Bhagavat Gita (भागवद गीता) : गीता के सत्रहवें अध्याय के श्लोक 1 से 7 तक का गहन विश्लेषण

भगवद् गीता: अध्याय सत्रहवें (श्रद्धात्रय विभाग योग) – श्लोक 1 से 7: श्रद्धा के मूल स्वरूप और गुणों का रहस्य

Bhagavat Gita का सत्रहवें अध्याय ‘श्रद्धात्रयविभाग योग’ के नाम से विख्यात है। पिछले अध्यायों में भगवान कृष्ण ने निष्काम कर्मयोग, ज्ञानयोग और अंततः दैवी-आसुरी सम्पदा का विश्लेषण किया था। किन्तु कर्म का स्वरूप, गुण और फल अंततः व्यक्ति की श्रद्धा पर निर्भर करते हैं। यह अध्याय अर्जुन के एक मूलभूत प्रश्न से आरंभ होता है और पहले सात श्लोकों में भगवान श्रद्धा के स्वरूप, उसके तीन प्रकारों और व्यक्ति की प्रकृति का सटीक निदान प्रस्तुत करते हैं।

ये श्लोक मानव स्वभाव का गहन विश्लेषण हैं, जो बताते हैं कि हम क्या खाते हैं, क्या पूजते हैं और किसमें विश्वास करते हैं, यह सब हमारी त्रिगुणात्मक प्रकृति (सत्व, रज, तम) का प्रतिबिंब है।

खंड 1: अर्जुन का प्रश्न और श्रद्धा का रहस्य (श्लोक 1, 2)

Bhagavat Gita यह अध्याय अर्जुन के एक महत्वपूर्ण प्रश्न से आरंभ होता है, जो सोलहवें अध्याय के अंतिम श्लोक में की गई चर्चा का स्वाभाविक विस्तार है।

1.1. श्लोक 1 का विस्तृत विश्लेषण: शास्त्र-विहीन श्रद्धा का प्रश्न

अर्जुन पूछते हैं:

ये शास्तर्विधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान࿽आः । तेषां सूक्ष्म तु का कृष्ण सत्वमाहो रजस्तमः ॥1॥

अर्थ: अर्जुन ने पूछा: हे कृष्ण, शास्त्र-विधि का परित्याग करके भी श्रद्धापूर्वक उपासना करने वालों की क्या गति होती है? क्या वह सतोगुण है, सुखोगुण है या तमोगुण है?

विस्तृत विश्लेषण:

Bhagavat Gita शास्त्र-विधि का परित्याग: सोलहवें अध्याय के अंत में, श्री कृष्ण ने कहा कि जो मनुष्य शास्त्र-विधि का परित्याग करके मनमाना आचरण करता है, उसे सिद्धि नहीं मिलती। अर्जुन इस पर प्रश्न करते हैं।

श्रद्धानवित: (श्रद्धा से युक्त): अर्जुन उन लोगों के बारे में बात कर रहे हैं जो शास्त्रों के नियमों का पालन न करते हुए भी, निष्ठा और विश्वास के साथ पूजा या यज्ञ करते हैं।

मूल प्रश्न: अर्जुन जानना चाहता है कि जब पूजा शास्त्रविहित न हो, तो उस श्रद्धा को किस श्रेणी (सत्व, रज या तम) में रखा जा सकता है? यह प्रश्न अत्यंत गहन है, क्योंकि यह बाह्य कर्मों पर आंतरिक भावना (श्रद्धा) के महत्व को प्रकट करता है।

1.2. श्लोक 2 का विस्तृत विश्लेषण: श्रद्धा स्वभाव का प्रतिबिंब है

श्री भगवानुवाच:

त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनं सा सब्भाजा । सात्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥2॥

अर्थ: श्री भगवान ने कहा: स्वभाव से उत्पन्न इन देहधारी मनुष्यों की श्रद्धा तीन प्रकार की होती है: सात्विक (सत्वगुणी), राजसिक (रजोगुणी) और तामसिक (तमोगुणी)। उसके बारे में सुनो।

विस्तृत विश्लेषण:

Bhagavat Gita श्रद्धा का सर्वोच्च पद: भगवान स्पष्ट करते हैं कि श्रद्धा केवल एक भावना नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व का आधार है।

