Bhagavat Gita (भागवद गीता) :गीता के सातवां अध्याय के श्लोक 1 से 10 तक का गहन विश्लेषण

ज्ञान-विज्ञान योग: परम तत्व की पहचान (गीता सातवां अध्याय 1-10)

Bhagavat Gita का सातवां अध्याय, ‘ज्ञान-विज्ञान योग’, ज्ञान और अनुभव (विज्ञान) के ज़रिए भगवान की सबसे बड़ी शक्ति पाने के बारे में है। इसमें रूप को समझने का एक तरीका है। छठे चैप्टर के आखिर में, भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि भक्ति से इंसान उनमें स्थिर हो जाता है। योगी सबसे अच्छा है।

Bhagavat Gita इस अध्याय के शुरुआती श्लोकों ( सातवां अध्याय 1-10) में, कृष्ण अपनी सबसे बड़ी महिमा, अपने दिव्य स्वरूप (शक्ति) के बारे में बात करते हैं। और दुनिया में अपने हर जगह मौजूद होने का रहस्य समझाते हैं। इन श्लोकों के ज़रिए, भगवान अपने सगुण और निर्गुण दोनों रूपों की नींव रखते हैं।

ज्ञान और भक्ति की गरिमा (श्लोक 1-3)

Bhagavat Gita भगवान कृष्ण शुरू में ही कहते हैं कि अब वे ऐसा ज्ञान देंगे, जिसे जानने के बाद दुनिया में कोई और नहीं जान पाएगा। जानने के लिए कुछ भी नहीं बचेगा।

श्लोक 1:

श्री भगवान कहते हैं। मय्यसक्तमनः पार्थ योगं युंजन मदाश्रयः। अनसंश्यम् समग्रं मा यता ज्ञास्यसी तच्छृनु ॥ 1

अर्थ: श्री भगवान ने कहा: हे पार्थ! तुम मुझमें मन लगाकर और मेरी शरण में आकर, बिना किसी संदेह के, पूरी तरह योग का अभ्यास करो। जिस तरह से तुम मुझे जानते हो, उसी तरह मेरी बात सुनो।

श्लोक 2:

ज्ञानं तेहं सविज्ञानामिदं वक्ष्यम्यशेषतः। यज्ज्यत्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्यत्वमवशिष्यते ॥ 2

अर्थ: मैं तुम्हें इस ज्ञान (शास्त्रीय) और विज्ञान (अनुभावजन्य) सहित पूर्ण रूप से बताऊंगा, जिसे जानने के बाद इस संसार में जानने योग्य और कुछ नहीं बचता।

श्लोक 3:

मनुषाणां सहस्रेषु कश्चिद्यताति सिद्धये। यतामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्तवाह ॥ 3

अर्थ: हजारों मनुष्यों में से कोई एक ही सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है। और जिन लोगों ने प्रयत्न करके सिद्धि प्राप्त कर ली है, उनमें भी बहुत कम लोग मुझे यथार्थ रूप में जानते हैं।

विश्लेषण: Bhagavat Gita पूरे ज्ञान का रास्ता: भगवान यह साफ़ करते हैं कि उन्हें जानने का रास्ता भक्ति से शुरू होता है। छे – मैय्यासक्तमानः (मन मुझसे जुड़ा हुआ)। सिर्फ़ भक्ति से ही पूरा (समग्राम) और बिना शक वाला ज्ञान मिल सकता है।

ज्ञान और विज्ञान: ज्ञान का मतलब है भगवान के बारे में क्लासिकल ज्ञान, और विज्ञान का मतलब है उसका सीधा अनुभव। कृष्ण ये दोनों ज्ञान देने का वादा करते हैं।

दुर्लभता: तीसरा श्लोक सच की खोज की दुर्लभता को दिखाता है। हज़ारों लोगों में से कुछ ही कोशिश करते हैं, और उनमें से भी कुछ ही सही मायने में भगवान को (पूरा सच) पाते हैं।

भगवान के दो स्वरूप: अपरा और परा (श्लोक 4-6)

Bhagavat Gita भगवान अब अपनी शक्ति के दो मुख्य भाग बताते हैं, जिनसे पूरा ब्रह्मांड बना है।

श्लोक 4:

भूमिरापोळललो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहंकार आदि स्वभाव में भिन्न हैं। 4

अर्थ: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार – मेरा यह स्वभाव (शक्ति) इन आठ रूपों में साझा है।

श्लोक 5:

परं इन अपरयामितस्त्वन्यं प्रकृति विद्धि। जीवभूतं महाबाहो येयेदं धार्यते जगत् ॥ 5

अर्थ: हे महापुरुष! यह (ऊपर वर्णित) हीन (निम्न) प्रकृति है। आप इससे भिन्न मेरी उच्च (ऊँची) प्रकृति को जानते हैं, जो जीवों का रूप है और जिससे यह संपूर्ण जगत् टिका हुआ है। ऐसा होता है।

