Bhagavat Gita (भागवद गीता) :गीता के बारहवां अध्याय के श्लोक 1 से 10 तक का गहन विश्लेषण

भक्ति का रहस्य: सगुण और निर्गुण की तुलना और भक्ति के चरण (गीता बारहवां अध्याय 1-10)

Bhagavat Gita का बारहवां अध्याय ‘भक्तियोग’ के नाम से जाना जाता है, जो पूरी गीता की शिक्षाओं का इमोशनल सारांश है। હૃદય છે. पिछले दसवें और ग्यारहवें अध्याय में, श्री कृष्ण ने अपनी ऐश्वर्य (विभूति) और विश्वरूप का वर्णन किया है। दर्शन देकर उन्होंने अपनी सर्वोच्च दिव्यता स्थापित की।

Bhagavat Gita इन श्लोकों (12.1-10) में, अर्जुन, सार्वभौमिक रूप को देखने के बाद, एक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछता है, जो हर साधक को पूछना चाहिए। मन में सवाल है: भगवान को पाने का सबसे अच्छा तरीका कौन सा है? इस सवाल का सही जवाब देकर, श्री कृष्ण सगुण भक्ति की श्रेष्ठता और मनुष्य की श्रेष्ठता स्थापित करते हैं। क्षमता के अनुसार भक्ति के क्रमिक चरण प्रस्तुत करते हैं।

अर्जुन का महत्वपूर्ण प्रश्न (श्लोक 1)

Bhagavat Gita अर्जुन के मन में जो बुनियादी दुविधा होती है, वह श्लोक 1 में बताई गई है।

श्लोक 1:

अर्जुन उवाच। और ये भक्त जो हमेशा पुण्यवान हैं। ये चाप्यक्षरम्अव्यक्तं तेषां के योगवित्तम: ॥ 1

अर्थ: अर्जुन ने कहा: जो भक्त लगातार आपसे जुड़े रहते हैं, वे आपके (सगुण) रूप की पूजा करते हैं। और जो अविनाशी और निराकार ब्रह्म की पूजा करते हैं, दोनों में से किसकी? क्या आप योग के एक्सपर्ट हैं?

विश्लेषण: Bhagavat Gita सगुण बनाम निर्गुण: अर्जुन यहाँ दो अलग-अलग रास्तों के बीच तुलना करना चाहता है: 1. त्वं पर्युपासते: भक्त जो भगवान के साकार (दिखाई देने वाले) रूप की पूजा करते हैं। 2. अक्षरम् अव्यक्तम्: ज्ञानी लोग निराकार, शाश्वत और अदृश्य (अनएक्सप्रेस्ड) ब्रह्म की पूजा करते हैं।

योगवित्तम: अर्जुन पूछते हैं कि इन दोनों में से ‘योग का सबसे अच्छा जानकार’ (सबसे अच्छा योगी) कौन है। यह सवाल भक्ति और ज्ञान के बीच श्रेष्ठता की चर्चा की शुरुआत है।

भगवान का साफ़ जवाब: सगुण भक्त सबसे अच्छा है (श्लोक 2-5)

Bhagavat Gita श्री कृष्ण अपने जवाब में साफ़ तौर पर सकार उपासना को सबसे अच्छा मानते हैं।

श्लोक 2:

श्री भगवान कहते हैं। मायवेश्य, यह माँ रोज़ पूजा करती है। श्रद्धया पर्योपेतस्ते मे युक्तात्मा माता: ॥ 2

अर्थ: श्री भगवान ने कहा: जिन्होंने मुझमें अपना मन लगा दिया है, वे लगातार मुझमें एक रहते हैं और परम गति को प्राप्त करते हैं। जो लोग पूरी श्रद्धा से मेरी पूजा करते हैं, मैं उन्हें सबसे अच्छा योगी (युक्ततमाः) मानता हूँ।

श्लोक 3-4:

ये त्वक्षरमंदिर्यम्व्यक्तम् पर्युपासते। सर्वत्रगमचिंत्यां च कूटस्थमाचलं ध्रुवं ll। 3॥ सन्नियेन्द्रियग्रामं सर्वत्र संबुद्धयाः। ते प्रापानुवंति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ 4

