Bhagavat Gita अठारहवाँ अध्याय (मोक्ष संन्यास योग) – श्लोक 71 से 78: गीता का निष्कर्ष, फल और विजयी घोषणा
अठारहवें अध्याय के पहले हिस्सों (श्लोक 61 से 70) में भगवान कृष्ण ने ज्ञान, कर्म और भक्ति को मिलाकर ‘सर्वधर्म परित्यज्य’ का महामंत्र दिया। श्लोक 71 से 78 में भगवान और संजय इस बातचीत को सुनने, समझने और मानने के महत्व को बताते हुए गीता का अंत करते हैं। ये श्लोक बताते हैं कि ज्ञान से शक कैसे दूर होता है और आखिर में जीत का क्या पक्का नतीजा मिलता है।
गीता के हर सुनने वाले के लिए ये श्लोक बहुत ज़रूरी हैं, क्योंकि ये शिक्षा का मकसद और उसका फल साफ़ करते हैं।

भाग 1: गीता सुनना और उसके लाभ (श्लोक 71, 72)
Bhagavat Gita अब भगवान दो तरह के सुनने वालों का वर्णन करके गीता सुनने का फल बताते हैं।
1.1. श्लोक 71 का डिटेल्ड एनालिसिस: श्रद्धा से सुनने का फल
श्रद्धवाननसूयादपि यो नरः ।सोईपि मुक्तः शुभांलोकान्प्रपुयात्पुण्यकर्णाम् ॥71॥
अर्थ : जो व्यक्ति श्रद्धावान है और कोई दोष नहीं देखता (अनसूयाद अपि), वह भी (सभी पापों से) मुक्त हो जाएगा और पवित्र कर्म करने वालों के शुभ लोक (शांति और कल्याण) को प्राप्त करेगा।
विस्तृत विश्लेषण:
- श्रद्धवान अनसूयाद्द: यह श्लोक गीता सुनने के लिए दो मुख्य ज़रूरतें बताता है:
- श्रद्धवान: ज्ञान और ज्ञान देने वाले (कृष्ण) में विश्वास रखना।
- अनसूयु: (गलती न निकालना): परमेश्वर के वचनों में गलती या संदेह न निकालना।
- श्रुणियाद् अपि (सिर्फ़ सुनेगा): जो इंसान पढ़ाई या प्रवचन नहीं कर सकता, लेकिन सिर्फ़ श्रद्धा से इस प्रवचन को सुनता है, वह भी पापों से मुक्त हो जाता है।
- मुक्ता: शुभान लोकान: यहाँ ‘मुक्त’ का मतलब है आध्यात्मिक बंधन से आज़ादी। वह पुण्यात्माओं का लोक (स्वर्ग या शांति) पाता है। यह श्लोक गीता को ‘सुनने’ के महत्व को दिखाता है।
1.2. श्लोक 72 का डिटेल्ड एनालिसिस: अर्जुन का आखिरी सवाल
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयाग्रेण चेतसा ।कच्चिदज्ञानसमोहः प्रणष्टे धनंजय ॥72॥
अर्थ : Bhagavat Gita हे पार्थ, क्या तुमने इसे एक मन (एकाग्रन चेतसा) से सुना है? हे धनंजय, क्या अज्ञान से पैदा हुआ तुम्हारा भ्रम (अज्ञानसम्मोहः) खत्म हो गया है?
विस्तृत विश्लेषण:
- कच्चिद् एतत श्रुतम्: प्रवचन खत्म करने से पहले, भगवान अर्जुन से पूछते हैं कि उसका मकसद पूरा हुआ है या नहीं।
- एकाग्रन चेतसा: गीता का ज्ञान पाने के लिए मन का एकाग्र होना ज़रूरी है।
- अज्ञानसमोहा: अर्जुन का असली भ्रम (शक) अज्ञान पर आधारित था – ‘मैं अपना हूँ’ (कर्तापन का एहसास), ‘मुझे लड़ना नहीं चाहिए’ (सही और गलत का शक)।
- शक दूर करना: अगर अर्जुन ने विश्वास के साथ सुना होता, तो उसका अज्ञान का भ्रम खत्म हो जाना चाहिए था।

