
कर्म और संन्यास का संतुलन: मुक्ति का राजमार्ग (गीता पाँचवाँ अध्याय 1-10)
Bhagavat Gita का पाँचवाँ अध्याय ‘कर्मसंन्यास योग’ (कर्म और संन्यास का योग) ज्ञान योग और कर्म योग बीच के अनकहे सवालों को हमेशा के लिए शांत कर देता है। चौथे चैप्टर के आखिर में भगवान कृष्ण ने ज्ञान से काम करने की अहमियत पर ज़ोर दिया था। यह सुनकर अर्जुन के मन में दुविधा होती है: अगर ज्ञान से आज़ादी मिलती है, तो कर्म (संन्यास) छोड़ देना चाहिए। कौन सा अच्छा कर्म (योग) अच्छा है?
Bhagavat Gita इस अध्याय के पहले 10 श्लोकों में श्री कृष्ण इन बड़ी दुविधाओं का जवाब देते हुए, ऐसे ज्ञानी इंसान बनते हैं। इसमें एक ऐसे योगी को दिखाया गया है जो दुनिया में रहते हुए भी कमल के पत्ते की तरह अलग रहता है।
अर्जुन का संदेह और निर्णय (श्लोक 1-3)

Bhagavat Gita यह अध्याय अर्जुन के सीधे सवाल से शुरू होता है, जो हर साधक के मन में उठता है।
श्लोक 1:
अर्जुन उवाच। सन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनरयोगं च शंससि। यच्छेय एत्योरेकं तन्मे ब्रूहि अच्छतं॥ 1॥
अर्थ: अर्जुन ने कहा: हे कृष्ण! आप त्याग की भी तारीफ़ करते हैं और फिर कर्मयोग की भी। कृपया तय करें कि इन दोनों में से कौन सा मेरे लिए बेहतर है और मुझे बताएं।
श्लोक 2:
श्री भगवान कहते हैं। संन्यास: कर्मयोगश्च निश्रेयसकरवुभौ। तयोस्तु कर्मसंयासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥ 2॥
अर्थ: श्री भगवान ने कहा: संन्यास और कर्मयोग दोनों ही मोक्ष की ओर ले जाते हैं। लेकिन, इन दोनों में से, कर्मयोग, कर्मसंन्यास (कर्म का त्याग) से श्रेष्ठ है।
विश्लेषण: Bhagavat Gita कृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि दोनों मार्गों (संन्यास और कर्मयोग) का लक्ष्य मोक्ष है। लेकिन व्यावहारिक दृष्टिकोण से, कर्मयोग (अर्थात निस्वार्थ कर्म करना) संन्यास (सर्वथा कर्म) त्यागने से श्रेष्ठ है। कर्मयोग संन्यास से आसान है क्योंकि इसमें संसार से भागने की आवश्यकता नहीं है, केवल मन की आसक्तियों को त्यागना होता है।
श्लोक 3:
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्विशति न कांक्षती । निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धतप्रमुच्यते ॥ 3॥
अर्थ: जो व्यक्ति न किसी से घृणा करता है और न किसी की इच्छा करता है, उसे नित्य साधु जानना चाहिए। चाहिए। हे महापुरुष! ऐसा मनुष्य संघर्षों से मुक्त हो जाता है और सुखपूर्वक बंधन से छूट जाता है।
विश्लेषण: Bhagavat Gita यहाँ भगवान एक सच्चे संन्यासी की परिभाषा देते हैं। संन्यास बाहरी कार्यों का त्याग नहीं, बल्कि एक आंतरिक दृष्टिकोण है। जो व्यक्ति ‘घृणा’ (अनगमो) और ‘कांक्षा’ (इच्छा) से मुक्त है, वह एक सच्चा संन्यासी है, भले ही वह एक सांसारिक व्यक्ति हो।

कर्मयोग की सरलता और महत्ता (श्लोक 4-7)
Bhagavat Gita कर्म योग और संन्यास में बराबरी करके, कृष्ण ने मोक्ष पाने के लिए कर्म योग को आसान और तेज़ बनाया। रास्ता दिखाया गया है।
श्लोक 4:
सांख्यौगौ प्रथग्बालाः प्रवादंति न पंडिताः। एकमप्यास्तिह: साम्यग्योरविन्दते फलम्॥ 4॥
अर्थ: सिर्फ़ नासमझ (बच्चों जैसे) लोग ही सांख्य (संन्यास) और योग (कर्मयोग) के अलग-अलग रास्तों को समझते हैं। यकीन करो, समझदार लोग नहीं। इन दोनों में से किसी एक में अच्छी तरह से स्थापित होने से दोनों का फल मिलता है।
श्लोक 5:
यत्सांख्यः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते। एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥ 5॥
अर्थ: जो पद सांख्यमार्गी को मिलता है, वही कर्मयोगी को भी मिलता है। जो व्यक्ति सांख्य और योग को एक देखता है, वही खरना देखता है।
विश्लेषण: Bhagavat Gita इन श्लोकों में कृष्ण ज्ञान और कर्म की एकता स्थापित करते हैं। ‘सांख्य’ का अर्थ है ज्ञान योग (संन्यास) और ‘योग’ का अर्थ है कर्म योग। चूंकि दोनों का लक्ष्य एक ही है, इसलिए जो व्यक्ति मन की आसक्ति छोड़ देता है, वह अपना काम करते हुए भी संन्यासी जैसा हो जाता है। फल देता है।