त्रिविधा श्रद्धा (श्रद्धा के तीन प्रकार): श्री कृष्ण संसार के सभी मनुष्यों की श्रद्धा को इन तीन गुणों के आधार पर वर्गीकृत करते हैं।

सबभाजस्वजसी (स्वभाव से जन्मा): यह सबसे महत्वपूर्ण शब्द है। श्रद्धा बाहर से नहीं आती, बल्कि व्यक्ति के आंतरिक स्वभाव (पूर्व जन्मों के आचरण और वर्तमान गुणों का संयोजन) से उत्पन्न होती है। उस गुण की श्रद्धा व्यक्ति में प्रबल होती है।

ज्ञान का आधार: यह समझ ही ज्ञान का आधार है, जिसके माध्यम से व्यक्ति स्वयं और दूसरों के स्वभाव को समझ सकता है।

खंड 2: विश्वास का स्वरूप उसके गुणों के अनुसार (श्लोक 3)

Bhagavat Gita अब भगवान एक गहन कथन के माध्यम से श्रद्धा और प्रकृति के बीच के अविभाज्य संबंध को स्पष्ट करते हैं।

2.1. श्लोक 3 का विस्तृत विश्लेषण: मनुष्य श्रद्धा-सदृश है

सत्वनुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत भारती भारत । शर्द्धमोऽयं पुरुशो ओ यच्छ्रद्धः स एव सः ॥3॥

अर्थ: हे भारत, सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके आंतरिक स्वभाव (सत्त्वम्) के अनुरूप होती है। यह मनुष्य श्रद्धा-सदृश है; जैसा वह आस्तिक है, वैसा ही वह स्वयं भी है।

विस्तृत विश्लेषण:

Bhagavat Gita सत्वनुरूपा श्रद्धाः स एव सः ॥3 यहाँ ‘सत्त्वम्’ शब्द का अर्थ केवल ‘सत्त्वम् गुण’ ही नहीं, बल्कि मनुष्य का आंतरिक स्वभाव, उसकी आंतरिक शुद्धता या अशुद्धता भी है। जैसी उसकी आंतरिक प्रकृति होगी, वैसी ही उसकी श्रद्धा होगी। यदि आंतरिक प्रकृति में वासना प्रबल है, तो श्रद्धा भी फल की आशा से युक्त होगी।

श्रद्धामायोयायं पुरुषः (मनुष्य श्रद्धावान है): यह एक महान घोषणा है। मनुष्य का अस्तित्व उसकी श्रद्धा से बना है। श्रद्धा ही मनुष्य के जीवन का केंद्र है।

यो यच्छ्रद्धा स एव स (जैसी श्रद्धा, वैसा ही वह): यही ज्ञान का परम सार है। यदि किसी की श्रद्धा केवल सुख और धन पर है, तो उसका पूरा जीवन उस सुख और धन की प्राप्ति के लिए ही हो जाता है। यदि किसी की श्रद्धा परमात्मा और धर्म पर है, तो उसका जीवन दिव्य हो जाता है। संक्षेप में, मनुष्य अपनी श्रद्धा का मूर्त रूप है।

खंड 3: ईश्वर के प्रति तीन प्रकार की आस्था और आराधना (श्लोक 4)

Bhagavat Gita मानव स्वभाव और श्रद्धा के बीच संबंध स्थापित करने के बाद, भगवान अब देवताओं की पूजा के आधार पर श्रद्धा के तीन प्रकारों का वर्गीकरण करते हैं।

3.1. श्लोक 4 का विस्तृत विश्लेषण: देवताओं, यक्षों और भूतों की पूजा

यजन्ते सात्विका देवाण्यक्षारक्षांसि राजसाः । प्रेतान्भूतगणांचान्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥4॥

अर्थ: सात्विक लोग देवताओं की पूजा करते हैं। राजसिक लोग यक्षों और राक्षसों की पूजा करते हैं। और अन्य तामसिक लोग भूतों और प्रेतों की पूजा करते हैं।

विस्तृत व्याख्या:

Bhagavat Gita देवताओं की सात्विक पूजा (देवाण): पूजा का प्रकार: सात्विक लोग देवताओं (विष्णु, शिव, सूर्य आदि) की पूजा करते हैं, जो धर्म और सत्य का प्रतिनिधित्व करते हैं।