भाग 2: अर्जुन का संदेह निवारण (श्लोक 73)
Bhagavat Gita भगवान के सवाल के जवाब में, अर्जुन अपने मन की हालत बताते हैं। यह श्लोक गीता डायलॉग का आखिरी नतीजा है।
2.1. श्लोक 73 का डिटेल्ड एनालिसिस: स्थिरता की प्राप्ति
अर्जुन उवाच
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाऽच्युत ।स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥73॥
अर्थ : Bhagavat Gita अर्जुन ने कहा: हे अच्युत, आपकी कृपा से मेरा भ्रम टूट गया है और मुझे अपनी याद (असली रूप का ज्ञान) मिल गई है। मैं शक से मुक्त (गतसन्देह) हो गया हूँ और स्थिर (स्थितोअस्मि) हो गया हूँ। अब मैं आपके वादे का पालन करूँगा।
विस्तृत विश्लेषण:
- नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा: अर्जुन अब समझ गया है कि वह शरीर नहीं, बल्कि आत्मा है, और उसका कर्तव्य क्या है।
- मोह नष्ट: अहंकार और आसक्ति खत्म हो जाती है।
- स्मृति लब्धा (रूप का ज्ञान): खुद का ज्ञान मिल जाता है।
- त्वत्प्रसादात (आपकी कृपा से): अर्जुन यह मानता है कि यह ज्ञान इंसानी कोशिश से नहीं, बल्कि भगवान की कृपा से मिला है।
- स्थितोस्मि गतसन्देहा: अर्जुन स्थितप्रज्ञ की स्थिति में आ जाता है और उसके सारे शक दूर हो जाते हैं।
- करिष्ये वचनं तव (मैं आपकी बात रखूँगा): यह सरेंडर की आखिरी मंज़ूरी है। अर्जुन अब ‘आप जैसा कहते हैं वैसा करता हूँ’ की जगह ‘मैं करता हूँ’ वाली स्थिति में आ गया है, जो सच्चे कर्म योग की निशानी है।

खंड 3: संजय की गीता महिमा और फलदायी श्रुति (श्लोक 74, 75, 76, 77)
Bhagavat Gita संजय, जिसने व्यासजी की कृपा से दिव्य दृष्टि से यह संवाद सुना था, अब धृतराष्ट्र को इस संवाद का महत्व समझाता है।
3.1. श्लोक 74 और 75 का विस्तृत विश्लेषण: संजय का बोध
संजय उवाच।
इत्याहम वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः।संवादमीममश्रौषमद्भूत रोमहर्षणम् ॥74॥
व्यासप्रसादच्रुतावनेत्द्गुह्यमः परम।योगं योगेश्वरत्कृष्णत्साक्षात्कथायत् स्वयं ॥75॥
अर्थ : Bhagavat Gita संजय ने कहा: इस तरह मैंने वासुदेव (श्री कृष्ण) और महात्मा पार्थ (अर्जुन) के बीच यह अद्भुत और रोमांचक बातचीत सुनी। व्यासजी की कृपा से, मैंने यह परम गुप्त योग (गुह्यम योगम) सीधे योगेश्वर कृष्ण से सुना, जो वे खुद कह रहे थे।
विस्तृत विश्लेषण:
- अद्भुत रोमहर्षणम: गीता का ज्ञान अद्भुत है, और संजय इसका अपना अनुभव बताते हैं।
- व्यासप्रसादात (व्यासजी की कृपा से): संजय मानते हैं कि यह दिव्य श्रवण (दिव्य दृष्टि) उन्हें व्यासजी के आशीर्वाद से ही मिला है।
- गुह्यम योगम योगेश्वरात्: संजय गीता को ‘गुह्यम योगम’ कहते हैं, जिसे योगेश्वर कृष्ण खुद कह रहे थे। यह योग कर्म, ज्ञान और भक्ति का मेल है।
3.2. श्लोक 76 और 77 का विस्तृत विश्लेषण: स्मरण का फल
राजनसंस्मृत्यसंस्मृत्यसंवादमीमाद्भूतम्। केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहूर्तुः ॥76॥
तच्च संस्मृत्यसंस्मृत्यरूपमात्यद्भूत हरेः विष्मयो मे महाराजा हृष्यामि च पुनःः पुनः ॥77॥
अर्थ : Bhagavat Gita हे राजा (धृतराष्ट्र), केशव और अर्जुन की इस पवित्र और अद्भुत बातचीत को बार-बार याद करके (समस्मृत्य संस्मृत्य) मैं बार-बार खुश (ऋष्यामि) हो रहा हूँ। और श्री हरि के उस सबसे अद्भुत रूप (विश्वरूप दर्शन) को बार-बार याद करके, हे राजा, मैं बहुत हैरान (विस्मयाः) हो रहा हूँ और बार-बार खुश हो रहा हूँ।
विस्तृत विश्लेषण:
- समस्मृत्य संस्मृत्य (बार-बार याद करके): संजय गीता की बातचीत को याद करने का महत्व बताते हैं। याद करने से ही खुशी मिलती है।
- ऋष्यामि (खुश होना): गीता का ज्ञान दुख से मुक्ति और परम आनंद देता है।
- रूपं अत्यद्भूतं (विश्वरूप): संजय विश्वरूप दर्शन (अध्याय 11) की महिमा को याद करके विस्मय और खुशी महसूस करते हैं।

