Bhagavat Gita (भागवद गीता) :गीता के बारहवां अध्याय के श्लोक 11 से 20 तक का गहन विश्लेषण

परम भक्त के लक्षण: त्याग, ज्ञान और समता की पराकाष्ठा (गीता बारहवां अध्याय 11-20)

Bhagavat Gita के बारह अध्याय, ‘भक्तियोग’, भक्ति के अलग-अलग रास्तों और एक सच्चे भक्त के आदर्शों के बारे में बताते हैं। लक्षणों का वर्णन करते हैं। पिछले श्लोकों (12.1-10) में, श्री कृष्ण ने सगुण भक्ति की श्रेष्ठता और उन लोगों के लिए समझाया जो तुरंत अपने मन को स्थिर नहीं कर पाते। उन्होंने उनके लिए क्रमिक मार्ग (अभ्यासयोग और मत्कर्म-परम्) दिखाए।

Bhagavat Gita इन आखिरी दस श्लोकों (12.11-20) में, भगवान भक्ति के सबसे ऊँचे चरणों की व्याख्या करते हैं, जिसमें कर्म के फल भी शामिल हैं। त्याग को सबसे ज़रूरी माना गया है। इसके बाद, श्री कृष्ण एक आदर्श भक्त (प्रभक्त) के लक्षणों का विस्तार से वर्णन करते हैं, जिन्हें वे बहुत प्रिय (अतीव में प्रियः) मानते हैं। ये श्लोक व्यावहारिक जीवन में भक्ति और समानता को लागू करने के तरीके के बारे में मार्गदर्शन देते हैं।

भक्ति के सर्वोत्तम क्रम का रहस्य (श्लोक 11-12)

Bhagavat Gita भगवान भक्ति के क्रमिक चरणों को जारी रखते हैं और कर्म के फलों के त्याग को सबसे ऊँचा स्थान देते हैं।

श्लोक 11:

अथितदप्याष्टोऽसी कर्तुम मद्योगामश्रितः। सभी कर्मों का फल ततः कुरु यतात्मवान्। 11

अर्थ: अगर तुम मेरे इस योग का आश्रय लेकर भी (मेरे लिए) कर्म करने में सक्षम नहीं हो, तो संयमी बन जाओ। अपने सभी कर्मों के फलों का त्याग कर दो।

श्लोक 12:

श्रेयो हि ज्ञानम्भ्यासाज्ज्ञानद्ध्यानं विशिष्यते। ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागच्छंतिरंतरम् ॥ 12

अर्थ: (मेरे विचार से) पढ़ाई से ज्ञान श्रेष्ठ है। ज्ञान से ध्यान (पूजा) श्रेष्ठ है। और ध्यान करने से कर्मों के फलों का त्याग करना श्रेष्ठ है। त्याग से व्यक्ति को तुरंत परम शांति मिल जाती है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita स्टेप्स की पराकाष्ठा: श्लोक 11, श्लोक 10 में पहले बताए गए ‘मत्कर्म-परम’ रास्ते पर चलता है। इसमें ऑप्शन है। अगर कोई भक्त भगवान के लिए भी कोई काम नहीं कर सकता, तो उसे अपने काम के फल छोड़ देने चाहिए। यह बिना आसक्ति वाला काम है।

हिरार्की: श्लोक 12 में, भगवान आध्यात्मिक प्रैक्टिस के अलग-अलग लेवल की तुलना करते हैं, जो हैं: योग का सबसे ऊंचा क्रम माना जाता है: 1. पढ़ाई: बार-बार कोशिश करना (जैसे मन को स्थिर करना)। 2. ज्ञान (श्रेष्ठ): तत्त्वुन् ज्ञान मेल्वुन। 3. ध्यान (विशिष्यते): ज्ञान मिलने के बाद ब्रह्म का ध्यान करना। 4. कर्मफल त्याग (सर्वोच्च): बिना आसक्ति के कोई काम करना, उसके फल को छोड़ देना।