उद्देश्य: उनका उद्देश्य शांति, ज्ञान, कल्याण और मोक्ष प्राप्त करना है। उनकी पूजा शास्त्रसम्मत है और उसमें शुद्ध भावना की प्रधानता होती है।

राजसिक पूजा (यक्ष-राक्षसंस): पूजा का प्रकार: राजसिक लोग यक्षों (जैसे कुबेर) और राक्षसों (राक्षसंस) की पूजा करते हैं।

उद्देश्य: यक्ष धन और वैभव से जुड़े होते हैं, जबकि राक्षस शक्ति, अधिकार और विजय से जुड़े होते हैं। राजसिक व्यक्ति की पूजा का मुख्य उद्देश्य भौतिक फल, सम्मान और शक्ति प्राप्त करना होता है। इसमें कर्म को प्राथमिकता दी जाती है, लेकिन अंततः स्वार्थ छिपा होता है।

तामसिक पूजा (प्रेतान-भूतगणश्च): पूजा का प्रकार: तामसिक लोग प्रेतान (मृत आत्माएँ) और भूतगण (निम्न शक्तियाँ) की पूजा करते हैं।

उद्देश्य: उनकी पूजा का उद्देश्य ईर्ष्या, घृणा, दूसरों को नुकसान पहुँचाने या केवल भय से मुक्ति पाना होता है। उनकी पूजा अशुद्ध, अंधविश्वासी और क्रूर होती है (जैसे पशुबलि)।

खंड 4: तमोगुणी तप का विश्लेषण (श्लोक 5, 6)

Bhagavat Gita श्रद्धा के प्रकारों का वर्णन करने के बाद, अब भगवान अज्ञान और अहंकार से प्रेरित होकर तपस्या करने वालों का वर्णन करते हैं। यह तपस्या अंततः विनाशकारी और अशुभ फल देती है।

4.1. श्लोक 5 का विस्तृत विश्लेषण: कपट और अहंकार का तप

अशास्तर्विहितं घोरं तप्यान्ते ये तपो जनाः । दमभांकारसंयुकताः ॥5॥

अर्थ: जो लोग शास्त्रविहित के विरुद्ध कठोर तप करते हैं, वे कपट और अहंकार से युक्त होते हैं, तथा काम, राग और बल से प्रेरित होते हैं।

विस्तृत व्याख्या:

Bhagavat Gita अशास्तर्विहितम् घोरम तपः यह तप शास्त्रविहित नहीं है। उदाहरण के लिए, शरीर को अत्यधिक कष्ट पहुँचाना, निरंतर उपवास करना, या अमानवीय शारीरिक क्रियाएँ करना। इस तप का उद्देश्य मुक्ति या ज्ञान नहीं, बल्कि अहंकार और शक्ति का प्रदर्शन है।

दंभंकरसंयुक्तः (विनम्रता और अहंकार): इस तपस्या का मूल उद्देश्य लोगों को अपनी शक्ति दिखाना, सम्मान प्राप्त करना या अपने अहंकार को पोषित करना है।

काम-राग-बल (इच्छा, आसक्ति, बल): इस तपस्या के पीछे या तो किसी महान भौतिक इच्छा की पूर्ति होती है, या किसी चीज़ के प्रति प्रबल आसक्ति। वे अपनी इस भौतिक शक्ति का अनुचित उपयोग करना चाहते हैं।

4.2. श्लोक 6 का विस्तृत विश्लेषण: आंतरिक और बाह्य विनाश

कर्षयन्तः शरीरिरिस्थं भूतग्रामचेतसः भूतारिरस्थं विद्यासुरिस्थान ॥6॥

अर्थ: ये अचेतसः लोग अपने शरीर के सभी तत्वों को और शरीर के भीतर मुझ परमात्मा को भी पीड़ा पहुँचाते हैं। इन्हें राक्षसी संकल्प (राक्षसी वृत्ति) वाला जानो।

विस्तृत व्याख्या:

Bhagavat Gita कर्षयन्त: शरीरस्थं भूतग्रामम्: अज्ञानी लोग घोर तपस्या करते हुए अपने शरीर को अत्यधिक कष्ट पहुँचाते हैं, जो तामसिक तपस्या है। शरीर पंचमहाभूतों से बना है और इसे कष्ट देना, तत्वों को कष्ट देने के समान है।

