
भगवद गीता: पंद्रहवें अध्याय (पुरुषोत्तम योग) – श्लोक 15 से 20: परम रहस्य और पूर्णता का ज्ञान
Bhagavat Gita के पंद्रहवें अध्याय का नाम “पुरुषोत्तम योग” है। अब तक के श्लोकों में, भगवान कृष्ण ने दुनिया को भ्रम का पेड़, आत्मा को अपना हिस्सा और अपनी शक्ति को ब्रह्मांड चलाने वाला बताया है। अब, इस चैप्टर के आखिरी और सबसे ज़रूरी श्लोकों (15 से 20) में, भगवान अपना सबसे बड़ा और सबसे अनोखा रूप, “पुरुषोत्तम” दिखाते हैं, जो इस सारे ज्ञान का असली सार है।
1.ज्ञान, स्मृति और वेदों का स्रोत (श्लोक 15)

श्लोक 15:
सर्वस्य चाहं हरदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्जुनम्पोहनं च। वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृविदेवा चह्न ॥15॥
अर्थ: मैं सभी जीवों के दिलों में खास तौर पर रहता हूँ। सिर्फ़ मेरे ज़रिए ही याद (यादशक्ति), ज्ञान (ज्ञान) और भूलना (अपोहनम) होता है। सभी वेदों में सिर्फ़ मुझे ही जाना जा सकता है। मैं वेदांत का बनाने वाला और वेदों का जानने वाला हूँ।
Bhagavat Gita श्री कृष्ण यहाँ अंदरूनी लेवल पर अपने रूप की विशालता बताते हैं:
दिल में परमात्मा: भगवान हर जीव के दिल में परमात्मा के रूप में रहते हैं। यह परमात्मा ही चेतना का सोर्स है।
ज्ञान के तीन सोर्स:याद: पिछले अनुभवों को याद रखने की शक्ति।
ज्ञान: अभी चीज़ों को समझने की शक्ति।
अपोहनम (भूलना): अनचाही या गैर-ज़रूरी चीज़ों को भूलने का काम। ये तीन दिमागी काम सिर्फ़ भगवान ही कंट्रोल करते हैं।
वेदों का मकसद: सभी वेदों, उपनिषदों और धार्मिक ग्रंथों का सबसे बड़ा और आखिरी मकसद (वेद्य) भगवान श्री कृष्ण को जानना है।
वेदांत के रचयिता: ‘वेदांत’ का मतलब है वेदों का अंत या सार। श्री कृष्ण खुद वेदांत (वेदांतकृत) के रचयिता और वेदों (वेदविता) के महान रहस्यों के ज्ञाता हैं।
संक्षेप में, इंसान ज्ञान, याददाश्त या भूलने की बात करता है, भगवान खुद ये सब काम अंदर से करते हैं।
2.त्रिगुणात्मक मनुष्य का सिद्धांत (श्लोक 16-17)

यहीं से श्री कृष्ण की सृष्टि के तीन मूल तत्वों – क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम का सिद्धांत आता है। देकर, वे अपना सर्वोच्च पद स्थापित करते हैं।
श्लोक 16: क्षर र अक्षर पुरुषोत्तम
द्विविमौ पुरुषौ लोके क्षारशक्षरा एव च। क्षरः सर्वाणि भूतानि कुटस्थोक्षर उच्यते ॥16॥
अर्थ: इस दुनिया में दो तरह के लोग (तत्व) हैं: खशर और अक्षर। क्षर का मतलब है नाशवान, यानी वे जीव (शरीर) जो खत्म हो जाते हैं। और अक्षर का मतलब है अविनाशी, जिसे कूटस्थ (बदलाव न होने वाला) कहते हैं।
क्षर पुरुष (नाशवान): Bhagavat Gita यह वह तत्व है जो फिजिकल दुनिया में बदलता रहता है। इसमें सभी जीवों के शरीर (जन्म, बढ़ना, मरना) और पूरी दुनिया शामिल है।
अक्षर पुरुष (अविनाशी): यह वह तत्व है जो कभी खत्म नहीं होता। यह आत्मा है, जिसका शरीर बदलता रहता है फिर भी वह हमेशा रहती है। इसे कूटस्थ (अचल, स्थिर) भी कहा जाता है, क्योंकि यह फिजिकल बदलाव से अछूता रहता है।
श्लोक 17: पुरुषोत्तम – परम पुरुष
उत्तमः पुरुषस्त्वन्याः परमात्मेत्युदाहर्तः। यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्या ईश्वरः ॥17॥
अर्थ: लेकिन इन दोनों (खर और अक्षर) से भी श्रेष्ठ एक और पुरुष है, जिसे ईश्वर कहते हैं। वह अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों में प्रवेश करके उनका पालन-पोषण करता है।
उत्तम पुरुष: Bhagavat Gita यह तीसरा तत्व है, जो खशर (नाशवान शरीर) और अक्षर (अविनाशी प्राणी) दोनों से श्रेष्ठ है।
ईश्वर: इस महापुरुष को ईश्वर कहते हैं।
कार्य: परमात्मा अपने अविनाशी दिव्य रूप से इन तीनों लोकों (भूत, भविष्य, वर्तमान या स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) की रचना करता है, उसका आलिंगन करता है और उसका पालन-पोषण करता है। वह केवल देखने वाला ही नहीं, बल्कि सक्रिय नियंत्रक (ईश्वर) भी है।
रहस्य का रहस्योद्घाटन: यह श्लोक श्री कृष्ण के परम रूप का रहस्य उजागर करता है। श्री कृष्ण ही वह महापुरुष, ईश्वर हैं।
3.पुरुषोत्तम रूप की महिमा (श्लोक 18)