त्याग का नतीजा: भगवान यह साफ करते हैं कि कर्म (त्यागात) के त्याग का नतीजा तुरंत शांति (शांतिरनंतरम्) मिलता है। इससे पता चलता है कि आसक्ति का त्याग ही आध्यात्मिक शांति का मूल है।

दिव्य गुण: एक भक्त के आदर्श लक्षण (श्लोक 13-19)

Bhagavat Gita इन श्लोकों में भगवान ने उस भक्त के गुणों का वर्णन किया है जो आदर्श अवस्था को प्राप्त हो चुका है और जो उन्हें बहुत प्रिय है। ये गुण भक्ति और ज्ञान का समन्वय हैं।

सर्वव्यापक समता और करुणा (श्लोक 13-14):

अद्वैत सर्वभूतानां मित्रः करुण एव च। निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमि ll13 ll। संतोषः सनातम योगी यतात्मा, निश्चयः मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ll14 ll।

अर्थ: जो सभी प्राणियों से घृणा नहीं करता, मित्रवत और दयालु है, स्वार्थ और अहंकार से मुक्त है, जो सुख-दुःख में समान है, और क्षमाशील है; जो सदा संतुष्ट रहता है, योगी है, संयमी है, दृढ़ निश्चयी है, और जिसने अपने मन और बुद्धि को मुझमें प्रशिक्षित किया है। समर्पित कर दिया है – वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है।

चिंता से मुक्ति और पवित्रता (श्लोक 15-16):

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः। हर्षमर्षभयोद्वेगरमुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ 15 ॥ अनेकेक्षा शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः सर्वर्भमपरित्यागी यो मद्भक्तः समे प्रियः॥ 16

अर्थ: जो किसी भी जानवर को परेशान नहीं करता, और जो खुद किसी जानवर से परेशान नहीं होता। नहीं; जो भक्त खुशी, गुस्सा, डर और चिंता से मुक्त है, वह मुझे प्रिय है। जो उम्मीद से मुक्त, शुद्ध (शुचि), कुशल (दक्ष), वैराग्य से मुक्त (उदासिन) और दर्द से मुक्त है; और जो सभी कर्मों (स्वार्थी प्रयासों) की शुरुआत को छोड़ देता है – वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है।

समस्त विषयों में समता (श्लोक 17-19):

यह न हृष्यति न द्विसति, न सोचति, न काङ्क्षति है। भला, बुरा, भला, बुरा, भला, बुरा, भक्तिमय, प्रियतम, ॥ 17 ॥ समः शत्रु च मित्रे च तथा मनापमानयोः। शीतोशनसुखदुःखेषु समः संगविवर्जितः ॥ 18 ॥ तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तोनो येन केनचित्। अनिकेतः स्थिरमातिर्भक्तिमानमे प्रियो नरः। 19

अर्थ : जो हर्षित नहीं होता, द्वेष नहीं करता, शोक नहीं करता, कामना नहीं करता; जिस भक्त ने अच्छे और बुरे दोनों का त्याग कर दिया है, वह मुझे प्रिय है। जो शत्रु और मित्र के प्रति सम है, आदर और अपमान में भी समान है; वह सर्दी और गर्मी (शीतोष्ण), सुख और दुःख में सम है, और आसक्ति से मुक्त है। जो तारीफ़ और बुराई को एक जैसा समझता है, चुप रहता है, जो मिले उसी में खुश रहता है, दुनिया से कोई लगाव नहीं रखता। वह शांत दिमाग वाला और भक्त है – वह इंसान मुझे प्यारा है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita अंदरूनी गुणों का महत्व: भगवान भक्त के अंदरूनी गुणों पर ज़ोर देते हैं। सिर्फ़ बाहरी पूजा ही नहीं, बल्कि दोस्ती, दया, माफ़ी, संतोष और अहंकार से आज़ादी भी भक्त के लिए ज़रूरी हैं। लक्षण होते हैं।

समभाव की पराकाष्ठा: इन गुणों में समभाव सबसे ऊँचा है। भक्त दुश्मन-दोस्त, मान-अपमान, सुख-दुख, आलोचना-प्रशंसा जैसे झगड़ों में भी बराबर रहता है। यह अवस्था कर्म के फल का त्याग करने से ही मिलती है।

