Bhagavat Gita (भागवद गीता) :गीता के दूसरे अध्याय के श्लोक 25 से 36 तक का गहन विश्लेषण

ज्ञान से कर्म तक: गीता द्वितीया दूसरे अध्याय के श्लोक 25 से 36 का गहन विश्लेषण

Bhagavat Gita के दूसरे चैप्टर में, श्लोक 13 से 24 तक, श्री कृष्ण आत्मा के शाश्वत और अविनाशी स्वभाव के बारे में बात करते हैं। रूप के बारे में विस्तार से बताया। अब श्लोक 25 से 36 के इस ज़रूरी हिस्से में, श्री कृष्ण अपनी शिक्षा को एक नए लेवल पर ले जाते हैं। सांख्य ज्ञान पूरा करने के बाद, वह अर्जुन को उसके क्षत्रिय धर्म (कर्तव्य) की याद दिलाते हैं और युद्ध में न जाने के उसके फैसले के भयानक नतीजों के बारे में बताते हैं।

1.सांख्य ज्ञान का निष्कर्ष (श्लोक 25)

Bhagavat Gita आत्मा की विशेषताओं के बारे में बताते हुए, श्री कृष्ण बताते हैं कि आत्मा इंद्रियों की पहुंच से परे है।

श्लोक:25

अव्यक्तोयम्चिंत्योयमविकार्योयमुच्यते। तस्मादेवं विदित्वायनं नानुशोचितुमरहसि ॥25

अर्थ: यह आत्मा अव्यक्त (अप्रगत), अचिंत्य (मनठी न छिदेश भीत तेवो) और अविकार्य (विकाररहित) है। इसलिए, इस आत्मा को ऐसा जानकर शोक करना उचित नहीं है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita अर्जुन का दुख उसके भौतिकवादी दृष्टिकोण से उत्पन्न होता है। श्री कृष्ण कहते हैं कि आत्मा को भौतिक इंद्रियों और मन से नहीं समझा जा सकता। यदि आत्मा को अव्यक्त और भावहीन माना जाए, तो उसके जन्म और मृत्यु का शोक करना व्यर्थ है।

2.अगर आत्मा भी मर रही हो तो भी शोक मत करो (श्लोक 26-28)

Bhagavat Gita श्री कृष्ण, अर्जुन को ज्ञान की बात समझाने के बाद, एक पल के लिए अज्ञानता के लेवल पर आ गए और समझाया। शोक करना बेकार है।

श्लोक:26

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्। तथापि, त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥26

अर्थ: हे महान आत्मा (अर्जुन), यदि तुम इस आत्मा को हमेशा जन्म लेने वाली और हमेशा मरने वाली मानते हो, तो भी तुम इस प्रकार शोक करोगे। ऐसा करना उचित नहीं है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह एक तार्किक तर्क है। यदि अर्जुन सांख्य ज्ञान को स्वीकार नहीं कर सकता और आत्मा भौतिक शरीर की तरह जन्म लेती और मरती है, तो भले ही हम हस्तरेखा शास्त्र को मानें, जन्म और मृत्यु दुनिया के अलग-अलग नियम हैं।

श्लोक:27

जात्स्य हि ध्रुवो मृत्युध्रुवं जन्म मृतस्य च। तस्माद्परिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥27

अर्थ: जो जन्म लेते हैं, उनकी मृत्यु निश्चित है और जो मरते हैं, उनका जन्म निश्चित है। इसलिए, जो अवश्यंभावी है, उसके लिए शोक नहीं करना चाहिए।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह दुनिया का एक सार्वभौमिक नियम है। जो जन्म लेता है, उसकी मृत्यु निश्चित है। जिसका जन्म और मृत्यु निश्चित है, उसके लिए शोक करना समय की बर्बादी है। आध्यात्मिक ज्ञान न होने पर भी, यह नियम लोक व्यवहार के दृष्टिकोण से शोक को निरर्थक साबित करता है।

श्लोक 28:

अव्यक्तदिनी भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत। परिदेवना अव्यक्तनिध्नन्येव तत्र ॥ 28

अर्थ: हे भारत, ये सभी भूत जन्म से पहले अप्रगत थे, और मृत्यु के बाद भी अप्रकट हो गए। जाना ही है; यह बीच में ही व्यक्त होता है। फिर उसके लिए शोक क्यों?

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक तीन समय का दृष्टिकोण देता है। जैसे कोई चीज़ अप्रकट से आती है, कुछ समय तक रहती है और फिर अप्रकट में विलीन हो जाती है। मनुष्य जीवन भी केवल एक बीच का चरण है। इस सत्य को जानने के बाद शोक करना केवल अज्ञानता है।

3.ज्ञान की दुर्लभता और क्षत्रिय धर्म का महत्व (श्लोक 29-32)

Bhagavat Gita सांख्य ज्ञान पूरा करने के बाद अब श्री कृष्ण अर्जुन के क्षत्रिय धर्म पर ज़ोर देते हैं, जो उसका तत्काल कर्तव्य है।

श्लोक:29

अन्ज्ञर्वत्प्ष्यति कश्चिदेनमाच्यावद्विदति ताथिव चान्यः. अशन्द्रवच्छाणमन्यः श्रिनोति श्रुत्वाप्येनम् वेद न चैव कश्चित ॥29

अर्थ: कोई इस आत्मा को अजूबा समझता है, कोई इसे अजूबा बताता है, और कोई हैरानी से सुनता है। लेकिन इसके बारे में सुनने के बाद भी कोई उसे ठीक से नहीं जानता।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक आत्म-ज्ञान की दुर्लभता को दिखाता है। आत्म-ज्ञान अद्भुत है, लेकिन यह सामान्य ज्ञान की पहुँच से बाहर है।

