Bhagavat Gita (भागवद गीता) : गीता के अठारहवाँ अध्याय के श्लोक 1 से 10 तक का गहन विश्लेषण

Bhagavat Gita : अध्याय अठारहवाँ (मोक्ष संन्यास योग) – श्लोक 1 से 10: त्याग और वैराग्य का परम रहस्य

भगवद्गीता के सत्रह अध्यायों में भगवान कृष्ण ने ज्ञान योग, कर्म योग, भक्ति योग और गुणत्रय के रहस्यों का वर्णन किया है। अब, अठारहवाँ अध्याय, ‘मोक्ष संन्यास योग’, इस संपूर्ण शिक्षा का निष्कर्ष और चरमोत्कर्ष है। इस अध्याय के प्रथम दस श्लोकों में, भगवान संन्यास और त्याग की सही परिभाषा देते हैं, इन दोनों शब्दों के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हैं, और तीनों गुणों के अनुसार त्याग के प्रकारों का विस्तार से वर्णन करते हैं।

ये श्लोक दर्शाते हैं कि संन्यास बाह्य कर्मों का त्याग नहीं, बल्कि आंतरिक भावना और फल की आसक्ति का त्याग है।

Bhagavat Gita

खंड 1: संन्यास और त्याग की परिभाषा (श्लोक 1, 2)

Bhagavat Gita अर्जुन के प्रश्न से आरंभ होता है, जिसमें गीता की शिक्षाओं के मूल में स्थित दो मुख्य अवधारणाओं – त्याग और संन्यास – पर स्पष्टीकरण मांगा गया है।

1.1. श्लोक 1 का विस्तृत विश्लेषण: अर्जुन का अंतिम प्रश्न

अर्जुन पूछता है : संन्यास्यस्य महाबाहो तत्वमचिच्छामि वेदितुम् । त्यागस्य च हृषिकेश विर्ग्गाविर्गकेशशिनिषूदन ॥1॥

अर्थ: अर्जुन ने कहा: हे महाबाहु (श्रीकृष्ण), हे हृषिकेश, हे केशिनिषूदन, मैं त्याग का सार और त्याग का सार (पृथक-पृथक) अलग-अलग जानना चाहता हूँ।

विस्तृत विश्लेषण: अर्जुन की शंका: गीता में संन्यास और संन्यास का बार-बार उल्लेख किया गया है। अर्जुन भ्रमित है कि क्या ये दोनों एक ही हैं या भिन्न? क्या कर्मों का पूर्ण त्याग ही संन्यास है?

संन्यास: सामान्यतः संन्यास का अर्थ घर छोड़ना और कर्म न करना होता है।

त्याग: त्याग का अर्थ है किसी चीज़ का त्याग करना। यहाँ अर्जुन पूछता है कि किन कर्मों का त्याग करना चाहिए।

श्री कृष्ण के तीन संबोधनों का महत्व: महाबाहो (महाबाह्य): प्रश्न का समाधान करने के लिए पर्याप्त शक्तिशाली होने का संकेत।

हृषिकेश (इंद्रियों के स्वामी): केवल वही जो इंद्रियों के स्वामी हैं, त्याग और संन्यास का रहस्य समझा सकते हैं।

केशिनिषूदन (केशी दानव का नाश करने वाले): अर्जुन के भीतर संशय रूपी दानव का नाश करने के लिए प्रार्थना।

1.2. श्लोक 2 का विस्तृत विश्लेषण: त्याग और संन्यास की वास्तविकता

श्रीभगवानुवाच: काम्यानां कर्मणां न्यासं कवयो विदुः । सर्वकर्मफलत्यागं प्रहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥2॥

अर्थ: भगवान ने कहा: सभी कर्मों के फल का त्याग करने वाले कर्मों का त्याग कवियों (ऋषियों) को ज्ञात है। और सभी कर्मों के फल का त्याग बुद्धिमान (विचारशील) पुरुषों को त्याग के रूप में ज्ञात है।

विस्तृत विश्लेषण: भगवान त्याग और संन्यास के बीच मूलभूत अंतर बताते हैं:

  • त्याग की सही परिभाषा: काम्य कर्म: वे कर्म जो किसी विशिष्ट भौतिक फल (जैसे धन, पत्नी, स्वर्ग) की प्राप्ति के उद्देश्य से किए जाते हैं।
  • संन्यास: सभी कर्मों के फल का त्याग करने वाले कर्मों का त्याग ही सच्चा संन्यास है। सच्चा तपस्वी बाह्य कर्मों का त्याग नहीं करता, बल्कि फल की इच्छा का त्याग करता है।
  • त्याग की सच्ची परिभाषा: सर्व कर्म फल त्याग: प्रत्येक कर्म के फल का त्याग – चाहे वह नित्य (दैनिक), नैमित्तिक (किसी अवसर पर) या काम्य हो – उसके फल का त्याग करना ही उसका फल त्याग है।
  • त्याग: जो व्यक्ति गृहस्थ होते हुए भी फल की आसक्ति का त्याग करता है, वही सच्चा त्यागी है।
  • निष्कर्ष: संन्यास और त्याग दोनों में आंतरिक त्याग महत्वपूर्ण है। व्यक्ति को फल की इच्छा का त्याग करना चाहिए, बाह्य कर्मों का नहीं।
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खंड 2: कर्म का त्याग करें या न करें – विवाद और निश्चय (श्लोक 3, 4)

Bhagavat Gita त्याग और संन्यास के विवाद को स्पष्ट करने के बाद, भगवान इस विषय पर प्रचलित दो परस्पर विरोधी मत प्रस्तुत करते हैं और फिर अपना अंतिम निर्णय देते हैं।

2.1. श्लोक 3 का विस्तृत विश्लेषण: त्याग पर दो परस्पर विरोधी मत

त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुरमनीषिणः । यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥3

अर्थ: कुछ ऋषि (विचारक) कहते हैं कि कर्म मलिन है और उसका त्याग कर देना चाहिए। और अन्य विद्वान कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप जैसे कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिए।

विस्तृत विश्लेषण: एक मत (योग्य त्याग): सख्यवादियों का मानना ​​है कि सभी कर्मों में कोई न कोई दोष या बंधन होता है (जैसे अन्न की चोरी)। इसलिए मोक्ष के लिए सभी प्रकार के कर्मों का पूर्णतः त्याग कर देना चाहिए।

दूसरा दृष्टिकोण (त्याग योग्य नहीं): कर्मयोगी मानते हैं कि यज्ञ, दान और तप जैसे धार्मिक और सामाजिक रूप से लाभकारी कर्म अपरिहार्य हैं। इन कर्मों का त्याग करने से समाज और व्यक्ति का कल्याण बाधित होता है।

विवाद का सार: यह श्लोक आध्यात्मिक मार्ग के दो प्रमुख मार्गों – संन्यास (कर्मों का त्याग) और कर्मयोग (कर्मों का प्रदर्शन) के बीच के शाश्वत विवाद को दर्शाता है।

2.2. श्लोक 4 का विस्तृत विश्लेषण: Bhagavat Gita श्रीकृष्ण का अंतिम निश्चय

निष्विष्टं शृणु मे तत्र तयागे भारतसतम । त्याग्यो हि पुरुष्वव्याघ्र तिविधः सम्प्रकीरतः ॥4॥

अर्थ: हे भरतसत्तम (अर्जुन), त्याग के विषय में मेरा अंतिम निश्चय (अंतिम मत) सुनो। हे पुरुषव्याघ्र (अर्जुन), त्याग को भी तीन प्रकार (त्रिविधः) बताया गया है।

विस्तृत विश्लेषण : नियत कर्म: भगवान त्याग और संन्यास के विवाद को ‘कर्म’ के तीन गुणों में विभाजित करके सुलझाते हैं।

भगवान का निश्चय: भगवान का मत है कि त्याग कर्म का त्याग नहीं, बल्कि कर्म के फलों का त्याग है।

त्याग के तीन प्रकार: अठारहवें अध्याय का मुख्य विषय अब आरंभ होता है। इससे पहले सत्रहवें अध्याय में श्रद्धा, भोजन और यज्ञ को तीन गुणों के अनुसार वर्गीकृत किया गया था। अब त्याग को भी उसके उद्देश्य और भावना के आधार पर तीन प्रकारों – सात्विक, राजसिक और तामसिक – में विभाजित किया गया है।

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खंड 3: दैनिक कार्यों का महत्व (श्लोक 5, 6)

Bhagavat Gita अब भगवान यज्ञ, दान और तप जैसे दैनिक कर्मों का महत्व बताते हैं और कहते हैं कि इनका त्याग करना उचित नहीं है।

3.1. श्लोक 5 का विस्तृत विश्लेषण: यज्ञ, दान और तप की शुद्धि

यज्ञनादानतपःकर्म न त्याज्यं कार्मेव तत । यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानानि मनिषिणाम् ॥5॥

अर्थ: यज्ञ, दान और तप का त्याग नहीं करना चाहिए, बल्कि इनका करना उचित है (कार्यम इव ततत)। यज्ञ, दान और तप ज्ञानी को भी शुद्ध करने वाले हैं।

विस्तृत विश्लेषण:

  • दैनिक कर्मों की अनिवार्यता: समाज और व्यक्ति के आंतरिक विकास के लिए यज्ञ, दान और तप आवश्यक हैं।
  • त्याग: समाज, ईश्वर और प्रकृति के प्रति कर्तव्य।
  • दान: त्याग और समर्पण की भावना।
  • तप: आत्म-संयम और शुद्धि।

पावनानि मनीषिनाम् (ज्ञानियों को शुद्ध करने वाला): ये कर्म केवल अज्ञानी को ही नहीं, बल्कि ज्ञानी को भी शुद्ध करते हैं। जो ज्ञानी है, वह फल की आसक्ति के बिना इन कर्मों को करता है, जिससे उसका ज्ञान अधिक स्थिर होता है और उसका अहंकार दूर होता है।

निष्कर्ष: कर्मों का त्याग अज्ञान है, किन्तु आसक्ति का त्याग करके कर्म करना ज्ञान है।

3.2. श्लोक 6 का विस्तृत विश्लेषण: फल के त्याग सहित कर्म

एतन्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च। कर्तव्यानि मते मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् कर्वतानि मतमुत्तमम्ममनि च । ॥6॥

अर्थ: हे पार्थ, मेरी राय में, ये सभी (यज्ञ, दान, तप) कर्म आसक्ति और फल का त्याग करके ही करने चाहिए। यह मेरा दृढ़ और उत्तम मत है।

विस्तृत विश्लेषण : Bhagavat Gita ईश्वरीय आदेश: श्री कृष्ण यहाँ अपनी शिक्षाओं का सारांश प्रस्तुत करते हैं। कर्म का त्याग नहीं, बल्कि दो चीज़ों का त्याग आवश्यक है:

संगम त्यक्त्वा (आसक्ति का त्याग): कर्म के प्रति आसक्ति या ‘मैं करता हूँ’ के अहंकार का त्याग।

फलनि च (फल का त्याग): कर्म करने के बाद उसके फल के प्रति आसक्ति का त्याग।

उत्तम मतम् (सर्वोत्तम मत): यही निष्काम कर्मयोग का सिद्धांत है। इस सिद्धांत का पालन करने से कर्म करने वाला व्यक्ति संन्यास और योग दोनों का फल प्राप्त करता है।

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खंड 4: त्रिविध त्याग का वर्गीकरण (श्लोक 7, 8, 9, 10)

अब, श्लोक 4 Bhagavat Gita में किए गए निर्धारण के अनुसार, भगवान तीन गुणों के अनुसार तीन प्रकार के त्याग का वर्णन करते हैं। यह वर्गीकरण व्यक्ति की आंतरिक भावना के आधार पर किया गया है।

4.1. श्लोक 7 का विस्तृत विश्लेषण: तामसिक त्याग – मोह और अज्ञान

नियत्यास्याः कर्मणो नोपपद्यते । मोहात्स्यागस्तामस्तामस्ताकीरतितः ॥7॥

अर्थ: नियत कर्म का त्याग करना उचित नहीं है। मोह के कारण किया गया त्याग तामसिक कहलाता है।

विस्तृत विश्लेषण: नियत कर्म: वे कर्म जो कर्तव्य और दायित्व के रूप में निर्धारित हैं (जैसे अर्जुन के लिए युद्ध करना)।

नोपापद्यते (अनुचित): नियत कर्म का त्याग करना अधर्म है।

मोहात परित्याग: (मोह के कारण त्याग):

भावना: तामसी त्याग आलस्य, प्रमाद, अज्ञान या ‘कर्म ही भोग है’ इस भ्रम के कारण किया जाता है।

उदाहरण: माता-पिता की सेवा का त्याग, या अध्ययन का त्याग।

तामसा: यह त्याग तामसी है, क्योंकि यह अज्ञान और जड़ता से उत्पन्न होता है। इस त्याग से कोई शुभ फल नहीं मिलता।

4.2 श्लोक 8का विस्तृत विश्लेषण: राजसी त्याग – भोग और अपेक्षा

दुखकमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्यजेत्यजेत्यां निवे त्याफलं लभेत्यां ॥8॥

अर्थ: जो व्यक्ति कर्म को दुःखदायी मानता है और शारीरिक कष्ट (कायाक्लेशभयत्) के भय से उसका त्याग कर देता है, उसे राजसिक त्याग करने पर भी त्याग का फल (मोक्ष) प्राप्त नहीं होता।

विस्तृत विश्लेषण : Bhagavat Gita दुखम् इति (दुःखरूप): राजसिक व्यक्ति कर्म करते समय अपने प्रयासों, परिश्रम और कठिनाइयों को दुःखदायी मानता है।

कायाक्लेशभयत् (शारीरिक कष्ट का भय): वह कर्म करने से होने वाले परिश्रम, पसीने या शारीरिक कष्ट के भय से कर्म का त्याग कर देता है।

