
यज्ञ के विभिन्न रूप: कर्म की परिणति (गीता चौथा अध्याय 23-33)
Bhagavat Gita का चौथा अध्याय, ‘ज्ञानकर्मसंन्यास योग’, कर्म और ज्ञान के तालमेल पर सबसे बड़ा टेक्स्ट है। भगवान श्री कृष्ण ने श्लोक 12 से 22 में एक ज्ञानी आदमी के लक्षण और कर्म और अकर्म के गहरे रहस्य को समझाया है। अब, श्लोक 23 से 33 में, वे कर्म के शिखर के तौर पर ‘यज्ञ’ के सिद्धांत को विस्तार से बताते हैं।
कृष्ण बताते हैं कि जब कोई कर्म ज्ञान और त्याग की भावना से किया जाता है, तो वह ‘यज्ञ’ बन जाता है। और कैसे इंसान इन यज्ञों के अलग-अलग रूपों के ज़रिए बंधन से आज़ाद हो सकते हैं।
कर्म के बंधन से मुक्ति (श्लोक 23-25)

Bhagavat Gita भगवान शुद्ध भावना से किए गए कर्म की शक्ति बताते हैं।
श्लोक 23:
गतसंगस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थाचेतसः।23॥
अर्थ: जो आसक्ति से दूर हो गया है, जो मुक्त है, जिसका मन ज्ञान में स्थिर है, और जो केवल यज्ञ करता है। अगर कोई कर्म करता है, तो उसके सारे कर्मफल नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 24:
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्राह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गंतव्य ब्रह्मकर्मसमाधिना। 227 ॥
अर्थ: अर्पण करना ब्रह्म है, हविष्य (बलिदान) भी ब्रह्म है, ब्रह्म के द्वारा ब्रह्मरूपी अग्नि में होम होता है। जिसने ब्रह्मरूपी कर्मों में समाधि प्राप्त कर ली है, उसे केवल ब्रह्म ही फल मिल सकता है।
विश्लेषण: Bhagavat Gita श्लोक 24 कर्मयोग के सबसे ऊँचे रूप का वर्णन है, जहाँ कर्म ‘यज्ञ’ बन जाता है। यहाँ यज्ञ के सभी पहलुओं को ब्रह्म (परम सत्य/ईश्वर) के रूप में देखा जाता है।
यज्ञ की चीज़ें (अर्पण): ब्रह्म
यज्ञ का पदार्थ (हविष्य): ब्रह्मा
यज्ञ की आग: ब्रह्मा
यज्ञ करने वाला (होमनार): ब्रह्म
यज्ञ का नतीजा: ब्रह्मा
Bhagavat Gita जब इस नज़रिए से काम किया जाता है, तो वह सिर्फ़ कर्म नहीं रहता, बल्कि चेतना की पूजा बन जाता है। ऐसा काम करने वाला इंसान कर्म के बंधन से निकल जाता है और ब्रह्म को पा लेता है।
श्लोक 25:
दैवमेवपरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते। ब्रह्मागणावपरे यज्ञां यज्ञेनावोपजुहवती ॥25 ॥
अर्थ: कुछ योगी सिर्फ़ देवताओं के मकसद से यज्ञ करते हैं, जबकि दूसरे ब्रह्मा के रूप में यज्ञ करते हैं। यज्ञ सिर्फ़ अग्नि में यज्ञ से ही होता है।
विश्लेषण: Bhagavat Gita अलग-अलग यज्ञ यहीं से शुरू होते हैं। एक तरफ़, जो भगवान (देवताओं) के अलग-अलग रूपों की पूजा करते हैं। दूसरी तरफ़, ज्ञान योगी होते हैं, जो इस पूरी कर्म प्रक्रिया को ‘ब्रह्म’ में मिला देते हैं और आध्यात्मिक मुक्ति पाते हैं। ज्ञान के यज्ञ में लगे रहते हैं।
विभिन्न प्रकार के यज्ञों का वर्णन (श्लोक 26-32)