श्लोक 30:

देहि नित्यमवध्योयां देहे सर्वस्य भारत। तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ 30

अर्थ: हे भारत, यह आत्मा सबके शरीर में हमेशा अमर (मार नहीं सकती) है। इसलिए किसी भी जानवर के लिए शोक करना उचित नहीं है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह फिर से सांख्य योग का सारांश है। किसी भी जानवर को नहीं मारा जा सकता क्योंकि आत्मा अमर है।

श्लोक 31:

स्वधर्ममपि चवेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। धर्म्याधि युद्धच्छ्रेयो॥न्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥31

अर्थ: और अपने धर्म (क्षत्रिय धर्म) को ध्यान में रखते हुए भी, तुम काम्पारी भोगने के लायक नहीं हो। क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुद्ध से ज़्यादा फ़ायदेमंद कुछ नहीं है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita श्री कृष्ण अब अर्जुन के पतन को धर्मत्याग कहते हैं। क्षत्रिय के तौर पर अर्जुन का कर्तव्य धर्म के लिए लड़ना है। यह युद्ध धर्म का है, इसलिए यह क्षत्रिय के लिए सबसे बड़ा कल्याण है।

श्लोक :32

यदृचया चोप्पन्नं स्वर्गद्वारम्पवृतं सुखिनः क्षत्रियः पार्थ लभन्ते युद्धमिदृशम् ॥32

अर्थ: हे पार्थ, स्व-अर्जित, स्वर्ग के खुले दरवाज़ों की तरह, ऐसा युद्ध सौभाग्यशाली है। यह केवल क्षत्रियों को ही मिलता है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह एक उत्साहवर्धक तर्क है। श्री कृष्ण बताते हैं कि धर्म के लिए युद्ध क्षत्रिय के लिए एक भौतिक वरदान है। अगर अर्जुन लड़ता है, तो उसे जीत पर सांसारिक सुख और मृत्यु पर स्वर्गीय सुख मिलेगा।

4.लड़ाई न करने के नुकसान (आयत 33-36)

Bhagavat Gita आखिर में, श्री कृष्ण अर्जुन को युद्ध न करने के उसके फैसले के भयानक नतीजों के बारे में चेतावनी देते हैं।

श्लोक :33

अथ चेत्त्वमिम धर्म्यं संग्रामं न करिष्यासि। ततः स्वधर्म कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥ 33

अर्थ: लेकिन अगर तुम यह धर्म युद्ध नहीं लड़ोगे, तो तुम अपना धर्म और नाम छोड़ दोगे। मुझे सिर्फ़ पाप मिलेगा।

विश्लेषण: Bhagavat Gita युद्ध न करने के दो नुकसान:

अपने धर्म का त्याग: क्षत्रिय धर्म का त्याग।

पाप की प्राप्ति: धर्म का पालन न करने से पाप लगता है।

श्लोक 34:

अकीर्तिं चापि भूतानि कथ्यिष्यन्ति तेयव्यं। संभतस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥ 34

अर्थ: लोग कहेंगे कि तुम कभी खत्म नहीं होगे; और एक सम्मानित व्यक्ति के लिए, अपमान मौत से भी बदतर है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह सामाजिक अपमान की चेतावनी है। अर्जुन जैसे सम्मानित नायक के लिए, युद्ध से भागना मौत से भी ज़्यादा दर्दनाक है।

श्लोक 35 :

भयद्रनादुपरतां मनस्यन्ते त्वान महारथा। येशां च त्वं माजित्तो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥ 35

अर्थ: जो महापुरुष तुम्हारा आदर करते थे, वे तुम्हें डर के मारे युद्ध से हट गया समझेंगे, और तुम उनकी आँखों में रोशनी बन जाओगे।

विश्लेषण: Bhagavat Gita अर्जुन की इज़्ज़त धूल में मिल जाएगी। वह गुरुओं, भीष्म और दूसरे महान ऋषियों की नज़र में कमज़ोर साबित होगा।

श्लोक :36

अवच्यवादांश्च बहुं वदिशयन्ति तवाहिताः। निन्दन्तस्त्व सामात्तं ततो दुखतारं नु किम ॥36

अर्थ: आपके दुश्मन आपकी बुराई करके और आपकी काबिलियत को कम आंककर आपके साथ बहुत कुछ करेंगे। कहने का मतलब है) कड़वे शब्द बोलेंगे। इससे ज़्यादा दर्दनाक और क्या हो सकता है?

विश्लेषण: Bhagavat Gita क्षत्रिय के लिए बेइज्जती सबसे बड़ी सज़ा है। अपना धर्म छोड़ने पर बेइज्जती और कड़वे शब्दों का दर्द, युद्ध में अपनों को मारने का दर्द, इससे भी ज़्यादा गंभीर है।

निष्कर्ष: ज्ञान और कार्य का समन्वय

Bhagavat Gita श्लोक 25 से 36 का यह हिस्सा दिखाता है कि श्री कृष्ण ने अर्जुन को दो मुख्य निर्देश दिए: आधार बताता है:

तत्त्वज्ञान (सांख्य): आत्मा अमर है, इसलिए शोक करना बेकार है।

प्रैक्टिकल धर्म (क्षत्रिय धर्म): युद्ध न करने से धर्म का नाश होता है, अपमान और पाप होता है, जिससे मृत्यु होती है। यह इससे भी बुरा है।

Bhagavat Gita इस तरह, श्री कृष्ण अर्जुन को मेटाफिजिकल ज्ञान देकर सिर्फ निष्क्रिय नहीं बनाते, बल्कि उसे उसके कर्तव्य की ओर भी निर्देशित करते हैं। बाल रखो। अगले श्लोकों में, श्री कृष्ण कर्म योग के सिद्धांत बताएंगे।

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