National Anthem : 150 years of the national song Vande Mataram (वंदे मातरम) राष्ट्रीय गीत के 150 वर्ष

National Anthem : 150 years of the national song Vande Mataram (वंदे मातरम) राष्ट्रीय गीत के 150 वर्ष

हजारों वर्षों से माँ भारती के चरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित करने वाले प्रत्येक भारतीय के लिए ‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि एक मंत्र, एक प्राणशक्ति और लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान का गीत है।

आज, 7 नवंबर, 2025 के पावन दिवस पर, हम भारत के अमर राष्ट्रगान Vande Mataram की रचना की 150वीं वर्षगांठ के राष्ट्रव्यापी समारोह की औपचारिक शुरुआत कर रहे हैं। 7 नवंबर, 1875 को बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित यह गीत भारतीय राष्ट्रवाद और संस्कृति का एक अटूट स्तंभ रहा है।

इस अर्धशताब्दी (150 वर्ष) के पावन अवसर पर, आइए इस महान गीत के इतिहास, इसकी प्रेरणा शक्ति और भारत के राष्ट्रीय जीवन में इसके अभिन्न स्थान पर विस्तार से चर्चा करें।

Vande Mataram: 150 वर्षों की अमर विरासत

(भारतीय राष्ट्रगीत के अर्धशताब्दी समारोह के अवसर पर विशेष जानकारी)

एक ऐसा गीत जिसने एक राष्ट्र को जन्म दिया

National Anthem : किसी भी देश के इतिहास में ऐसे गीत या नारे होते हैं जो न केवल कानों को, बल्कि आत्मा को भी छू जाते हैं। भारत के लिए, Vande Mataramएक ऐसा ही दिव्य और जादुई गीत है। जब पूरा देश गुलामी की ज़ंजीरों में जकड़ा था, जब बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने माँ के सौंदर्य, शक्ति और दिव्यता का काव्यात्मक रूप प्रकट किया, उसी क्षण से यह गीत ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सबसे शक्तिशाली हथियार बन गया।

Vande Mataram‘ का सीधा सा अर्थ है – “हे माँ, मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ।” लेकिन भारतीय संदर्भ में, यह माँ केवल धरती या भूमि नहीं, बल्कि ‘भारत माता’ का जीवंत रूप है, जो सशक्त, सुंदर, फलदायी और दिव्यता के सभी गुणों से संपन्न है। बंकिमचंद्र ने 150 वर्ष पूर्व इस गीत के माध्यम से मातृभूमि को श्रद्धांजलि देने का जो संकल्प व्यक्त किया था, वह आज भी प्रत्येक भारतीय के हृदय में गूंजता है।

भाग-1: महर्षि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय: एक दूरदर्शी कवि की कृति

Vande Mataram की रचना 7 नवंबर, 1875 (कुछ स्रोतों के अनुसार 1876) को बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी।

प्रेरणा का स्रोत

बंकिम चंद्र ब्रिटिश सरकार में डिप्टी मजिस्ट्रेट थे, लेकिन उनका हृदय भारतीय संस्कृति और राष्ट्रवाद के लिए धड़कता था। एक लोककथा के अनुसार, रेलगाड़ी में यात्रा करते समय खिड़की से बंगाल के हरे-भरे, जल से भरपूर और शीतल मलय दृश्यों ने उन्हें गहराई से प्रेरित किया। उनका मानना ​​था कि ऐसी समृद्ध और सुंदर भूमि की पूजा केवल एक ‘देश’ के रूप में नहीं, बल्कि एक ‘माँ’ के रूप में की जानी चाहिए। इसी विचार से ‘सुजलं सुफलं मलयज शीतलम्’ (जल से भरपूर, फलों से भरपूर, मलय हवाओं से शीतल) शब्द निकले। यह गीत आधा संस्कृत और आधा बंगाली में रचा गया है, जो इसके काव्यात्मक सौंदर्य और आध्यात्मिक गहराई को बढ़ाता है।

