
अधूरे योग की यात्रा: योगभ्रष्ट और परम योगी (गीता के छठा अध्याय 37-47)
Bhagavat Gita के छठे अध्याय के आखिरी हिस्से ‘ध्यान योग’ में, भगवान श्री कृष्ण जीवन के सबसे महान व्यक्ति हैं। इनमें से एक सवाल का जवाब देते हैं: अगर कोई साधक योग के रास्ते से भटक जाता है या सफलता पाने से पहले ही मर जाता है, तो उसका क्या होगा?
Bhagavat Gita श्लोक 37 से 47 में, अर्जुन के इस गहरे शक का हल किया गया है। कृष्ण योग भृष्टा की फायदेमंद तरक्की, उसके अगले जन्म की तरक्की और आखिर में, सबसे अच्छे योगी के गुणों के बारे में बताकर इस चैप्टर को खत्म करते हैं।
अर्जुन का आखिरी शक: योग से भ्रष्ट व्यक्ति का क्या होगा? (श्लोक 37-39)

Bhagavat Gita मन की चंचलता के बारे में अर्जुन का जवाब (श्लोक 6.36), फिर डर में योग करने की सुरक्षा के बारे में सवाल पूछ रहा है।
श्लोक 37:
अर्जुन उवाच। अयतिः श्रद्धायोपेतो योगच्छालितमानसः। अप्राप्य योगसंसिद्धि की गति, कृष्ण गच्छति। 37 ॥
अर्थ: अर्जुन ने कहा: हे कृष्ण! जो व्यक्ति श्रद्धा से कोशिश करता है, लेकिन अपने मन पर काबू न होने के कारण योग के रास्ते से भटक जाता है, और योग की प्राप्ति नहीं कर पाता, उसे कौन सी गति मिलती है?
श्लोक 38:
काचिन्नोभयविभ्रष्टश्चिन्नं इव नश्यति। अपकीर्ति, महाबाहु, मूर्ख ब्राह्मण: पथि। 38 ॥
अर्थ: हे महापुरुष! जो मनुष्य ब्रह्म प्राप्ति के मार्ग पर मूर्ख और आश्रयहीन हो गए हैं, क्या वे बिखरे हुए बादलों के समान दोनों ओर से (भौतिक सुख और आध्यात्मिक प्राप्ति) भ्रष्ट होकर नष्ट नहीं हो जाते?
श्लोक 39:
कृष्ण के हृदय में संदेह है। त्वदन्य: कृष्ण के हृदय में संदेह है, लेकिन वे संदेह में नहीं हैं।39॥
अर्थ: कृष्ण का! मेरे इस संदेह को केवल आप ही पूर्ण रूप से दूर करने में समर्थ हैं क्योंकि आपके अलावा, इस संदेह को दूर करने वाला कोई और नहीं है।
विश्लेषण: Bhagavat Gita अर्जुन का यह सवाल बहुत प्रैक्टिकल है। वह पूछता है कि जो साधक लगन से शुरू करता है, लेकिन मन की चंचलता या मौत की वजह से अधूरा रह जाता है, उसकी क्या गति है? क्या उसे लगता है कि वह इस दुनिया का सुख और परलोक का मोक्ष दोनों खो रहा है, जैसे कोई बादल छंट रहा हो? अस्तित्व खत्म हो जाता है?