मा चैव अन्त: शरीरस्थं (अंतरात्मा के ईश्वर को कष्ट): यह सबसे बड़ा दोष है। ईश्वर प्रत्येक जीव के हृदय में परमात्मा के रूप में निवास करते हैं। जब कोई व्यक्ति शरीर को अनावश्यक कष्ट देता है, तो वह परमात्मा के धाम का अपमान करता है। यह अज्ञानता ईश्वरीय तत्व से घृणा है।

विद्धि असुरनिश्चयन् (राक्षसी संकल्प): आसुरी लोगों की तरह, ये तपस्वी भी अंततः स्वयं से और ईश्वरीय तत्व से घृणा करने लगते हैं। उनकी यह मानसिक प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से आसुरी संकल्प है, जो उन्हें पतन की ओर धकेलती है।

खंड 5: भोजन का त्रिगुण वर्गीकरण (श्लोक 7)

भगवान अब श्रद्धा के सिद्धांत को मनुष्य के सबसे मूलभूत कार्य – आहार (भोजन) से जोड़ते हैं, जो उसके स्वभाव और स्वास्थ्य को सीधे प्रभावित करता है।

5.1. श्लोक 7 का विस्तृत विश्लेषण: भोजन का चुनाव और गुण

आहारस्त्वपि सर्व� त्रिविधो भवति प्रियः । यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥7॥

अर्थ: सभी मनुष्यों को तीन प्रकार के भोजन प्रिय होते हैं। (इसी प्रकार) यज्ञ, तप और दान भी तीन प्रकार के होते हैं। अब इनके भेद के बारे में सुनिए।

विस्तृत विश्लेषण:

Bhagavat Gita आहारस्वरूप त्रिविधो (भोजन भी तीन प्रकार का होता है): मनुष्य जिस प्रकार का भोजन चुनता है, वह उसके विवेक (श्रद्धा) में प्रबल गुण का स्पष्ट संकेत है। भोजन न केवल शरीर का, बल्कि मन और बुद्धि का भी पोषण करता है।

आस्था का व्यावहारिक प्रकटीकरण: यह दर्शाने के लिए कि किसी व्यक्ति की आस्था बाह्य रूप से कैसी दिखती है, भगवान चार मुख्य क्षेत्रों का वर्गीकरण करेंगे:

1.भोजन: (निम्नलिखित श्लोकों में वर्णित) 2.यज्ञ: 3.तपस्या: 4.दान:

गुण का महत्व: इन चार क्षेत्रों में व्यक्ति जिस प्रकार व्यवहार करता है, उससे यह निर्धारित होता है कि उसमें सत्व, रजोगुण या अज्ञान का गुण प्रबल है। यह ज्ञान व्यक्ति को सत्वगुण वाले भोजन और कर्मों का चयन करके अपने स्वभाव को ईश्वरत्व की ओर निर्देशित करने में सहायता करता है।

निष्कर्ष: विश्वास मनुष्य का स्वभाव है।

Bhagavat Gita के सत्रहवें अध्याय के ये प्रथम सात श्लोक मानव स्वभाव और कर्मों के मूल सिद्धांत – श्रद्धा – को प्रकट करते हैं।

श्रद्धा का आधार: श्रद्धा कोई बाह्य कर्म नहीं, बल्कि मनुष्य के आंतरिक स्वभाव (तीन गुणों) का प्रतिबिंब है।

सर्वव्यापी श्रद्धा: मनुष्य आस्तिक है, और जैसा वह विश्वास करता है, वैसा ही वह होता है।

गुणों का प्रदर्शन: उपासना, तप और आहार-विहार के माध्यम से मनुष्य संसार के समक्ष अपनी श्रद्धा (सत्व, रज, तम) प्रदर्शित करता है।

चेतावनी: अज्ञान और अहंकार से प्रेरित तपस्या और उपासना अंततः आसुरी प्रवृत्तियों की ओर ले जाती है।

ये श्लोक हमें आत्मनिरीक्षण द्वारा अपने आंतरिक गुणों को समझने और सात्विक आहार और कर्मों की ओर मुड़ने के लिए प्रेरित करते हैं, क्योंकि मोक्ष का मार्ग केवल दिव्य और सात्विक श्रद्धा से ही प्रशस्त होता है।

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