अर्थ: जो भी अक्षर (अविनाशी), अनिर्देश्य (जेक्स निद्रेशन न करी करें), अव्यक्त (अगोचर), सर्वव्यापी, अचिंत्य, कूटस्थ (अपरिवर्तनशील), अचल और ध्रुव (प्रतिदिन) ब्रह्म की पूजा करते हैं; सभी इंद्रियों को अच्छी तरह से नियंत्रित करके और हर जगह समता बनाए रखते हुए, और सभी प्राणियों की देखभाल करते हैं, वे भी मुझे प्राप्त होते हैं।

श्लोक 5:

क्लेशोद्धिकतारस्तेशामव्यक्तासक्तचेतसाम्। अव्यक्तता हि गतिर्दुखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ 5

अर्थ: लेकिन, अव्यक्त (निर्गुण) में आसक्त मन वालों (साधकों) के लिए क्लेश ज़्यादा होता है। क्योंकि निराकार गति (ब्रह्म का ज्ञान) शरीरधारी इंसानों को मुश्किल से मिलती है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita भक्ति की श्रेष्ठता: श्लोक 2 में, श्री कृष्ण साफ़-साफ़ कहते हैं कि जिस भक्त का मन उनमें लगा रहता है। जो लोग पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ उनकी पूजा करते हैं, वही सबसे अच्छा योगी (युक्तात्मा) है।

ज्ञान को स्वीकार करना: श्लोक 3-4 में, भगवान उन ज्ञानी लोगों को भी स्वीकार करते हैं जो निर्गुण ब्रह्म की पूजा करते हैं। हाँ, क्योंकि वे भी आखिर में उन्हें पा लेते हैं। यह गीता का मिला-जुला नज़रिया है।

अव्यक्त की कठिनाई: श्लोक 5 इस चर्चा का निर्णायक सिद्धांत है: निर्गुण उपासना कठिन है। मन को अगोचर और अचिन्त्य (निर्गुण) में स्थिर करना, देहधारियों के लिए किसी साकार (साकार) सहारे के बिना (देहवद्भिः) अत्यंत कष्टदायक है (कलेशोदिकतरः)। इससे भक्तियोग सर्वश्रेष्ठ मार्ग सिद्ध होता है।

भक्ति का आसान मार्ग (श्लोक 6-8)

Bhagavat Gita निर्गुण उपासना की कठिनाई समझाने के बाद अब श्री कृष्ण सगुण भक्तों को आश्वस्त करने वाला और आसान निर्देश देते हैं। रास्ता बताते हैं।

श्लोक 6-7:

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यास्य मत्परः। अनन्येनैव योगेन मा ध्यान्यन्त उपासते। 6॥ तेसामहम् शुद्धर्ता मृत्यु संसार सागर रात्रि। भवामि नचिरात्पर्था माय्यवेशित्चेत्सम् ॥ 7

अर्थ: लेकिन, जो लोग अपने सभी कर्मों को मुझे समर्पित करके, मुझे ही परम लक्ष्य मानकर, मेरा ध्यान और पूजन करके अनन्य भक्ति करते हैं; हे पार्थ! जिनके मन प्रसन्न हैं, मैं उन्हें बहुत जल्दी मृत्यु के संसार सागर से तार दूँगा।

विश्लेषण: Bhagavat Gita अनन्य भक्ति: यहाँ ‘अनन्य भक्ति’ पर जोर दिया गया है। भक्त अपने सभी कर्मों को भगवान को समर्पित करके उन्हें परम लक्ष्य (मत्प्राः) मानते हैं।

भगवान की प्रतिज्ञा: श्लोक 7 में भगवान बहुत जल्दी मोक्ष की प्रतिज्ञा लेते हैं। जैसे कोई डूबते हुए इंसान को जहाज से बचाता है, वैसे ही भगवान अपने भक्तों को जन्म-मृत्यु की दुनिया से बचाते हैं। भवसागर से इंसान खुद ही अपना उद्धार करने वाला बन जाता है। यही साकार पूजा का सबसे बड़ा आकर्षण और फायदा है।

श्लोक 8:

माययेव मन आधत्स्वा मयि बुद्धि निवेशाय। निवसिष्यसि माययेव अत उर्ध्वं न ससभाः ॥ 8

अर्थ: अपना मन मुझमें लगाओ, और अपनी बुद्धि भी मुझमें लगाओ। उसके बाद तुम मुझमें ही रहोगे। इसमें कोई शक नहीं है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita साधना का सीधा रास्ता: यह श्लोक सगुण भक्ति के लिए सबसे सीधा और आसान तरीका है। मन और बुद्धि दोनों को भगवान को समर्पित करना।