योगभ्रष्ट की लाभकारी गति (श्लोक 40-45)
भगवान कृष्ण ने अर्जुन को भरोसा दिलाते हुए योगभ्रष्ट की दो तरह की शुभ गतियों के बारे में बताया है, जो कर्म योग और पुनर्जन्म के सिद्धांत पर आधारित हैं।
श्लोक 40:
श्री भगवान कहते हैं। पार्थ नैवेः नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते। न कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तत् गच्छति ॥40 ॥
अर्थ: श्री भगवान ने कहा: हे पार्थ! यह न तो इस लोक में नष्ट होता है और न ही परलोक में। हे पिता! कोई भी मनुष्य जो अच्छे कर्म करता है, उसे दुर्भाग्य नहीं मिलता।
विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक योगी के लिए एक बड़ा भरोसा है। योग की पढ़ाई कभी नाकाम नहीं होती। यह किसी भी तरह से नष्ट नहीं होती – शारीरिक या आध्यात्मिक। योग में की गई कोशिशें कभी बेकार नहीं जातीं।
श्लोक 41:
पुराप्य पुण्यकृतं लोकानुशित्व शाश्वतिः समाह शुचिनं श्रीमत् गेहे योगभ्रष्टोभिजायते ॥ 41 ॥
अर्थ: योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति पुण्यवान लोगों के लोक को प्राप्त करता है और वहाँ कई वर्षों तक निवास करता है। ऐसा करने के बाद, वह शुद्ध आचरण वाले धनी लोगों के परिवार में जन्म लेता है।

श्लोक 42:
या योगिनामेव कुले भवति धीमताम्। एतद्धि दुर्लभतर लोके जन्म यदिदृशम् ॥42 ॥
अर्थ: या फिर, वह बुद्धिमान योगियों के परिवार में जन्म लेता है। इस दुनिया में ऐसा जन्म मिलना बहुत दुर्लभ है।
विश्लेषण: Bhagavat Gita योगभ्रष्ट के दो शुभ जन्म:
शुचि (शुद्ध) और श्रीमान (धनवान) के घर में: यहाँ उसे शारीरिक सुख और धर्म का माहौल मिलता है, ताकि वह शांति से योग की पढ़ाई फिर से शुरू कर सके।
बुद्धिमान योगियों के परिवार में: यह जन्म सबसे अच्छा होता है, क्योंकि इसमें बचपन से ही आध्यात्मिक संस्कार दिए गए होते हैं। और मार्गदर्शन मिलता है, जो बहुत दुर्लभ है।
श्लोक 43:
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौरवदैहिकम् । यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥43 ॥
अर्थ: हे कुरुनन्दन! वहाँ वह अपने पिछले शरीर में मिले बुद्धि (पूर्व संस्कार) का मेल पाता है और फिर से पाने की कोशिश करता है।
श्लोक 44:
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोपि सः। जिज्ञासुरापि योगस्य शब्दब्रह्मतिवर्तते ॥44 ।
अर्थ: उसी पिछले अध्ययन से, भले ही वह अनिच्छुक हो, फिर भी आकर्षित होता है। योग के बारे में जिज्ञासु होने से, व्यक्ति शास्त्रों के ज्ञान की सीमाओं को पार कर जाता है।
विश्लेषण: Bhagavat Gita ये श्लोक कर्मयोग के अविनाशी फल का रहस्य हैं। योग के माध्यम से प्राप्त बुद्धिसंयोग (बौद्धिक और आध्यात्मिक पवित्रता) पुनर्जन्म में भी नष्ट हो जाता है। पमात्ये। योग से भ्रष्ट व्यक्ति अपने पिछले संस्कारों की ताकत के कारण अपने आप योग की ओर आकर्षित हो जाता है, और उसकी प्रगति वहीं से शुरू होती है जहाँ वह अधूरी थी।
श्लोक 45:
प्रयत्नयाद्यतमनस्तु योगी संशुद्धकिलभिषः। अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परान् गतिम् ॥45॥
अर्थ: लेकिन जो योगी लगन से योग करने की आदत रखता है, उसके पाप (दोष) पूरी तरह धुल जाते हैं। और वह कई जन्मों की सिद्धि से अंतिम लक्ष्य (मोक्ष) को प्राप्त करता है।

