Bhagavat Gita (भागवद गीता) :गीता के सातवां अध्याय के श्लोक 11 से 20 तक का गहन विश्लेषण

माया और चार प्रकार के भक्तों में अंतर (गीता सातवां अध्याय 11-20)

Bhagavat Gita का सातवां अध्याय, ‘ज्ञान-विज्ञान योग’, ज्ञान और अनुभव के ज़रिए असली सार को समझाता है। पहले 10 श्लोकों (सातवां अध्याय 1-10) में भगवान श्री कृष्ण ने अपने अपरा (बेजान) और परा (चेतन) स्वभाव के साथ-साथ दुनिया के बारे में भी बताया है। अपने हर जगह मौजूद होने के बारे में बताया है।

Bhagavat Gita अब, श्लोक 11 से 20 में कृष्ण समझाते हैं कि भले ही पूरी दुनिया उनकी शक्ति है, फिर भी इंसान उन पर विश्वास क्यों करे? जान नहीं सकता। इन श्लोकों में तीन तरह के भ्रम के पर्दे, भक्ति न करने वाले लोगों और भगवान की पूजा करने वाली चार तरह की आत्माओं के बारे में बताया गया है। डिटेल्स दी गई हैं।

तीन गुना प्रेम का बंधन (श्लोक 11-14)

Bhagavat Gita भगवान बताते हैं कि दुनिया इन तीन गुणों – सत्व, रजस और तमस् – से बनी है, भले ही यह उनकी शक्ति है, गुण उन्हें बांध नहीं सकते।

श्लोक 11:

बलं बलवतमस्मि कामराग्विवर्जितम्। धर्मविरुद्धो भूतेषु कामोसमि भारतर्षभ 11

अर्थ: हे भारत श्रेष्ठ! मैं बलवानों में इच्छा और आसक्ति रहित बल हूँ, और पशुओं में धर्म के विरुद्ध न होने वाला काम (इच्छा) हूँ।

विश्लेषण: Bhagavat Gita श्लोक 10 में भगवान को सबका बीज कहने के बाद, यहाँ कृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि वह केवल सकारात्मक शक्तियों में ही हैं। जो शक्ति इच्छा और आसक्ति रहित है, वह भगवान का रूप है। इसी प्रकार, जो इच्छा (काम) धर्म और नियमों के विरुद्ध नहीं है (दा.त., संतान प्राप्ति की इच्छा), वह भी भगवान का रूप है।

श्लोक 12:

ये चैव सात्विक भाव रजसस्तं सश्च ये। मत् एवेति तन्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥ 12

अर्थ: जिन सभी में सत्वगुणी, रजोगुणी और तमोगुणी भावनाएँ (सृष्टि की वस्तुएँ) हैं, वे सभी मुझसे हैं। तुम जानते हो कि मैं पैदा हुआ हूँ। लेकिन, मैं उनमें नहीं हूँ और वे मुझमें हैं।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक भगवद गीता के सबसे गहरे आध्यात्मिक सत्यों में से एक है।

भगवान सर्वव्यापी हैं: चूँकि दुनिया की हर चीज़ (अच्छे गुण) भगवान ने बनाई है, इसलिए वे सभी भगवान में हैं।

वैराग्य: हालाँकि भगवान उन गुणों के विकारों से मुक्त हैं, इसलिए मैं उनमें नहीं हूँ (न त्वाहं तेषु)। यह भगवद गीता का अकल्पनीय अलगाव का सिद्धांत है: भगवान दुनिया में होते हुए भी दुनिया से परे हैं।

श्लोक 13:

त्रिभिर्गुणमयैर्भवैरेभिः सर्वमिदं जगत्। मोहितं न जानाति मामेभ्यः परमव्यायाम् ॥13

अर्थ: यह सारा संसार तीन गुणों के एहसास से मोहित है, इसलिए इसे मुझे इन गुणों से ऊपर और अविनाशी जानना चाहिए। नहीं कर सकता।

श्लोक 14:

दिव्य ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्य। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेता तरन्ति ते ॥ 14

