Bhagavat Gita (भागवद गीता) :गीता के दूसरे अध्याय के श्लोक 1 से 12 तक का गहन विश्लेषण

अज्ञान पर पहला प्रहार: गीता के दूसरे अध्याय के श्लोक 1 से 12 का गहन विश्लेषण

Bhagavat Gita का दूसरा अध्याय, ‘सांख्य योग’, गीता का दिल और पूरी शिक्षा का आधार है। पहले चैप्टर (अर्जुनविषाद योग) में अर्जुन, मोह और दुख से परेशान होकर, युद्ध के मैदान में हथियार चलाता है। त्यागी देता है। श्लोक 1 से 12 का यह हिस्सा अर्जुन के पतन की स्थिति पर श्री कृष्ण की पहली प्रतिक्रिया है। यह एक शिष्य के रूप में समर्पण और दार्शनिक ज्ञान की शुरुआत को दिखाता है।

1.अर्जुन का दुःख और श्री कृष्ण की मुस्कान (श्लोक 1-3)

Bhagavat Gita पहले अध्याय के आखिर में अर्जुन दुखी होकर रथ पर बैठ जाते हैं। अब संजय उनकी हालत और श्री कृष्ण की प्रतिक्रिया बताते हैं।

श्लोक 1:

संजय उवाच तन ऐं प्लीज़ विष्टमश्रुपूर्णकुलेक्षणम्। विशिष्टान्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥ 1

अर्थ: संजय ने कहा: दुख से व्याकुल, करुणा से भरे और आंसुओं से भरी आँखों वाले अर्जुन से। मधुसूदन (श्री कृष्ण) ने ये शब्द कहे।

श्लोक 2:

Bhagavat Gita श्री भगवान बोलते हैं कूटस्त्व कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्। अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकर्मार्जुन ॥ 2

अर्थ:श्री भगवान ने कहा: हे अर्जुन, इस अजीब (अयोग्य) समय पर तुम्हारे अंदर यह कलंक (आसक्ति) कहाँ से आ गया? अर्जुन, ये (आसक्ति) अच्छे से अच्छे आदमी को भी शोभा नहीं देती, ये स्वर्ग नहीं ले जाती और बेइज्जती लाती हैं।

विश्लेषण: Bhagavat Gita श्री कृष्ण, जिन्हें यहाँ ‘मधुसूदन’ (मधु नाम के राक्षस का नाश करने वाला) कहा गया है, जो अर्जुन के मन में ‘अज्ञान के राक्षस’ को खत्म करने के लिए तैयार हैं। श्री कृष्ण अर्जुन को उसके प्यार के लिए पीटते हैं। वह अर्जुन की हालत के लिए तीन तरह से दोष देते हैं:

अनार्यजुष्टम्: यह व्यवहार इंसानों के लिए सबसे सही है। सही नहीं है।

अस्वर्ग्यम्: इससे स्वर्ग नहीं मिलता (युद्ध क्षत्रिय के लिए स्वर्ग का रास्ता है)।

अकीर्तिकरम्: इससे सिर्फ़ बदनामी होती है।

श्लोक 3:

कलब्ब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वयुपद्याते। छोटे दिल की कमजोरी त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप॥ 3

अर्थ: हे पार्थ, तुमने नपुंसकता को प्राप्त नहीं किया, यह तुम्हें शोभा नहीं देता। दिल की इस छोटी सी कमजोरी को छोड़ो और खड़े हो जाओ, हे परंतप (दुश्मनों को पीड़ा देने वाले)!

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक युद्ध के मैदान में श्री कृष्ण का पहला आदेश है। श्री कृष्ण ने अर्जुन को ‘पार्थ’ (पृथा-कुंती का पुत्र) और ‘परंतप’ (दुश्मनों को पीड़ा देने वाला) कहकर संबोधित किया। हमें बहादुरी और महान विरासत की याद दिलाता है। वह अर्जुन के दुख को ‘खुद्रं हृदयदौर्बल्यं’ (दिल की गुदा की कमजोरी) के रूप में बताते हैं, जिससे पता चलता है कि अर्जुन का दुख केवल आसक्ति पर आधारित है, सत्य पर नहीं।

2.अर्जुन का द्वंद्व और युद्ध न करने के लिए समर्पण (श्लोक 4-8)

Bhagavat Gita श्री कृष्ण के कठोर वचन सुनकर, अर्जुन अब अपना अंतिम तर्क प्रस्तुत करता है।

श्लोक 4:

अर्जुन उवाच कथं भीष्महम् सांख्ये द्रोणां च मधुसूदन। इशुभिः प्रतियोत्स्यामी पूजारहावरिसूदन ॥ 4

अर्थ: अर्जुन ने कहा: हे मधुसूदन, मैं युद्ध में पूजनीय भीष्म और द्रोण को कैसे मार सकता हूँ? हे अरिसूदन (दुश्मनों को मारने वाले) जो बाणों से मारते हैं?