मन (मन आधत्स्वा): भावनाओं, इच्छाओं और विचारों का बहाव।

बुद्धि निवेशाय: फैसला लेने और समझदारी की ताकत।

मोक्ष का वादा: जब भक्त अपना मन और बुद्धि दोनों भगवान को सौंप देता है, तो वह भगवान में मुक्त हो जाता है। निवास (रहेगा) मिल जाता है, यानी मुक्ति मिल जाती है।

भक्ति के क्रमिक चरण (श्लोक 9-10)

Bhagavat Gita भगवान जानते हैं कि ज़्यादातर इंसानों के लिए तुरंत पूरा सरेंडर करना मुमकिन नहीं है। इसलिए, वे भक्ति के प्रैक्टिकल और धीरे-धीरे होने वाले रास्ते (चधियाता स्टेप्स) बताते हैं।

श्लोक 9:

अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोशी मयि स्थिरं। अभ्यास योगेन ततो ममिच्छप्तुन धनंजय ॥9

अर्थ: हे धनंजय! अगर तुम अपना मन मुझमें नहीं लगा पा रहे हो, तो पढ़ाई योग से मुझे पाने की कोशिश करो। कोई इच्छा करो।

श्लोक 10:

तुम अपनी प्रैक्टिस के सबसे अच्छे प्रैक्टिस करने वाले बनो। मदरथम्पि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ 10

अर्थ: अगर तुम पढ़ाई नहीं कर पा रहे हो, तो भी मेरे लिए काम करने वाले बनो। अगर तुम मेरे लिए अच्छे काम करोगे, तो तुम्हें सिद्धि (मुक्ति) मिलेगी।

विश्लेषण: Bhagavat Gita पहला स्टेप: अध्यायोग (श्लोक 9): अगर मन स्थिर न हो, तो बार-बार कोशिश करें। इसे स्टडी योग कहते हैं। रेगुलर मेडिटेशन, पूजा और याद से धीरे-धीरे मन को स्थिर करना।

दूसरा स्टेप: मत्कर्म-परम (श्लोक 10): अगर पढ़ाई भी न हो सके, तो दूसरा ऑप्शन है: मत्कर्म-परम (मेरा कर्म करने वाला बनना। यानी भगवान के प्रति सरेंडर की भावना से अपने कर्तव्य करना।

कर्म से मुक्ति: भगवान भरोसा दिलाते हैं कि सब कुछ भगवान के लिए किया जाए, न कि अपने फायदे के लिए। कर्म भी आखिर में प्राप्ति (मोक्ष) देता है। यहाँ कर्म योग भक्ति के साधन के रूप में दिखाई देता है।

निष्कर्ष

Bhagavat Gita के बारहवें अध्याय के ये पहले दस श्लोक भक्तियोग का सार प्रस्तुत करते हैं:

सगुण की श्रेष्ठता: श्री कृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं कि उनके साकार रूप की अनन्य भक्ति करने वाले योगी सर्वश्रेष्ठ (युक्ततमाः) हैं।

निर्गुण की कठिनाई: निराकार ब्रह्म की पूजा करना ज्ञानी लोगों के लिए उपयुक्त होने के बावजूद, यह जीवों के लिए बहुत कष्टदायक है।

मोक्ष का वादा: भगवान वादा करते हैं कि जो भक्त अपना मन और बुद्धि उन्हें सौंप देता है, वह बहुत जल्दी संसार सागर से मुक्त हो जाता है।

प्रैक्टिकल रास्ते: जो लोग जल्दी से मन को स्थिर कर सकते हैं, उनके लिए भगवान आगे बढ़ने के विकल्प देते हैं। नं:

अध्याययोग: नियमित प्रयास से मन को स्थिर करना।

मत्कर्म-परम: भगवान के लिए सभी कर्म करना।

ये दस श्लोक हर साधक को निरंतर भक्ति और समर्पण का रास्ता अपनाने के लिए प्रोत्साहित करेंगे। और भरोसा दिलाता है कि अगर भक्ति पूरी न भी हो, तो भी सच्चे मन से की गई कोशिशें ज़रूर कामयाबी दिलाएंगी।

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