शंख की आवाज़ (श्लोक 16-18)
पांडवों के दूसरे मुख्य योद्धा भी लड़ाई के लिए अपनी तैयारी बताते हैं।
श्लोक 16-17:
कुंती के पुत्र अनंतविजय के पुत्र युधिष्ठिर। नकुल: सहदेवश्च सुखोष्मनिपुष्पकौ ॥ 16 कश्यश्च परमेश्वस: शिखंडी च महारथ: धृष्टद्युम्नो विराटश्च सत्यकिश्चपराजित: ॥ 17
अर्थ:कुंतीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनंतविजय शंख बजाया, नकुल और सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक शंख बजाया। इसके अलावा महान धनुर्धर काशिराज, महारथी शिखंडी, धृष्टद्युम्न, विराट और अजेय सत्यकि ने भी शंख बजाया।
श्लोक 18:
द्रौपदो द्रौपदेयाश्च श्रेष्ठाशा पृथिविपेते। सौभद्रश्च महाबाहु: संगखानन्दधमु: पृथक्। 18
अर्थ: राजन, द्रुपद, द्रौपदी के बेटों और महाबाहु अभिमन्यु ने भी अलग-अलग तरह से अपने शंख बजाए।
विश्लेषण: यह डिटेल्ड लिस्ट दिखाती है कि पांडव एक ही मकसद के साथ एक साथ खड़े थे। युधिष्ठिर का ‘अनंतविजय’ शंख धर्म पर आधारित जीत में उनके भरोसे को दिखाता है। इन शंखों ने मिलकर एक ऐसी गर्जना पैदा की जिसने युद्ध के मैदान का माहौल हिला दिया।

कौरवों पर असर (श्लोक 19)
Bhagavat Gita कौरव सेना पर पांडवों के शंखनाद का असर इस तरह बताया गया है:
श्लोक 19:
स गोशो धरतराष्टराणां हृदानि व्यदार्यत्य नहब्श्च पृथिविन चैव तुमुलो व्यनुनादयन्न ॥ 19॥
अर्थ: उस भयानक आवाज़ ने, आसमान और धरती को गरजते हुए, धृतराष्ट्र के बेटों (कौरवों) के दिल फाड़ दिए।
विश्लेषण: यह एक बहुत ज़रूरी श्लोक है। यहाँ संजय मानते हैं कि पांडवों के दिव्य शंखनाद ने कौरवों के दिलों में डर पैदा कर दिया था। ‘हृदयानि व्यदार्यत’ (दिल फाड़ दिए) शब्द दुर्योधन की तरफ की अंदरूनी कमज़ोरी और नैतिक गिरावट को दिखाते हैं। भले ही कौरव संख्या में ज़्यादा मज़बूत थे, लेकिन धर्म की तरफ की दिव्य घोषणा ने उनके आत्मविश्वास को चकनाचूर कर दिया।
2.अर्जुन का रथ खड़ा करना और जांचना (श्लोक 20 से 24)