मन की अवस्था: यह भक्त अनपेक्षः, ततस्तत्, गतव्याथः होता है। वह किसी स्वार्थ से काम शुरू नहीं करता। उसका मन और बुद्धि सिर्फ़ भगवान को समर्पित होती है।

विश्वास और समर्पण: इन सभी विशेषताओं का मूल आधार ‘मयारिप्त मनोबुद्धि’ (मन और बुद्धि। ईश्वर के प्रति समर्पित) और ‘भक्तिमान’ (भक्ति से भरा हुआ) है।

भक्तियोग का अंतिम निष्कर्ष (श्लोक 20)

Bhagavat Gita बरमा अध्याय का अंतिम श्लोक संपूर्ण भक्ति का रहस्य बताता है।

श्लोक 20:

ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते। श्रद्धाधानं मत्परमा भक्तासतीव मे प्रिय: ॥ 20

अर्थ : परंतु, जो श्रद्धा से परिपूर्ण हैं और मुझे ही परम लक्ष्य मानते हैं, यहां धर्मरूपी अमृत की बात कही गई है। पूजते हैं – वे भक्त मुझे (अतीव में प्रियः) अति प्रिय हैं।

विश्लेषण: Bhagavat Gita धर्म्यामृतम्: यहां धर्मरूपी अमृत (धर्म्यामृतम्) शब्द का प्रयोग हुआ है, जो अध्याय में वर्णित सभी गुणों और भक्ति मार्गों की ओर संकेत करता है।

भक्ति का परम महत्व: भगवान स्पष्ट करते हैं कि जो साधक श्रद्धा (श्रद्धानाः) रखता है और परम लक्ष्य है, जो भक्त (मत्परमाः) की भावना से इन गुणों को अपने जीवन में धारण करते हैं, वे उन्हें अत्यंत प्रिय हैं।

श्रेष्ठता की पुनर्स्थापना: यह श्लोक बारामा अध्याय की शुरुआत में अर्जुन से पूछे गए सवाल का आखिरी जवाब है। सबसे अच्छा योगी वह है, जो इस धर्मामृत का पालन करके, शुद्ध भक्ति के साथ अपना सब कुछ भगवान को दे देता है।

निष्कर्ष

Bhagavat Gita के दूसरे चैप्टर (12.11-12.20) के ये आखिरी श्लोक सच्ची भक्ति का रास्ता पूरा करते हैं। इनका स्ट्रक्चर यह है:

त्याग की पराकाष्ठा: साधना के क्रम में कर्म के फल का त्याग सबसे ऊंचा माना जाता है। जगह देकर भगवान यह साबित करते हैं कि आसक्ति से मुक्ति ही परम शांति की चाबी है।

भक्त के आदर्श गुण: भगवान एक आदर्श भक्त (प्रभक्त) के गुणों के बारे में विस्तार से बताते हैं, जिसमें सभी जानवरों से नफ़रत न करना, दया, अहंकार से मुक्ति, माफ़ी और सभी झगड़ों में बराबरी शामिल है। चौथा और दसवां।

बराबरी और संतोष: भक्त का जीवन दुश्मन और दोस्त, सम्मान और अपमान, बुराई और तारीफ़ और सुख और दुख में बराबरी पर आधारित होता है। इसे संतोष के आधार पर बांटा गया है।

भक्ति का लक्ष्य: आखिर में, भगवान ज़ोर देकर कहते हैं कि जो भक्त इस धर्म के अमृत में विश्वास रखता है, जो इसकी आज्ञा मानता है, वह उन्हें बहुत प्रिय है और मोक्ष का हकदार है।

इस प्रकार, बारह अध्याय भक्तियोग को केवल पूजा तक सीमित नहीं रखते, इसे जीवन के हर पल में शामिल करना चाहिए। इसे समानता, त्याग और समर्पण के साथ जीने के एक व्यावहारिक तरीके के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

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