श्लोक 18:
यस्मात्क्षरमतितोहमाक्षरादपि चोत्तमः। अतोस्मि लोके वेदे च प्रथित पुरुषोत्तमः ॥18॥
अर्थ: क्योंकि मैं क्षर (नाशवान संसार) से पूरी तरह मुक्त हूँ, और अक्षर (अविनाशी आत्मा) से भी श्रेष्ठ हूँ, इसीलिए मैं लोगों में और वेदों में पुरुषोत्तम के नाम से प्रसिद्ध हूँ।
क्षरथी पर: Bhagavat Gita श्री कृष्ण भौतिक संसार और उसके विनाशकारी रूप के बंधनों से पूरी तरह मुक्त हैं।
अक्षरों से श्रेष्ठ: वे जीवात्मा (अक्षर) से भी श्रेष्ठ हैं, क्योंकि जीव माया के बंधन में पड़ जाते हैं, जबकि भगवान कभी माया से प्रभावित नहीं होते।
नाम का रहस्य: इस अंतर को स्पष्ट करने के कारण, श्री कृष्ण दुनिया में और वैदिक साहित्य में प्रसिद्ध हुए। ‘पुरुषोत्तम’ (सर्वश्रेष्ठ पुरुष) के रूप में जाने जाते हैं। यह श्लोक अध्याय के शीर्षक के साथ पूरा न्याय करता है।
4.पुरुषोत्तम को जानने का परिणाम (श्लोक 19-20)

Bhagavat Gita श्री कृष्ण अब इस परम ज्ञान का महत्व और इसे जानने के परिणाम बताते हैं।
श्लोक 19: सर्वज्ञ भक्त
यो मामेवं सम्मुधो जानाति पुरुषोत्तमम्। स सर्वविद्भाजति मा सर्वभावेन भारत ॥19॥
अर्थ: हे भारत (अर्जुन), जो आदमी इस तरह बिना मुहर के मुझे परम सत्ता के रूप में जानता है, वह सर्वज्ञ है। वह वहाँ है, और उसने मुझे पूरी भक्ति के साथ भेजा है।
असम्मुधा (बिना मुहर के): Bhagavat Gita जो इस भौतिक दुनिया को एक क्षणभंगुर पेड़ के रूप में और भगवान को परम सत्ता के रूप में देखता है। इस रूप में पहचाने जाने पर, वह आसक्ति से मुक्त हो जाता है।
सर्ववित (सर्वज्ञ): जो पुरुषोत्तम को जानता है, वही सच्चा सर्वज्ञ है। क्योंकि पुरुषोत्तम अक्षर और अक्षर दोनों की जड़ है, उसे जानने से तुम्हें पूरी सृष्टि का ज्ञान हो जाएगा। वह आ रही है।
सर्वज्ञ भक्ति: ऐसा सर्वज्ञ भक्त अपने पूरे अस्तित्व (मन, वाणी, शरीर, बुद्धि) से भगवान की पूजा करता है। समर्पण भेजा है और स्वीकार करता है।
श्लोक 20: सबसे गहरे शास्त्र का सार
इति गुह्यतम शास्त्रमिदमुक्तं मयंगः। एतद्द्वारा बुद्धवा बुद्धिमानीपूर्वककृत्याश्च भारत ॥20॥
अर्थ: हे पापी अर्जुन, मैंने तुम्हें यह सबसे गुप्त शास्त्र (रहस्यमय उपदेश) बताया है। हे भारत, इसे जानने से मनुष्य बुद्धिमान हो जाता है और उसके सभी कर्तव्य पूरे हो जाते हैं। (कलाकृतियाँ बनती हैं)।
गुह्यतम शास्त्र: Bhagavat Gita श्री कृष्ण इस ज्ञान को सबसे गूढ़ (गुह्यतम) कहते हैं, क्योंकि यह केवल बौद्धिक ज्ञान है। नहीं, बल्कि रूप का ज्ञान है जो केवल वैराग्य और भक्ति से ही प्राप्त होता है।
परिणाम: इस ज्ञान को हृदय में धारण करने से दो महान परिणाम मिलते हैं:
बुद्धिमान: मानव जीवन की वास्तविकता और शाश्वत सत्य को समझने से सच्ची बुद्धि प्राप्त होती है।
कृतकृत्य: उसके सारे काम पूरे हो गए हैं। मोक्ष सबसे बड़ा काम है, और एक बार यह मिल जाए, तो इंसान नेक इंसान बन जाता है। अब उसके पास पाने के लिए और कुछ नहीं बचता।

अंतिम संदेश: पूर्णता का मार्ग
Bhagavat Gita का 15वां अध्याय आत्म-ज्ञान और परमात्मा के रहस्य का निचोड़ है। वह समझाता है कि:
दुनिया झूठी है, लेकिन इसका मूल सत्य (भगवान) है।
जीवित आत्मा दिव्य है, लेकिन भ्रम से बंधी हुई है।
पुरुषोत्तम तीनों तत्वों (खर, अक्षर और परमात्मा) में सर्वोच्च है।
पुरुषोत्तम ज्ञान मुक्ति का सीधा दरवाज़ा है, जो सिर्फ़ विश्वास और भक्ति से ही खोला जा सकता है। इस ज्ञान से आसक्ति दूर होती है, बुद्धि स्थिर होती है और आत्मा पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त होकर अपनी हो जाती है। परमधाम पहुँचो।