विश्लेषण: Bhagavat Gita अर्जुन यहाँ अपने मोह को तर्क के साथ जोड़ता है। वह कहता है कि वह भीष्म और द्रोण जैसे पूजनीय गुरुओं को नहीं मार पाएगा। यह उसका अंतिम संघर्ष है: ‘सम्माननीय’ को मारना क्षत्रिय धर्म के विरुद्ध है।

श्लोक 5:

गुरुहत्व हि महानुभावं श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपिह लोके। हतार्थकामंस्तु गुरुनिहैव भुंजिया भोगना रुधिरप्रदिग्धान ॥ 5

अर्थ: इस दुनिया में महान गुरुओं को मारने से ज़्यादा भिक्षा मांगकर ज़िंदा रहना फ़ायदेमंद है। क्योंकि अगर मैंने अपने गुरुओं को मार दिया, तो मुझे धन और वासना के खून का नतीजा भुगतना पड़ेगा।

विश्लेषण: Bhagavat Gita अर्जुन की तपस्या और भिक्षा देने की भावना को क्षत्रिय के कर्तव्य (युद्ध) से ज़्यादा सराहा गया है। यहाँ ‘भायक्ष्यमपीह लोके’ शब्द उसके दिल की कमज़ोरी की हद हैं।

श्लोक 6:

न चैताद्विदमः कतरनो गरिओ यद्वा जायेम इफि वा नो जयेयुः। यानेव हत्वा न जीजीविशामः तेवस्थिताः मौहमे धार्तराष्ट्राः॥ 6

अर्थ: हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए सबसे अच्छा क्या है – चाहे हम उन्हें जीतें या वे हमें जीतें। हम धृतराष्ट्र के इन बेटों को मारना भी नहीं चाहते, फिर भी वे हमारे सामने खड़े हैं।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक अर्जुन की धर्मसंकट की स्थिति दिखाता है। उसे जीत और हार दोनों में दुख मिलता है, क्योंकि आखिर में उसे अपने ही लोगों को मारना पड़ता है।

श्लोक 7:

कार्पण्यदोषोपहत्स्वभावः परछामि त्वां धर्मसम्मुधचेतः । यच्छ्रेयाह स्यानिष्चितं ब्रूही तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधी मा त्वान प्रपन्नम् ॥ 7

अर्थ: कंजूसी के दोष के कारण मेरा स्वभाव दबा हुआ है, और मेरा मन धर्म के विषय में भ्रमित है। जो भी निश्चित रूप से मेरे लिए लाभदायक हो, वह मुझे बताइए। मैं आपका शिष्य हूँ, मैंने आपकी शरण ली है, मुझे उपदेश दीजिए।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक गीता का मुख्य आधार है। यहाँ अर्जुन आधिकारिक रूप से श्री कृष्ण को अपना गुरु और मार्गदर्शक स्वीकार करता है। वह अपने दुख को ‘कार्पण्य दोष’ (कमजोरी का दोष) मानता है, और धर्म की दुविधा से बाहर आने के लिए श्री कृष्ण से निश्चित निर्देश देने का अनुरोध करता है। ‘शिष्यस्तेऽहं शाधी में त्वां प्रपन्नम्’ शब्द पूर्ण समर्पण का संकेत देते हैं।

श्लोक 8:

न प्रपश्यामि ममापानुद्यद् यच्चोकामुच्चोषणमिन्द्रियाणाम्। अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यां सुराणाम्पी चादिपत्यम् ॥ 8

अर्थ: मुझे अपनी इंद्रियों को सुखाने वाले दुख को दूर करने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा है, भले ही मुझे धरती पर दुश्मनों के बिना एक खुशहाल राज्य मिल जाए या स्वर्ग में देवताओं का दबदबा भी मिल जाए।

विश्लेषण: Bhagavat Gita अर्जुन यह साफ करता है कि उसका दुख इतना गहरा है कि भौतिक शक्ति और सुख का वैभव उसे दूर नहीं कर सकता। ऐसा नहीं कर सकता। इससे पता चलता है कि उसका दुख आध्यात्मिक या मेटाफिजिकल लेवल का है, जिसे सिर्फ ब्रह्मज्ञान से ही ठीक किया जा सकता है।

3.ज्ञान की शुरुआत: आत्मा की अमरता (श्लोक 9-12)