Bhagavat Gita भगवान बताते हैं कि बाहरी कामों से लेकर अंदरूनी कंट्रोल तक, हर काम यज्ञ में कैसे किया जा सकता है। किसी भी तरह से बदला जा सकता है।
श्लोक 26: (इंद्रियों के कंट्रोल रूपी यज्ञ)
श्रोत्रादिनिंद्रियान्ये संयमाग्निषु जुहवती। 26॥
अर्थ: कुछ योगियों ने सुनने (कान) आदि इंद्रियों को संयम की आग में जला दिया है, और कुछ दूसरे शब्द और दूसरे विषयों को इंद्रियों की आग में जला दिया है।
श्लोक 27: (योग रूपी यज्ञ)
सर्वानिन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे। आत्मसन्मयोगाग्नौ जुझवती ज्ञानदीपिते ॥27 ॥
अर्थ: कुछ दूसरे योगी ज्ञान से इन्द्रियों के सब काम और आत्मा के सब काम समझ लेते हैं। मैं संयम की जलती हुई आग में डूबा रहता हूँ।
श्लोक 28: (तप और द्रव्य यज्ञ)
द्रव्ययज्ञास्तफोयज्ञा योग्याज्ञास्थापरे। स्वाध्यायज्ञान्यज्ञाश्च यतायह संशितव्रताः॥ 28 ॥
अर्थ: दूसरे लोग पदार्थ रूप में यज्ञ करते हैं, कुछ जल रूप में यज्ञ करते हैं, और कुछ योग रूप में यज्ञ करते हैं। कुछ लोग यज्ञ करते हैं, कुछ लोग कठोर व्रत रखते हैं, स्वाध्याय करते हैं और कुछ लोग ज्ञान रूपी यज्ञ करते हैं।
श्लोक 29: (प्राणायाम रूपी त्याग)
अपने जुह्वति प्राणं प्राणापानं तथापरे। प्राणपानागति रुध्वा प्राणायामपरायणः॥29॥
अर्थ: कुछ योगी प्राणायाम करते हुए अपान वायु में प्राण वायु का होम करते हैं, और इसी प्रकार प्राणवायु में अपान वायु उत्पन्न करता है, तथा प्राण और अपान की गति को रोककर उसमें क्रियाशील रहता है।
श्लोक 30: (आहार और उपवास रूपी त्याग)
अपरे नियताहारः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति। सर्वेयप्येते यज्ञाविदो यज्ञाक्षपितकल्मशाः॥ 30 ॥
अर्थ: कुछ लोग जो नियमित रूप से भोजन करते हैं, वे जीवन के लिए त्याग करते हैं। उन सभी को यज्ञ का ज्ञान है और यज्ञ द्वारा उनके पाप नष्ट हो गए हैं।