‘आनंदमठ’ में समावेश

बंकिमचंद्र ने इस गीत को 1882 में प्रकाशित अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया। यह उपन्यास 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में बंगाल में हुए संन्यासी विद्रोह पर आधारित था। इस उपन्यास में अंग्रेजों और मुस्लिम नवाब के विरुद्ध लड़ने वाले साधु-सैनिकों का मूल मंत्र ‘Vande Mataram‘ था। इस क्रांतिकारी प्रसंग के कारण, यह गीत युवाओं और क्रांतिकारियों के बीच तुरंत लोकप्रिय हो गया।

भाग-2: स्वतंत्रता संग्राम का ‘क्रांतिकारी मंत्र’

Vande Mataram वह पहला गीत था जिसने धर्म और संस्कृति पर आधारित भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी।

बंग-भंग आंदोलन और राष्ट्रीय नारा

जब 1905 में ब्रिटिश सरकार ने बंगाल का विभाजन किया, तो इस विभाजन के विरुद्ध आंदोलन (बंग-भंग आंदोलन) शुरू हुआ। इस आंदोलन में ‘Vande Mataram‘ नारे का व्यापक रूप से इस्तेमाल किया गया। लाखों लोगों ने इस गीत को गाकर ब्रिटिश शासन का विरोध किया। यह गीत केवल बंगाल तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे देश में, विशेष रूप से ‘लाल-बाल-पाल’ (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल) जैसे क्रांतिकारी नेताओं के प्रभाव से, एक राष्ट्रीय नारा बन गया। इस गीत के प्रबल प्रभाव के कारण, ब्रिटिश सरकार ने इसके गायन पर प्रतिबंध लगा दिया, लेकिन इस प्रतिबंध से इसकी लोकप्रियता और बढ़ी।

कांग्रेस के मंच पर पहला गीत

इस गीत का राजनीतिक महत्व पहली बार 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में स्थापित हुआ। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने स्वयं इस गीत को गाया और इसे राष्ट्रीय पहचान दिलाई। बाद में, 1905 के बनारस अधिवेशन में भी इसे स्वीकार कर लिया गया।

शहीदों का अंतिम नारा

Vande Mataram‘ भारतीय क्रांतिकारियों का जीवन-नारा बन गया। खुदीराम बोस, भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे अनगिनत क्रांतिकारी फांसी के तख्ते पर चढ़कर भी इस गीत का जाप करते थे। इस गीत ने उन्हें मातृभूमि के लिए सर्वस्व न्योछावर करने की अदम्य प्रेरणा दी। यह सिर्फ़ एक गीत नहीं, बल्कि शहादत का रक्तरंजित इतिहास था।

भाग-3: संवैधानिक स्वीकृति और सम्मान

स्वतंत्रता के बाद, नए राष्ट्र के लिए राष्ट्रीय प्रतीकों के चयन का समय आया।

राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत

24 जनवरी, 1950 को भारतीय संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि: ‘जन गण मन’ भारत का राष्ट्रगान होगा।

स्वतंत्रता संग्राम में अपने ऐतिहासिक योगदान और विशेष महत्व के कारण, Vande Mataramको भी ‘जन गण मन’ के समान दर्जा दिया जाएगा और इसे भारत का राष्ट्रगीत कहा जाएगा।यह निर्णय ‘वंदे मातरम’ के अद्वितीय त्याग और प्रेरक शक्ति को श्रद्धांजलि थी। ‘जन गण मन’ राज्य का प्रतीक है, जबकि ‘वंदे मातरम’ राष्ट्र की संस्कृति और आध्यात्मिक गौरव का प्रतीक है।

भाग-4: ‘वंदे मातरम्’ का अर्थ और काव्यात्मक सौंदर्य

यह गीत केवल एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि काव्य और आध्यात्मिकता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

सौंदर्य और शक्ति का वर्णन

गीत के आरंभिक पदों में भारत माता के प्राकृतिक सौंदर्य का गहन वर्णन है: Vande Mataram | सुजलां सुफलां, मलयजशीतलं, शस्यश्यालं, मातरम् ||

अर्थ: “हे माँ, जल से परिपूर्ण, फलों से भरपूर, मलय वायु से शीतल और फसलों से हरी-भरी, मैं आपको प्रणाम करता हूँ।”बाद के पदों में माँ के दिव्य और शक्तिशाली रूप का वर्णन है, जो देश की एकता और अखंडता की भावना को दर्शाता है:

त्वं हि दुर्गा दशप्रहरंधरिणी, कमला कमलदल विहारिणी, वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वं ||

अर्थ: “आप दस आयुध धारण करने वाली दुर्गा हैं, कमल पर विराजमान कमला (लक्ष्मी) हैं, और ज्ञान देने वाली वाणी (सरस्वती) हैं। मैं आपको प्रणाम करता हूँ।”

यह गीत स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि भारत भूमि यहाँ के लोगों की शक्ति (दुर्गा), समृद्धि (लक्ष्मी) और ज्ञान (सरस्वती) का स्रोत है।

भाग-5: वैश्विक स्वीकृति और प्रेरणा

Vande Mataram‘ का प्रभाव केवल भारतीय सीमाओं तक ही सीमित नहीं है।

मैडम भीखाईजी कामा और अंतर्राष्ट्रीय पहुँच

1907 में, मैडम भीखाईजी कामा ने जर्मनी के स्टटगार्ट में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में भारत का पहला राष्ट्रीय ध्वज फहराया, जिसके मध्य भाग पर देवनागरी लिपि में ‘वंदे मातरम’ लिखा था। इस गीत से प्रेरित होकर, इस ध्वज ने दुनिया के सामने भारत के स्वतंत्रता संग्राम का उद्घोष किया।

बीबीसी सर्वेक्षण

2003 में, ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन (बीबीसी) द्वारा दुनिया के सबसे लोकप्रिय गीतों पर किए गए एक सर्वेक्षण में, ‘वंदे मातरम’ दूसरे स्थान पर आया, जो इसके कालातीत प्रभाव और संगीत की सार्वभौमिक अपील को दर्शाता है।

भाग-6: 150 वर्ष बाद: आज के संदर्भ में ‘वंदे मातरम’ का महत्व

Vande Mataram‘ की रचना को 150 वर्ष हो गए हैं, लेकिन इसका महत्व बिल्कुल कम नहीं हुआ है, बल्कि और बढ़ गया है।

राष्ट्रीय गौरव और एकता का प्रतीक

आज भी यह गीत राष्ट्रीय गौरव और एकता के बंधन को मज़बूत करने का काम करता है। यह हमें याद दिलाता है कि हम सब एक ही माँ की संतान हैं और आज़ादी कोई वरदान नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों के अनगिनत बलिदानों का फल है।

‘स्वदेशी’ का संकल्प

National Anthem : जिस प्रकार इस गीत ने संन्यासी विद्रोह के दौरान शक्ति और आत्मनिर्भरता का संदेश दिया था, उसी प्रकार आज यह अर्धशताब्दी समारोह देश को ‘स्वदेशी’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के संकल्प को मज़बूत करने की प्रेरणा देता है। स्थानीय उत्पादों का उपयोग, भारतीय भाषाओं का सम्मान और देश के पर्यावरण के प्रति जागरूक रहना – ये सभी भावनाएँ इस गीत के मूल में समाहित हैं।

उपसंहार: 150 वर्षों की एक अनंत यात्रा

Vande Mataram‘ केवल एक गीत नहीं है, यह एक संस्कृति, एक सभ्यता और एक अदम्य राष्ट्रीय भावना का ध्वज है। 150 वर्षों की इस ऐतिहासिक यात्रा में, इस गीत ने अनेक चुनौतियों का सामना किया है, लेकिन इसकी आत्मा अक्षुण्ण रही है। आज, जब देश एक विकसित भारत बनने के लक्ष्य की ओर अग्रसर है, ‘वंदे मातरम’ की भावना प्रत्येक भारतीय के हृदय में मातृभूमि के प्रति विश्वास, आस्था और समर्पण का संचार करती रहती है।

Vande Mataram ! – मातृभूमि को नमन!” यह नारा केवल अतीत की याद नहीं दिलाता, बल्कि एक उज्ज्वल भविष्य की ओर ले जाने वाला एक शाश्वत मार्गदर्शक है।

जय हिंद!

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