Bhagavat Gita संजय ने अर्जुन के सरेंडर के बाद उसकी चुप रहने की हालत का ज़िक्र किया है, और फिर श्री कृष्ण ने अपने उपदेश का ज़िक्र किया है। चलिए शुरू करते हैं।

श्लोक 9:

संजय उवाच एवमुक्त्वा हृषिकेश गुडाकेश परंतपः। न योत्स्य इति गोविंदमुक्त्वा तुष्णि बभूवा हा। 9

अर्थ: संजय ने कहा: हृषिकेश (श्री कृष्ण), गुडाकेश (अर्जुन) से यह कहो, दुश्मनों को शांति दो। बनाने वाले यह कहकर चुप हो गए, “हे गोविंद, मैं नहीं लड़ूंगा।”

विश्लेषण: Bhagavat Gita अर्जुन का चुप रहना उसकी मानसिक हालत में स्थिरता की कमी दिखाता है।

श्लोक 10:

तमुवाच हृषिकेश: प्रहसन्निव भारत। सेन्योर्हयोर्महय विशिदंतमिदं वच ॥ 10

अर्थ: हे भारत (धृतराष्ट्र), हृषिकेश (श्रीकृष्णे) ने दोनों सेनाओं के बीच विलाप कर रहे अर्जुन से। हंसते हुए ये शब्द कहे।

विश्लेषण: Bhagavat Gita श्री कृष्ण का ‘प्रहसन्निव’ (जैसे हंसना) कहना यह बताता है कि वे अर्जुन के कन्फ्यूजन का जवाब दे रहे हैं। इसे एक पल के और लुभाने वाले भ्रम के तौर पर देखें, गंभीर समस्या के तौर पर नहीं। गीता के ज्ञान का प्रवाह यहीं से शुरू होता है।

श्लोक 11:

श्री भगवान अशोच्यान्वशोचस्त्वं प्रज्ञावदंश्च की भाषा में बोलते हैं। गतासूंगतासूंश्च नानुशोचन्ति पंडिता: ॥ 11

अर्थ: श्री भगवान ने कहा: तुम अयोग्य (जिनके लिए शोक नहीं करना चाहिए) लोगों के लिए शोक करते हो और वे ज्ञानी लोगों के बारे में भी बात करते हैं। जो विद्वान हैं वे जीवित या मृत किसी के लिए शोक नहीं करते।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक श्री कृष्ण का पहला ज्ञानात्मक उपदेश है। श्री कृष्ण अर्जुन के दुःख की नींव को उखाड़ फेंकते हैं। एक तरफ अर्जुन ज्ञानी की तरह धर्म की बात करता है, लेकिन दूसरी तरफ मोह के कारण शोक करता है। श्री कृष्ण कहते हैं कि एक सच्चा ज्ञानी (पंडित) किसी भी शरीर (जीवित या मृत) के लिए शोक नहीं करता, क्योंकि वह आत्मा के अमर रूप को जानता है।

श्लोक 12:

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपः। न चैव न भविष्यम्: सर्वे वयं: परम्। 12

अर्थ: ऐसा नहीं है कि मैं किसी समय नहीं था, कि तुम नहीं थे, कि ये राजा नहीं थे; और ऐसा नहीं है कि हम सब इस बाद के समय में नहीं होंगे।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक आत्मा की अमरता और अनंतता की नींव रखता है। श्री कृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि जैसे आत्मा वर्तमान में है, वैसे ही वह अतीत में भी थी और भविष्य में भी रहेगी। आत्मा कभी नष्ट नहीं होती; केवल शरीर बदलता है। आत्मा की शाश्वतता की यह शिक्षा अर्जुन के दुःख को दूर करने का पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम है। છે.

उपसंहार : सांख्य योग की शुरुआत

Bhagavat Gita ના દ્વિતીય અધ્યાયના આ પ્રથમ ૧૨ શ્લોકો અર્જુનના અધ્યાત્મિક ઉત્થાનનો માર્ગ દર્શાવે છે. અર્જુનનું શસ્ત્રો ત્યાગવું અને શિષ્ય બનવું એ દર્શાવે છે કે જ્ઞાનની પ્રાપ્તિ માટે સૌપ્રથમ શરણાગતિ અને મોહનો ત્યાગ જરૂરી છે. શ્રીકૃષ્ણના આ પ્રારંભિક શબ્દો, જે આત્માની અમરતા પર કેન્દ્રિત છે, તે અર્જુનને તેના દેહ આધારિત મોહમાંથી મુક્ત કરીને, જીવનના અંતિમ સત્ય (સાંખ્ય યોગ) તરફ દોરી જાય છે.

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