श्लोक 31: (यज्ञ का फल)
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्मा सननम्। नायं लोकोस्त्याज्ञास्य कुटोऽन्यः कुरुसत्तम् ॥ ॥
अर्थ: जो लोग यज्ञ से बचे हुए अमृत जैसे फल का सेवन करते हैं, वे सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। हे कुरुश्रेष्ठ! जो लोग यज्ञ नहीं करते, उनके लिए यह लोक भी सुख का स्थान नहीं है, फिर परलोक कैसे सुख का स्थान हो सकता है?
श्लोक 32: (यज्ञ की व्यापकता)
और ब्रह्मणो मुखे, जो अनेक प्रकार के यज्ञ करते हैं। कर्मजनविद्धि तं सर्वनेवं जनत्व विमोक्ष्यसे। 32॥
अर्थ: इस प्रकार वेद के मुख से अनेक प्रकार के यज्ञ निकले हैं। आप जानते हैं कि वे सभी कर्म से उत्पन्न होते हैं। इस तरह जान लो कि तुम कर्म के बंधन से मुक्त हो जाओगे।
विश्लेषण: Bhagavat Gita यहाँ कृष्ण ने यज्ञ की परिभाषा को और बढ़ाया है। यज्ञ सिर्फ़ आग में आहुति देने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें जीवन की हर गतिविधि शामिल है:
त्याग रूपी यज्ञ (श्लोक 26): इंद्रियों को चीज़ों से हटाना या चीज़ों को इंद्रियों में बदलना। संयम में होमी देव।
संयम योग रूपी यज्ञ (श्लोक 27): मन को कंट्रोल करके, सभी शारीरिक और ज़रूरी कामों के लिए ज्ञान की लौ जलाना इसमें शामिल है।
धृष्ट्य यज्ञो (श्लोक 28): दान (द्रव्य यज्ञ), कड़े नियम (ठप यज्ञ), योगाभ्यास (योग यज्ञ), और पढ़ाई (स्वाध्याय यज्ञ)।
प्राणो यज्ञ (श्लोक 29): प्राणायाम से सांस को कंट्रोल करना।
यज्ञ का नतीजा: श्लोक 31 में ज़ोर देकर कहा गया है कि सिर्फ़ यज्ञ करने वाला ही अमृत (हमेशा की शांति) पाता है। करता है। जो यज्ञ नहीं करता, वह इस दुनिया में भी खुश नहीं रहता। इन सभी यज्ञों की जड़ कर्म है, जिसे अगर सही नज़रिए से किया जाए तो मुक्ति मिलती है।

ज्ञान का सर्वोच्च स्थान (श्लोक 33)
Bhagavat Gita यज्ञ के अलग-अलग रूपों का वर्णन करने के बाद, भगवान ज्ञान यज्ञ को सबसे अच्छा बताते हैं।
श्लोक 33:
श्रेयांद्र्व्यमायद्यज्ज्ज्ञानयज्ञः परंतप। सर्वम कर्मकिलम पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥33 ॥
अर्थ: हे परंतप (अर्जुन)! ज्ञानयज्ञ्ञ ध्वव्यामय (भौतिक) यज्ञों से श्रेष्ठ है। हे पार्थ! सभी कर्म ज्ञान में ही पूर्ण रूप से समाप्त होते हैं।
विश्लेषण: यह श्लोक चौथे चैप्टर की थीसिस है। वह कहते हैं कि भले ही द्रव्य यज्ञ, तप यज्ञ और योग यज्ञ करने लायक हैं, लेकिन वह आखिरी और सबसे बड़ा लक्ष्य ज्ञान है।
ज्ञान यज्ञ वह है जहाँ इंसान आसक्ति और अहंकार छोड़कर सच्चाई का ज्ञान पाता है।
जैसे सभी नदियाँ पानी में मिल जाती हैं, वैसे ही ज्ञान मिलने के बाद, सभी कर्म (अपने फल और बंधनों के साथ) घुल जाते हैं। ज्ञान में मिल जाते हैं।
Bhagavat Gita ये श्लोक इंसान को समझाते हैं कि आखिर में, मोक्ष का सबसे ताकतवर तरीका बाहरी काम नहीं हैं, बल्कि अंदर की चेतना में बदलाव (ज्ञान) है।

निष्कर्ष
Bhagavat Gita के श्लोक 4.23 से 4.33 निष्काम कर्मयोग के बारे में पूरी जानकारी देते हैं। यह सिखाता है कि:
मोह-माया त्याग, आज़ाद भावना और स्थिर चेतना के साथ किया गया हर काम यज्ञ है।
यज्ञ में जीवन का हर पहलू शामिल है – इंद्रियों पर कंट्रोल से लेकर शास्त्रों की पढ़ाई तक।
इन सभी यज्ञों में, ज्ञान यज्ञ सबसे अच्छा है क्योंकि यह ज्ञान की अग्नि से सभी कर्म बंधनों को खत्म कर देता है, कृष्ण ने कहा।
Bhagavat Gita इस तरह, कृष्ण अर्जुन को, एक योगी के तौर पर, त्याग की भावना से अपना कर्तव्य (युद्ध) करने के लिए तैयार करते हैं, जिससे कर्म के नतीजों में फंसे बिना मुक्ति मिलती है।