अर्थ: बेशक यह दिव्य (दिव्य) गुणमयी मेरी माया दुस्तर (जीतने में मुश्किल) है। लेकिन जो लोग सिर्फ़ मेरी शरण में आते हैं, वही इस भ्रम से बच जाते हैं।

विश्लेषण: Bhagavat Gita लगाव का कारण: गुणों में उलझी आत्मा भगवान को नहीं जान सकती, क्योंकि गुणों के कारण इंसान की नज़र सिर्फ़ कुछ समय की और भौतिक चीज़ों तक ही सीमित रहती है।

माया का अंतर: माया भगवान की शक्ति है, इसलिए इसे दिव्य कहा जाता है। वह दुरत्या (जीतना मुश्किल) है।

माया से पार पाने का तरीका: बुद्धि की गर्मी से नहीं, बल्कि सिर्फ़ माया के आगे सरेंडर करके (मामेव ये प्रपद्यन्ते) ही पार किया जा सकता है। यह श्लोक भक्ति को मोक्ष का सबसे आसान और सीधा रास्ता बताता है।

अभक्त और बुरे काम करने वाले (श्लोक 15)

Bhagavat Gita जो लोग माया के बंधन में फंसकर भगवान के आगे सरेंडर नहीं करते, उनके बारे में यहाँ बताया गया है।

श्लोक 15:

न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमः। मायापहृतज्ञानां असुरं भवमाश्रिताः ॥ 15

अर्थ: दुष्ट, मूर्ख, इंसानों में नीच और जिसका ज्ञान माया से हार गया हो। राक्षसी इरादे वाले लोग मेरे आगे सरेंडर नहीं करते।

विश्लेषण: Bhagavat Gita जो लोग भ्रम का पर्दा नहीं तोड़ पाते, उनके चार गुण बताए गए हैं:

दुष्ट (बुरा काम करने वाला): जिनके कर्म बुरे होते हैं।

मूधाः (मूधः): जो खुद को जानने से दूर रहता है।

नाराधमाः (इंसानों में नीच): जो इंसानी जन्म का इस्तेमाल आध्यात्मिकता के लिए नहीं करते।

मायायपहृतज्ञानाः (माया द्वारा ज्ञान छीन लिया गया): जिनका ज्ञान माया ने छीन लिया है (जो मानते हैं कि भगवान का कोई रूप नहीं है या वह बस एक आम इंसान थे)।

चार प्रकार के भक्तों और बुद्धिमानों की श्रेष्ठता (श्लोक 16-19)

Bhagavat Gita इसके उलट, यहाँ भगवान की पूजा और समर्पण करने वाले चार तरह के लोगों के बारे में बताया गया है।

श्लोक 16:

चतुर्विधा भजनते मां जनाः सुकृतिनोऽअर्जुन। आर्तो जिज्ञासुरार्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभा ॥ 16

अर्थ: हे अर्जुन! चार तरह के नेक इंसान मेरी पूजा करते हैं: आर्त (दुख उठाने वाला), जिज्ञासु (जिज्ञासु), अर्थार्थी (धन की इच्छा रखने वाला) और ज्ञानी।

विश्लेषण: Bhagavat Gita भक्ति के कारणों के आधार पर चार तरह के भक्त:

मतलब: जो परेशान है (दा.त., द्रौपदी, गजेंद्र)।

मतलब: जो भौतिक धन और सुख चाहता है (दा.त., ध्रुव महाराज)।

जिज्ञासु: जो भगवान के रूप को जानना चाहता है।

ज्ञानी: जो भगवान को असल में जानता है और सिर्फ़ सच्चे प्यार से उनकी पूजा करता है।

श्लोक 17:

तेषां ज्ञानी नित्यायुक्त एकभक्तिर्विशिष्ठते। प्रियतम, यह मेरे प्रियतम का ज्ञान है। 17

अर्थ: सबमें वह ज्ञानी भक्त विशेष माना जाता है जो हमेशा योग में लगा रहता है और सिर्फ़ भक्ति रखता है। क्योंकि मैं ज्ञानी को बहुत प्रिय हूँ और वह मुझे प्रिय है।

श्लोक 18:

उदारः सर्व एवैते ज्ञानी त्वत्मैव मे मतम्। अस्तिहः सह युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥ 18