राजसं त्यागम्: यह त्याग राजसिक है क्योंकि यह राग-द्वेष (दुःख के प्रति घृणा) से उत्पन्न होता है।

त्याग फलम् न लभेत्: त्याग का अंतिम फल, जो मोक्ष, शांति और परम सुख है, इस व्यक्ति को प्राप्त नहीं होता क्योंकि उसने फल की अपेक्षा करने के बजाय शारीरिक कष्ट का त्याग कर दिया है।

4.3. श्लोक 9 का विस्तृत विश्लेषण: Bhagavat Gita सात्विक त्याग – कर्तव्य और अकर्म

कारियेव यत्कर्म नियतं क्रियातेऽर्जुन । संगं त्यक्तवा फलं चैव स त्यागः सात्विको मतः ॥9॥

अर्थ: हे अर्जुन, नियत कर्म का त्याग, जो उसे ‘कर्तव्य’ मानकर (कार्यं एव) किया जाता है, तथा आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाता है, सात्विक माना जाता है।

विस्तृत विश्लेषण : कार्यं एव (कर्तव्य-वृत्ति): एक सात्विक व्यक्ति कर्म का विश्लेषण ‘कठिन’ या ‘सरल’ के रूप में नहीं, बल्कि ‘मेरा कर्तव्य’ के रूप में करता है।

संगं त्यक्त्वा (आसक्ति का त्याग): अहंकार का त्याग, जो कर्म को अपना मानकर किया जाता है।

फलं च एव (फल का त्याग): कर्म करते हुए भी उसके फल की आशा न करना।

सात्विकः: यही सच्चा त्याग है, जो निष्काम कर्म योग का आधार है। यह त्याग मन को पवित्रता, शांति और परम मुक्ति की ओर ले जाता है।

4.4. श्लोक 10 का विस्तृत विश्लेषण: Bhagavat Gita सात्विक त्यागी के लक्षण

न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुषेले नानुष्ज्जते । त्यागी सत्वसमाविष्टो मेधावी चिन्नसंशयः ॥10॥

अर्थ: त्यागी व्यक्ति, सत्वगुण से युक्त, बुद्धिमान और संशयरहित, अकुशल (अकुशल) कर्मों से द्वेष नहीं करता और कुशल (शुभ) कर्मों में आसक्त नहीं होता।

विस्तृत विश्लेषण : सत्वसमाविष्ट: यह व्यक्ति सात्विक त्याग का अभ्यास करता है, इसलिए वह शांत और संतुलित रहता है।

पुण्यवान और संशयरहित: पुण्यवान: उसकी बुद्धि तीक्ष्ण और शुद्ध होती है। संशयमुक्त: उसके सभी संशय दूर हो जाते हैं, क्योंकि उसे सत्य का ज्ञान हो जाता है।

कर्म के प्रति दृष्टिकोण: न द्वेष्टि कुशलं कर्म (अशुभ कर्मों से द्वेष न रखना): वह तामसिक या राजसिक कर्मों से विरत रहता है, परन्तु पूर्व में किए गए या दूसरों द्वारा किए गए अशुभ कर्मों के प्रति द्वेष नहीं रखता।

कुशले न अनुशाज्जते: वह सात्विक कर्म करता है, परन्तु उससे उत्पन्न होने वाले पुण्य या फल में आसक्त नहीं होता।

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निष्कर्ष: त्याग ही मोक्ष का एकमात्र मार्ग है।

Bhagavat Gita के अठारहवें अध्याय के ये प्रथम दस श्लोक संपूर्ण गीता की शिक्षाओं का सार प्रस्तुत करते हैं और त्याग एवं वैराग्य के गहन रहस्य को उजागर करते हैं:

त्याग और त्याग में अंतर: त्याग फल की इच्छा से कर्मों का त्याग है, जबकि त्याग सभी कर्मों के फलों के प्रति आसक्ति का त्याग है।

कर्म की अनिवार्यता: यज्ञ, दान और तप जैसे दैनिक और अनिवार्य कर्मों का त्याग करना अनुचित है, क्योंकि ये बुद्धिमानों को भी पवित्र कर देते हैं।

सात्विक त्याग: मोह, आलस्य या शारीरिक कष्ट के भय से नहीं, बल्कि केवल कर्तव्य और फल के त्याग से कर्म करना ही सच्चा और सात्विक त्याग है।

त्यागी के लक्षण: सात्विक त्यागी द्वेष और आसक्ति से मुक्त होता है, जिससे वह संशय से मुक्त होकर परम शांति प्राप्त करता है।

यह ज्ञान अर्जुन को अपना कर्तव्य निभाने और अंततः मोक्ष प्राप्त करने का अंतिम मार्ग प्रदान करता है।

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