खंड 4: गीता का अंतिम सिद्धांत और जयघोष (श्लोक 78)
Bhagavat Gita की पूरी शिक्षा का आखिरी निष्कर्ष संजय ने इस श्लोक में पेश किया है। यह श्लोक गीता का आखिरी और सबसे ताकतवर जयघोष है।
4.1. श्लोक 78 का डिटेल्ड एनालिसिस: जीत का तय करने वाला सिद्धांत
यत्र योगोश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।तत्र श्रीविजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिरमतिर्मम ॥78॥
अर्थ : जहाँ योगेश्वर श्री कृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी पार्थ (अर्जुन) हैं, वहाँ ज़रूर (ध्रुव) श्री (धन), जीत, भूति (धन) और नीति (धर्म) है। यह मेरी राय है।
विस्तृत विश्लेषण:
- यह श्लोक पूरी गीता का सार है और जीत का फ़ॉर्मूला देता है।
- यत्र योगेश्वरः कृष्णः (जहाँ योगेश्वर कृष्ण हैं):
- यहाँ कृष्ण सिर्फ़ भगवान नहीं हैं, बल्कि योगेश्वर हैं – योग (कर्म, ज्ञान, भक्ति) के भगवान, बुद्धि और ज्ञान के गाइड। कृष्ण धर्म को दिखाते हैं।
- यत्र पार्थो धनुर्धरः (जहाँ धनुर्धारी पार्थ हैं):
- यहाँ अर्जुन सिर्फ़ एक योद्धा नहीं हैं, बल्कि पार्थ (पृथा का बेटा) हैं – इंसान का रिप्रेजेंटेटिव, जो विश्वास के साथ अपना फ़र्ज़ निभाने के लिए तैयार है। वह कर्म (पुरुषार्थ) को दिखाते हैं।
तत्र (वहाँ ज़रूर):
- श्रीः (धन/ऐश्वर्य): भौतिक समृद्धि।
- विजयः (जीत): काम में सफलता।
- भूतिः (धन/महानता): आध्यात्मिक और भौतिक उन्नति।
- ध्रुव नीतिः (पक्की नीति/धर्म): सही रास्ता।
- नतीजा: संजय साफ कहते हैं कि जीवन के किसी भी क्षेत्र (धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे) में, जहाँ ज्ञान (कृष्ण) और कर्तव्य (अर्जुन) एक साथ होते हैं, वहाँ धर्म, शांति और जीत ज़रूर मिलती है।
- यह मेरी राय है (मतिः मम): संजय ने यह बातचीत सुनने के बाद बिना किसी भेदभाव के अपनी पक्की राय पेश की।

निष्कर्ष: धर्म, ज्ञान और विजय का संगम
Bhagavat Gita के अठारहवें चैप्टर के ये आखिरी श्लोक (71 से 78) ज़िंदगी के सबसे बड़े सच को बताते हैं:
फलश्रुति: जो लोग गीता का प्रवचन विश्वास के साथ सुनते हैं, वे भी पापों से मुक्त हो जाते हैं और शांति पाते हैं।
संदेहमुक्ति: ज्ञान का आखिरी मकसद अज्ञानता के भ्रम को दूर करना और खुद को याद करना है।
जीत का सूत्र: जहाँ योग (बिना स्वार्थ के काम) और ज्ञान मिलते हैं, वहाँ खुशी, दौलत और जीत ज़रूर मिलती है।
भगवद गीता का यह नतीजा हर इंसान को शक छोड़कर अपने धर्म पर चलने, भगवान की शरण में जाने और बिना स्वार्थ के काम करने और आखिर में जीत और मोक्ष पाने की प्रेरणा देता है।