परम योगी और अध्याय का सार (श्लोक 46-47)
Bhagavat Gita अध्याय के आखिर में, कृष्ण योगी की श्रेष्ठता बताते हैं और ध्यान योग में भक्ति के महत्व पर ज़ोर देते हैं। चलिए इसे रखते हैं।
श्लोक 46:
तपस्विभ्योधिको योगी ज्ञानब्योअपि मतोधिखा। कर्मिभ्याश्चधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन। 46 ॥
अर्थ: योगी तपस्या करने वालों से बेहतर है, ज्ञानियों से बेहतर माना जाता है और तपस्या करने वालों से भी बेहतर माना जाता है। वह कर्म करने वालों से बेहतर है। इसलिए हे अर्जुन! तुम योगी थे।
विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक योगी की महानता को स्थापित करता है। यहाँ ‘ज्ञानी’ वह है जिसे शास्त्रों का सूखा ज्ञान है, ‘तपस्वी’ वह है जो कष्ट सहता है, और ‘कर्मी’ वह है जो फल चाहता है। कर्म करने वाले को दिखाता है। एक योगी ध्यान और समता के ज़रिए इन सबसे ऊपर उठ जाता है।
श्लोक 47:
योगिनामपि सर्वेषा मद्गतेनांतरात्मन। श्रद्धावानभजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥ 47 ॥
अर्थ: और सभी योगियों में, जो मुझ पर भरोसा रखता है और जिसका मन मुझमें लगा रहता है (मद्गतेनांतरात्मन)। जो मेरी पूजा करता है, मैं उसे परम योगी (सबसे अच्छा योगी) मानता हूं।
विश्लेषण: Bhagavat Gita यह छठे अध्याय का आखिरी और सबसे अच्छा श्लोक है। यह ध्यान योग और भक्ति योग का तालमेल बिठाता है।
श्रेष्ठता: सभी योगियों में वह सबसे अच्छा है, जो ध्यान का इस्तेमाल सिर्फ आत्म-साक्षात्कार के लिए करता है। इसके लिए नहीं, बल्कि मन को भगवान (कृष्ण) में लगाने के लिए।
भक्ति की श्रेष्ठता: विश्वास और भगवान के प्रति समर्पित मन (मद्गताने) ही सबसे बड़े और सबसे शक्तिशाली गुण हैं। यह श्लोक भक्ति योग को बाकी सभी योगों (कर्म, ज्ञान, ध्यान) से ऊपर रखता है, और आगे के अध्यायों की नींव रखता है।

निष्कर्ष
Bhagavat Gita के छठे अध्याय (6.37-6.47) के आखिरी श्लोक जीवन और मुक्ति से जुड़े सभी शक दूर करते हैं। संकल्प:
असफलता का डर दूर करें: योग में की गई कोशिशें कभी बेकार नहीं जातीं। जो लोग योग में भ्रष्ट हैं, वे भी अगले जन्म में शुभ और अनुकूल हालात पाकर अपनी साधना को आगे बढ़ा सकते हैं। अध्याय
संस्कारों की ताकत: पिछले जन्मों के आध्यात्मिक संस्कार (बुद्धिसयोग) इतने शक्तिशाली होते हैं कि न चाहते हुए भी, वे आत्मा को योग के रास्ते की ओर वापस खींच लेते हैं।
योगी की श्रेष्ठता: योगी तपस्वियों, ज्ञानियों और सकाम कर्म करने वालों से श्रेष्ठ होता है।
सबसे अच्छा लक्ष्य: ध्यान योग तभी पूरा होता है जब वह भक्ति से भरा हो। जो योगी विश्वास के साथ अपने विवेक को ईश्वर में स्थापित करता है, वही परम योगी है।
इस तरह, भगवान कृष्ण अर्जुन को भरोसा दिलाते हैं कि अगर वह एक क्षत्रिय के तौर पर भी अपना कर्तव्य (युद्ध) करता है, अगर वह अपना काम बिना किसी स्वार्थ और भक्ति के साथ करता है, तो वह सबसे अच्छे योगी का दर्जा पाएगा।