श्लोक 6:

एतद्योनिनी भूतानि सर्वाणित्युपधारय। अहं कृत्सनस्य जगततः प्रभावः प्रलयस्था ॥ 6

अर्थ: आप निश्चयपूर्वक जानते हैं कि सभी प्राणियों की उत्पत्ति ये दो प्रकृतियाँ हैं। और मैं ही इस संपूर्ण जगत् की उत्पत्ति और विनाश हूँ।

विश्लेषण: Bhagavat Gita अपरा प्रकृति (जड़ शक्ति): श्लोक 4 में, आठ भौतिक तत्वों का समूह जड़ प्रकृति है। इससे भौतिक दुनिया बनती है।

परा प्रकृति (चेतन शक्ति): श्लोक 5 में यह जीवित प्राणियों (जीवों के समुदाय) की शक्ति है। यह सचेत शक्ति दुनिया को बनाए रखने के लिए बेजान प्रकृति का इस्तेमाल करती है।

भगवान का असली रूप: श्लोक 6 में, कृष्ण कहते हैं कि इन दो शक्तियों के मेल से ही सभी जीवित प्राणी बनते हैं। पैदा होते हैं। इस तरह, वह खुद ही इस पूरी दुनिया के बनने और खत्म होने का कारण हैं।

सर्वव्यापकता: दुनिया में परमेश्वर का निवास (श्लोक 7-10)

Bhagavat Gita भगवान अब साबित करते हैं कि वे न केवल दुनिया के बनाने वाले हैं, बल्कि दुनिया की हर चीज़ में मौजूद हैं।

श्लोक 7:

मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय। मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्र मणिगणा इव ॥ 7

अर्थ: हे धनंजय! मुझसे बेहतर कोई दूसरा तत्व नहीं है। यह पूरी दुनिया मेरे अंदर मोतियों की तरह पिरोई हुई है।

श्लोक 8:

रसोऽहम्प्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्योः। प्रणव: सर्ववेदेषु शब्द: खे पौरुषं नृषु ॥ 8

अर्थ: हे कौन्तेय! मैं जल में रस (स्वाद) हूँ, मैं चंद्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, मैं सभी वेदों में प्रणव (ૐ) हूँ, आकाश में मैं शब्द हूँ, और मनुष्यों में मैं पुरुष शक्ति हूँ।

श्लोक 9:

गुणो गंध: पूर्वावर्तिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ। जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥ 9

अर्थ: पृथ्वी में मैं पवित्र सुगंध हूँ, अग्नि में मैं तेज हूँ, सभी पशुओं में मैं जीवन हूँ, और तपस्वियों में मैं तपस्वी हूँ।

श्लोक 10:

बीजन मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्। बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥ 10

अर्थ: हे पार्थ! तुम मुझे सभी जानवरों का सनातन बीज जानो। मैं बुद्धिमान लोगों में बुद्धि और तेज लोगों में तेज हूँ।

विश्लेषण: Bhagavat Gita सूत्र में मोती: श्लोक 7 भगवान के हर जगह होने का सबसे अच्छा उदाहरण देता है: दुनिया में हर इंसान भले ही अलग-अलग चीजें हों, उन्हें एक ही सोर्स (भगवान) एक साथ जोड़े रखता है।

विभूति योग की नींव: श्लोक 8, 9 और 10 में बाद में बताए गए विभूति योग की नींव रखी गई है (अध्याय 10)। છે. कृष्ण यहाँ घोषणा करते हैं कि मैं खुद हर चीज़ का सबसे बड़ा और ज़रूरी सार हूँ। मैं हूँ। जैसे, पानी में स्वाद, सूरज में रोशनी, वेदों में ज्ञान, और इंसानों में बुद्धि और शक्ति।

निष्कर्ष

Bhagavat Gita के सातवें चैप्टर के ये पहले 10 श्लोक आखिरी सच को समझने के लिए एक साफ़ फ्रेमवर्क देते हैं।

शुरुआती शर्त: विश्वास, लगाव और भक्ति का सहारा लेकर भगवान को पूरी तरह से जानना ज़रूरी है।

भगवान की शक्ति: दुनिया दो शक्तियों से बनी है: अपरा (बेजान) और परा (चेतन)।

सबकी शुरुआत: भगवान इन दोनों नेचर की शुरुआत हैं, और वही पूरी दुनिया की शुरुआत और अंत भी हैं।

सब कुछ मौजूद होना: भगवान दुनिया की हर चीज़ का ज़रूरी गुण हैं।

इस ज्ञान को पाकर साधक शक से आज़ाद हो सकता है और हर जगह मौजूद सुप्रीम बीइंग को पहचान सकता है।

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