Bhagavat Gita शंखनाद के बाद, जब युद्ध शुरू होने वाला था, अर्जुन एक निर्णायक कदम उठाते हैं।
श्लोक 20:
अथ सत्राष्टान्द्रताण्राण्त्वा धरत्राण्राण्त्वजः । प्रवृते शष्टसम्पाते धनुरुद्यम्य पांडवः ॥ 20॥ हृष्टीकेशं तदा वाक्षमिदमाः ॥
अर्थ: हे राजन, जब युद्ध शुरू होने वाला था, तो कपिध्वज (हनुमानजी का झंडा) लिए अर्जुन ने कौरवों को एक लाइन में खड़े देखा, तो अपना धनुष उठाया और श्री कृष्ण से यह वादा किया।
विश्लेषण: अर्जुन का नाम यहाँ ‘कपिध्वज’ (हनुमान के ध्वजवाहक) के रूप में जाना जाता है, जो उनकी अजेयता और दिव्य सुरक्षा को दर्शाता है। अर्जुन अब श्री कृष्ण, ‘हृषिकेश’ (इंद्रियों के स्वामी) को एक बात बताते हैं, जो गीता की शिक्षाओं का प्रारंभिक बिंदु बन जाता है।
श्लोक 21-22:
अर्जुन उवाच सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥ 21॥ यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् । कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥ 22॥
अर्जुन ने कहा: हे अच्युत (श्री कृष्ण), जब तक मैं इन सभी योद्धाओं को युद्ध की इच्छा से यहाँ खड़े न देख लूँ, और जिनसे मुझे इस युद्ध की शुरुआत में युद्ध करना है, तब तक मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में रखो।
विश्लेषण: दुनिया के सबसे महान योद्धा अर्जुन, युद्ध से पहले विरोधी पक्षों को देखने की इच्छा ज़ाहिर करते हैं। यह किसी आम योद्धा का डर नहीं है, बल्कि एक नैतिक अनिश्चितता की शुरुआत है। वह हृषिकेश (श्री कृष्ण) को ‘अच्युत’ (जो कभी भटकता नहीं) कहकर संबोधित करते हैं, यह दिखाते हुए कि वह जानते हैं कि श्री कृष्ण इस युद्ध में स्थिर मार्गदर्शक हैं।

श्लोक 23:
योत्स्यमानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः । धार्तर्ष्ते दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रिययुद्धे प्रियचीकीर्षवः ॥ 23॥
अर्थ: (मेरे रथ को बीच में रखो) ताकि मैं उन लोगों को देख सकूं जो दुर्योधन को मूर्खों का प्रिय बनाने के इरादे से यहां लड़ने के लिए इकट्ठा हुए हैं।
विश्लेषण: यहां अर्जुन सीधे दुश्मनों की पहचान उन लोगों के रूप में करते हैं जो दुर्योधन को प्रिय बनाने के लिए यहां इकट्ठा हुए हैं, जो दुर्योधन की अधर्मी सोच को दिखाता है। यह धर्मपक्ष की ओर उसके झुकाव को दिखाता है, लेकिन वह फिर भी लड़ने के लिए तैयार है।
श्री कृष्ण द्वारा रथ की स्थापना (श्लोक 24)
श्लोक 24:
संजय उवाच एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत । सेनोरुभ्योरुभारतम् ॥ ॥ 24॥
अर्थ: हे भारत (धृतराष्ट्र), गुडाकेश (अर्जुन) के ऐसा कहने पर, हृषिकेश ने उस बेहतरीन रथ को दोनों सेनाओं के बीच स्थापित कर दिया।
विश्लेषण: श्री कृष्ण तुरंत अर्जुन के आदेश का पालन करते हैं। यहाँ अर्जुन को ‘गुडाकेश’ (नींद को जीतने वाला या अज्ञान को जीतने वाला) नाम दिया गया है। जो अब बाद के श्लोकों में एक विरोधाभास पैदा करता है (जहाँ अर्जुन भ्रम के कारण अज्ञानी हो जाता है)।

उपसंहार
Bhagavat Gita श्लोक 13 से 24 का यह हिस्सा न केवल एक बाहरी युद्ध को दिखाता है, बल्कि एक अंदरूनी लड़ाई के लिए एक मज़बूत नींव भी रखता है। पांडवों का दिव्य शंखनाद जीत का शुभ संकेत देता है, लेकिन अर्जुन का रथ बीच में रखने का अनुरोध उसके मन में धर्म और रिश्तों के बीच संघर्ष की शुरुआत है। आगे दिए गए श्लोक अर्जुन के अपने रिश्तेदारों को देखने और उनके मन में आए बड़े दुख (शोक) को दिखाएंगे, जिससे श्री कृष्ण के ज़रिए गीता की शिक्षाएँ सामने आएंगी।