श्लोक 6:
संयास्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगथा। योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्मा न चिरेनाधिगच्छति ॥ 6॥
अर्थ: हे महापुरुष! योग के बिना संन्यास लेना कष्टदायक है। कर्म योग में लगा हुआ साधु जल्दी ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।
विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक कर्म योग की श्रेष्ठता का मुख्य कारण बताता है: जो व्यक्ति आंतरिक पवित्रता (मन की पवित्रता) प्राप्त कर लेता है और मन को नियंत्रित किए बिना, अपने बाहरी कामों को छोड़ देता है, उसे त्याग में भी दुःख का सामना करना पड़ता है। जब कर्म योग में लगा हुआ व्यक्ति आसानी से और जल्दी शांति प्राप्त करता है।
श्लोक 7:
योग्ययुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूताम्भूतात्मा कुर्वन्नपी न लिप्यते ॥ 7 ॥
अर्थ: कर्मयोग से युक्त, शुद्ध आत्मा वाला, मन को जीतने वाला और इंद्रियों को जीतने वाला। जो मनुष्य सभी भूतों में अपनी आत्मा को देखता है, वह काम करते हुए भी उसमें आसक्त नहीं होता।
विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक कर्मयोगी के गुणों का सुंदर वर्णन है: वह मन से शुद्ध, इंद्रियों से भरा हुआ और सर्वव्यापक आत्मा (सभी जीवों में एक आत्मा) वाला होता है। ऐसा योगी कर्म भी करे तो बंधन उसे छू नहीं पाते।

कमल के पत्ते का अभाव (श्लोक 8-10)
Bhagavat Gita भगवान अब बताते हैं कि कैसे स्थितप्रज्ञ योगी कर्म करते हुए भी खुद को कर्ता मानता है, जिससे वह बंधता नहीं है।
श्लोक 8-9:
भोले किंचित्करोमिएति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्। पश्यांश्रृण्वं स्पृशंजिघ्रांशंघां गच्छ स्वपांश्वासनृ। 8॥ प्रलप्पन विसर्जनग्रहणंउम्मिशान्निमिशन्नापि। इन्द्रियानिन्द्रियर्थेषु वर्तमान इति धारयं ॥ 9॥
अर्थ: जो योगी तत्व को जानता है, देखता है, सुनता है, छूता है, सूंघता है, खाता है, चलता है, सोता है, सांस लेता है, बोलता है, छोड़ता है, मानता है, आंखें खोलता या झपकाता है, वह हमेशा यही मानता है कि “मैं कुछ नहीं हूं।” ऐसा नहीं करता,” क्योंकि वह जानता है कि उसके पोते-पोतियों की चीज़ों में इंद्रियां काम कर रही हैं।
विश्लेषण: Bhagavat Gita ये श्लोक कर्मयोग के अकर्ता होने की भावना बताते हैं। योगी जानता है कि शरीर और इंद्रियां प्रकृति के गुणों से काम कर रही हैं, जबकि वह खुद (आत्मा) शाश्वत और सनातन है। खुद को शरीर से अलग मानकर, वह अपने कर्मों का अहंकार छोड़ देता है, इसलिए वह खुद को नहीं बांधता।

श्लोक 10:
ब्रह्मण्याधाय कर्मणी संगं त्यक्त्वा करोती यः। लिप्यते न स पपैन पद्मपत्रमिवम्भसा। 10 ॥
अर्थ: जो इंसान सभी आसक्तियों को छोड़कर और अपने सभी कर्मों को ब्रह्मा को अर्पित करके अपने कर्म करता है, वह पाप से मुक्त होता है। यह वैसे ही नहीं चिपकता, जैसे कमल का पत्ता पानी से नहीं चिपकता।
विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक कर्मयोग का सबसे मशहूर उदाहरण देता है: कमल का पत्ता न्याय। कमल की पंखुड़ी को पानी में फेंकने पर भी वह गीली नहीं होती। इसी तरह, एक कर्म योगी दुनिया में रहते हुए भी अपने कर्म करता है, लेकिन अगर वह अपने कर्मों के फल की आसक्ति छोड़ दे और खुद को भगवान को सौंप दे, तो वह पाप (कर्मबंधन) में शामिल नहीं होता।

निष्कर्ष:
Bhagavat Gita के पांचवें अध्याय के पहले 10 श्लोकों से ये मुख्य बातें समझ में आती हैं:
संन्यास और कर्मयोग की एकता: दोनों रास्ते मोक्ष की ओर ले जाते हैं, लेकिन कर्मयोग ज़्यादा आसान और बेहतर है (श्लोक 2)।
सच्चा त्याग: यह कर्म का त्याग नहीं है, बल्कि नफ़रत और इच्छा का त्याग है। इन गुणों वाला व्यक्ति ही रोज़ाना तपस्वी होता है (श्लोक 3)।
सबसे अच्छा योगी: जो मन को जीत लेता है और कर्म करते हुए भी सभी जीवों में एक आत्मा को देखता है। कोई दास नहीं होता (श्लोक 7)।
अकर्ता भाव: बुद्धिमान व्यक्ति अपने सभी कर्मों को इंद्रियों और प्रकृति का नतीजा मानकर खुद को अकर्ता मानता है। (श्री लाल कुमार)।
मुक्ति का रहस्य: कर्म के फल की आसक्ति छोड़कर और कर्म को ब्रह्मा को अर्पित करके, मनुष्य कमल के पत्ते जैसा हो जाता है। वह दुनिया में रहते हुए भी पाप से मुक्त रहता है (श्लोक 10)।
इस तरह, कृष्ण अर्जुन ने अपना कर्तव्य बाहरी त्याग से नहीं, बल्कि अंदरूनी वैराग्य से निभाया। अजनबी बनने की प्रेरणा देते हैं।