Bhagavat Gita (भागवद गीता) :गीता के दूसरे अध्याय के श्लोक 61 से 72 तक का गहन विश्लेषण

यह सेक्शन गीता के दूसरे अध्याय को खत्म करता है और स्थितप्रज्ञता के गहरे राज़ बताता है।

पतन की श्रृंखला और शांति का परम सुख: गीता के दूसरे अध्याय के श्लोक 61 से 72 का गहन विश्लेषण

Bhagavat Gita के दूसरे अध्याय ‘सांख्य योग’ में आत्मा के ज्ञान और निष्काम कर्म योग के तरीके के बारे में डिटेल में बताया गया है। श्लोक 55 से 60 में स्थितप्रज्ञ की खासियतें बताने के बाद, इस आखिरी हिस्से (श्लोक 61 से 72) में श्री कृष्ण बताते हैं कि अगर इंद्रियों पर कंट्रोल न हो, तो इंसान कैसे गिरता है, और स्थिर मन वाला इंसान ब्रह्म (हमेशा की शांति) की कौन सी स्थिति पाता है?

1.पतन की शृंखला और उसका उपचार (श्लोक 61-63)

Bhagavat Gita श्री कृष्ण बताते हैं कि कैसे इंसान चीज़ों में आसक्त होकर धीरे-धीरे आध्यात्मिक रास्ते से भटक जाता है। वह भटक जाती है, और इसका इलाज क्या है।

श्लोक 61:

तानि सर्वाणि संयम युक्त आसित मत्परः। वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठा ॥ 61

अर्थ: सभी इंद्रियों को कंट्रोल करके मुझमें (भगवान में) लगकर बैठना चाहिए। क्योंकि जिसकी इंद्रियां कंट्रोल में हैं, उसकी बुद्धि स्थिर रहती है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita श्लोक 58 में कछुए का उदाहरण दिया गया था, अब उसका इलाज बताता है। इंद्रियों को कंट्रोल करने के लिए दो चीजें ज़रूरी हैं: संयम और ‘मत्परः’ (भगवान में लगना)। सिर्फ़ संयम काफ़ी नहीं है, लगाव भगवान की ओर होना चाहिए।

श्लोक 62:

ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेशूपजायते। संगत्संजायते कामः कामातक्रोधोभिजायते ॥62

अर्थ: जो इंसान चीज़ों के बारे में सोचता है, उसे उनसे लगाव हो जाता है। लगाव से वासना (इच्छा) पैदा होती है, और वासना से गुस्सा पैदा होता है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह आध्यात्मिक गिरावट की एक मशहूर कड़ी है, जो मन की कमज़ोरी दिखाती है।

विषय के बारे में सोचना → लगाव (संग)

लगाव → काम (अधूरी इच्छा)

काम → अंध (इच्छा में रुकावट)

श्लोक 63:

क्रोधाद्भवति सम्मोहनः समोहत्समृतिविभ्रमः। स्मृति भ्रमाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशत्प्रणश्यति ॥63

अर्थ: क्रोध से भ्रम (मूर्खता, विवेक का नुकसान) होता है। हिप्नोटिज्म से याददाश्त खत्म हो जाती है। याददाश्त के नुकसान से बुद्धि का नाश होता है, और बुद्धि के नुकसान से इंसान का पूरा विनाश होता है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह पतन की चेन का दूसरा हिस्सा है, जो विनाश की ओर ले जाता है।

क्रोध → मोह (विवेक का नाश)

मोह → भूलने की बीमारी

भूलने की बीमारी → बुधिनाश (निर्णय शक्ति का नाश)

बुद्धिनाश → वृष (प्रणश्याती) ये श्लोक अर्जुन के दुख को दिखाते हैं। सपोर्ट करता है, क्योंकि उसका दुख भी यह ऑर्डर रिजेक्ट होने वाला था।

2.सुख और शांति की प्राप्ति (श्लोक 64-68)

अब श्री कृष्ण पतन का रास्ता छोड़कर शांति पाने के तरीके बताते हैं।

श्लोक 64:

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयनिद्रियैश्चरं। आत्मवाश्यायर्विधेयत्मा प्रसादमाधिगच्छति ॥ 64॥

अर्थ: साथ ही, नियंत्रित मन वाला मनुष्य, राग-द्वेष से मुक्त होकर इंद्रियों के द्वारा विषयों में भटकता रहता है। इसके बावजूद, उसे सुख (शांति) मिलता है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यही कर्मयोगी की खासियत है। वह संन्यासी की तरह वस्तुओं को नहीं छोड़ता, लेकिन वस्तुओं में रहते हुए भी, उसके मन में उनके प्रति राग और द्वेष रहता है। नहीं। इस बीच के रास्ते से उसे अंदरूनी सुख (मन की शांति) मिलता है।

श्लोक 65:

प्रसाद सभी दुखों का नाश करने वाला है। प्रसन्नचेतसो हयासु बुद्धिः पर्यायवातिष्टते ॥ 65

अर्थ: सुख (शांति) पाकर उसके सभी दुख नष्ट हो जाते हैं। प्रसन्न मन वाले व्यक्ति की बुद्धि तुरंत स्थिर हो जाती है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita सुख ज्ञान और शांति के बीच की कड़ी है। शांत मन से ही बुद्धि ईश्वर में स्थिर हो सकती है।

श्लोक 66:

नास्ति बुद्धियुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना। न चाभावयतः शांतिरशनंतस्य कुतः सुखम्। 66

अर्थ: योग के बिना इंसान में पक्की बुद्धि नहीं होती, और योग के बिना इंसान में भावना (वफ़ादारी) भी नहीं होती। भावनाओं के बिना शांति नहीं है, और शांति के बिना हमें खुशी कैसे मिल सकती है?

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक मन और शांति के बीच के कनेक्शन पर ज़ोर देता है। योग (समता) के बिना बुद्धि स्थिर नहीं हो सकती, स्थिरता के बिना सच्ची भावना (आत्मविश्वास) नहीं आ सकती, और भावना के बिना शांति नहीं है।

श्लोक 67:

इन्द्रियाणां हि चरताणां यन्मानोऽनुविधीयते। तदस्य हरति प्रज्ञानं वायुर्णवमिवम्भसि ॥67

अर्थ: क्योंकि, विषयों में भटकती हुई इंद्रियों के बीच मन जिसके पीछे भागता है, उसे (मन को) उस व्यक्ति की बुद्धि को हराना चाहिए। यह वैसे ही है जैसे हवा पानी में नाव को हिलाती है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह बेकाबू मन की शक्ति का एक बड़ा उदाहरण है। अगर मन खुद को इंद्रियों के कंट्रोल में आने दे, तो यह स्थिर बुद्धि को भी खत्म कर देता है। यह अर्जुन के लिए एक बड़ी चेतावनी है।

श्लोक 68:

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वश। इन्द्रियानिन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठा ॥ 68

अर्थ: इसलिए, हे महाबाहु, उस व्यक्ति की इंद्रियाँ सभी प्रकार के इंद्रिय विषयों से संयमित हैं। हाँ, उसकी बुद्धि स्थिर है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक 61 का निष्कर्ष है। इंद्रियों पर नियंत्रण राज्य ज्ञान की एक आवश्यक शर्त है।

3.जागने और सोने की अवस्था (श्लोक 69)

श्री कृष्ण एक ज्ञानी व्यक्ति और एक आम आदमी की नज़रों के बीच का अंतर दिखाते हैं।

श्लोक 69:

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। यस्य जागर्ति भूतानि स निशा पश्यतो मुनेः ॥ 69

अर्थ: जो (ब्रह्मा) सभी जीवों के लिए रात जैसा है, तपस्वी लोग उसी में जागते हैं। और जिसमें सभी जीव जागते हैं (भोग और संसार), वह ज्ञानी ऋषि के लिए रात जैसा है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह दोहरा सच है:

सर्वभूतानां निशा (रात्रि): आम लोगों के लिए ब्रह्मज्ञान और आत्मनिरीक्षण नींद (अज्ञान) जैसा है।

संयामी जागर्ति (जागरूकता): ज्ञानी आदमी ब्रह्म के ज्ञान में जागा हुआ होता है।

भूटानी जागर्ति (जागरूकता): आम लोग भौतिक सुख, दुख, वासना और आसक्ति के बारे में जानते हैं।

मुनेः निशा (रात्रि): ज्ञानी ऋषि के लिए ये भौतिक सुख रात (बेमतलब) जैसे हैं।

4.समुद्र और ब्राह्मी अवस्था की उपमा (श्लोक 70-72)

श्री कृष्ण स्थितप्रज्ञ के व्यवहार का आखिरी उदाहरण देकर चैप्टर खत्म करते हैं।

श्लोक 70:

अपूर्यमानमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशंति यद्वत्। तद्वत्काम या प्रविशंति सर्वे स शांतिमाप्नोति न कामकामि। 70

अर्थ: जैसे नदियों का पानी समुद्र में प्रवेश करता है, जो पानी से भरा हुआ है और जिसकी प्रतिष्ठा अडिग है, फिर भी समुद्र पागल नहीं होता; वैसे ही जिस आदमी में सभी इच्छाएँ प्रवेश करती हैं (लेकिन उसे परेशान नहीं करतीं), वह शांति प्राप्त करता है, या इच्छाओं के पीछे भागता है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह स्थितप्रज्ञ का आखिरी उदाहरण है। समुद्र की तरह, स्थिर बुद्धि वाला आदमी बाहरी चीज़ों (नदियों के पानी) के आने से परेशान नहीं होता। इच्छाओं को छोड़ने के बजाय, वह उनसे प्रभावित होना बंद कर देता है।

श्लोक 71 :

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांचरति निःस्पृहः। निर्दयी और निडरः स शांतिमधिगच्छति। 71

अर्थ: जिस आदमी ने सभी इच्छाओं को छोड़ दिया है, वह निस्वार्थ (इच्छा रहित), आसक्ति और अहंकार से रहित है। जो शांति में घूमता है, उसे शांति मिलती है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita शांति के लिए तीन मुख्य शर्तें:

निःस्पृहा: फल की इच्छा के बिना।

निर्मम: बिना किसी लगाव के ‘यह मेरा है’।

निरहंकार: ‘मैं करता हूँ’ जैसे अहंकार के बिना।

श्लोक 72:

एषा ब्राह्मी अवस्था: पार्थ नैनं प्राप्य विमुह्यति। स्थितवास्यमंतकलेपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥72।

अर्थ: हे पार्थ, यह ब्राह्मी अवस्था (ब्रह्म में स्थित होने की अवस्था) है। इसे पाकर इंसान कभी मोहित नहीं होता। अंत में भी इसी अवस्था में स्थिर रहने से उसे ब्रह्मनिर्वाण (मोक्ष) मिल जाता है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह अध्याय का आखिरी और सबसे ऊंचा श्लोक है।

ब्राह्मी अवस्था: आसक्ति से पूरी तरह मुक्ति, जो आत्म-ज्ञान का आधार है। इस स्थिति में कोई आसक्ति नहीं रहती। अगर जीवन के अंत में भी यह अवस्था मिल जाए, तो ब्रह्मनिर्वाण (मोक्ष, दुख से मुक्ति) मिल जाता है।

निष्कर्ष: सांख्य योग का फल

Bhagavat Gita के दूसरे अध्याय के श्लोक 61 से 72, स्थितिप्रज्ञ, आसक्ति और अज्ञान से मुक्ति का रास्ता साफ़ करते हैं। यह भाग अर्जुन को समझाता है कि असली भलाई बाहरी युद्धों से बचने में नहीं, बल्कि इंद्रियों पर ध्यान लगाने में है। जीत हासिल करने से इंसान को मन की शांति (ब्राह्मी अवस्था) मिलती है, जो मोक्ष की ओर ले जाती है।

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