अर्थ: वे सभी (चारों प्रकार के भक्त) उदार हैं, लेकिन मेरा मत है कि सिर्फ़ मेरी आत्मा ही ज्ञानी है। क्योंकि उसका मन स्थिर है और वह मुझे ही अंतिम लक्ष्य (सर्वोच्च लक्ष्य) मानता है।

श्लोक 19:

बहू जन्म नाम ज्ञान ज्ञान ज्ञान प्रपद्यते। वासुदेव: सर्वमिति सा महात्मा सुदुर्लभ: ॥ 19

अर्थ: कई जन्मों के बाद, कोई ज्ञानी व्यक्ति ‘बधु ही वासुदेव है’ इस तरह मेरी शरण में आता है। तेवो महात्मा बहुत दुर्लभ है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita ज्ञानी का वर्चस्व: श्लोक 17-18 में ज्ञानी भक्त को सबसे अच्छा माना गया है। बाकी तीन तरह के भक्त बदले में कुछ चाहते हैं, जबकि ज्ञानी निस्वार्थ प्रेम से पूजा करता है। इसलिए वह भगवान को अपनी आत्मा (आत्मैव) जितना ही प्रिय है।

परम समर्पण: भक्ति और ज्ञान की पराकाष्ठा श्लोक 19 में दिखाई गई है: ‘वासुदेव: सर्वं इति’ (बधु ही भगवान वासुदेव हैं)। यह अनुभव कई जन्मों की साधना के बाद मिलता है, और ऐसा महात्मा वाकई बहुत दुर्लभ है।

दूसरे देवताओं की पूजा करने का मकसद (श्लोक 20)

Bhagavat Gita भगवान बताते हैं कि अगर सब कुछ वासुदेव है, तो बहुत से लोग दूसरे देवताओं की पूजा क्यों करते हैं।

श्लोक 20:

कामस्तायस्तायरहरतज्ञानाः प्रपद्यांतेऽन्यदेवताः। तं तं नियमस्थाय प्रकृत्या नियतः स्वयं। 20

अर्थ: अलग-अलग इच्छाओं से हारे हुए इंसानों का ज्ञान, वे अपने स्वभाव से प्रेरित होते हैं। वे नियमों का पालन करते हैं और दूसरे देवताओं के प्रति समर्पित हो जाते हैं।

विश्लेषण: Bhagavat Gita दूसरे देवताओं की पूजा करने का मुख्य कारण वासना (अलग-अलग इच्छाएँ) है। ये इच्छाएँ इंसान के ज्ञान को ढक लेती हैं। इसके अलावा, वे लोग अपने स्वभाव और कर्म के अनुसार अलग-अलग देवताओं के नियमों का पालन करते हैं, क्योंकि वे जल्दी परिणाम चाहते हैं।

निष्कर्ष

Bhagavat Gita के सातवें अध्याय (7.11-7.20) के ये श्लोक स्पिरिचुअल रास्ते की मुश्किलों और उनके हल बताते हैं:

त्रिगुणी माया: यह दुनिया गुणों से बनी है, जो जीव को मोहित करती है। इसे सिर्फ़ भगवान के आगे सरेंडर करके ही पार किया जा सकता है।

भक्त न होने वालों की खासियतें: जो लोग बुरे कामों, अज्ञानता और राक्षसी भावनाओं में डूबे रहते हैं, वे भगवान के आगे सरेंडर नहीं करते।

चार तरह के भक्त: अर्थ, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी – ये सभी भगवान के भक्त हैं, लेकिन ज्ञानी भक्त सबसे अच्छे होते हैं।

परम ज्ञान: कई जन्मों के बाद, ज्ञानी भक्त ‘वासुदेवः सर्वम्’ का अनुभव करके मोक्ष पाता है।

दूसरे भगवान: दूसरे भगवानों की पूजा का मूल कारण भौतिक इच्छाएँ हैं, जिनकी वजह से ज्ञान हार जाता है।

इस तरह, कृष्ण भक्ति और बिना स्वार्थ के ज्ञान के ज़रिए परम तत्व को जानने का एकमात्र तरीका बताते हैं।

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