Bhagavat Gita (भागवद गीता) :गीता के चौथा अध्याय के श्लोक 12 से 22 तक का गहन विश्लेषण

ज्ञान की तलवार: कर्म और अकर्म का रहस्य (गीता चौथा अध्याय 12-22)

Bhagavat Gita का चौथा अध्याय, ‘ज्ञानकर्मसंन्यास योग’, जीवन के सबसे बड़े सवाल का जवाब देता है: कर्म करने के बाद भी उसके बंधन से कैसे मुक्त हुआ जाए?

पहले के श्लोकों में, भगवान श्री कृष्ण ने अपने दिव्य अवतार का रहस्य और ज्ञान की परंपरा बताई है। જાાકી. अब, श्लोक 12 से 22 में वे बताते हैं कि हर इंसान उनके रास्ते पर कैसे चलता है। और एक बुद्धिमान व्यक्ति कर्म और अकर्म के बीच का अंतर समझकर मोक्ष कैसे प्राप्त करता है?

कहानी की स्थिति और कामों के नतीजों की उम्मीद (श्लोक 12-14)

Bhagavat Gita भगवान यह साफ़ करते हैं कि इंसान की कर्म करने की आदत और उसके फल की इच्छा क्या है।

श्लोक 12:

कांक्षंतः कर्मणानाम सिद्धिं यजन्त इह देवताः। क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥ 12

अर्थ: इस दुनिया में इंसान देवताओं को यज्ञ इसलिए करते हैं क्योंकि वे अपने कर्मों का फल पाना चाहते हैं; क्योंकि इंसानी दुनिया में कर्म से मिलने वाली सफलता जल्दी मिल जाती है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita इंसानी दुनिया में फल की इच्छा रखने वाले लोग भौतिक लाभ (जैसे धन, संतान, शक्ति) चाहते हैं। देवताओं के पूर्वजों की पूजा करते हैं। कृष्ण यहाँ मानते हैं कि कर्म के फल इंसानी जीवन में तुरंत और साफ़ दिखाई देते हैं, इसलिए ज़्यादातर लोग इच्छा से काम करते हैं।

श्लोक 13:

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्म विभागश। तस्य कर्तारमपि मा विध्याकर्तारमव्यम् ॥13

अर्थ: मैंने गुण और कर्म के हिसाब से चार वर्ण बनाए हैं। मैं इसका कर्ता होते हुए भी, तुम मुझे न करने वाला और अविनाशी समझते हो।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक बताई गई स्थिति की असली शुरुआत बताता है। विवरण का आधार जन्म (जाति) नहीं, बल्कि व्यक्तित्व के गुण (स्वभाव) और कर्म हैं। (D.t. सत्वगुण प्रधान – ब्राह्मण; रजोगुण प्रधान – क्षत्रिय, आदि)। यह सिस्टम भगवान ने दुनिया का बैलेंस बनाए रखने के लिए बनाया है। खास बात यह है कि भगवान इस सिस्टम के बनाने वाले हैं, हालांकि वे इसके नतीजों से जुड़े नहीं हैं। અર્તા છે.

श्लोक 14:

न माँ कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा। इति यो मामभिजनाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥ 14

अर्थ: कर्म मुझ पर असर नहीं करते, और मुझे अपने कर्मों के फल की कोई इच्छा नहीं है। जो व्यक्ति मुझे इस तरह जानता है, वह भी कर्मों से बंधा नहीं है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita यह श्लोक ‘कर्मयोग’ का सार है। भगवान कर्म (ब्रह्मांड की रचना और संचालन) करते हैं, लेकिन उन्हें कोई बंधन नहीं है क्योंकि वे परिणाम से जुड़े नहीं हैं। उनमें कोई जुनून नहीं है। जो इंसान यह ज्ञान हासिल कर लेता है, वह कर्म करते हुए भी मुक्त हो जाता है।

कर्म, अकर्म और विकर्म में अंतर (श्लोक 15-18)

भगवान कर्म योग का इतिहास और उसके गहरे रहस्य बताते हैं।

श्लोक 15:

एव ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरापि मुमुक्षुभिः। कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतं ॥ 15

अर्थ: पूर्वकाल के मोक्ष की इच्छा रखने वाले पुरुषों ने भी जानते हुए इस प्रकार कर्म किए हैं। इसलिए तुम भी वही कर्म करो जो पिछले लोगों ने किए हैं।

श्लोक 16:

किम कर्म किमक्रमेति कवायोऽप्यत्र मोहिताह। तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्यात्व मोक्ष्यसे शुभात् ॥16

अर्थ: ‘कर्म क्या है और अकर्म क्या है?’ इस विषय में बुद्धिमान लोग भी मोहित हो जाते हैं। इसलिए मैं तुम्हें वह कर्म बताऊँगा, जिसे जानकर तुम अशुभ (सांसारिक बंधन) से मुक्त हो जाओगे।

श्लोक 17:

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः। अकर्मणश्च बोद्धव्यं ज्वेल कर्मणो गतिः ॥ 17

अर्थ: कर्म के स्वरूप को जानना चाहिए, और विकर्म (निषिद्ध कर्म) के स्वरूप को भी जानना चाहिए, और अकर्म के स्वरूप को भी जानना चाहिए, क्योंकि कर्म का गूढ़ रहस्य समझना कठिन है।

श्लोक 18:

कर्मण्यकर्म यः पश्येद्कर्मणि च कर्म यः। बुद्धिमान मनुष्य अच्छे कर्मों से युक्त होता है। 18

अर्थ: जो व्यक्ति कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में सबसे बुद्धिमान है, वही योगी है। और वही पूर्ण कर्ता है।

विश्लेषण: Bhagavat Gita श्लोक 18 चौथे अध्याय का मुकुट है और गीता के मुख्य सिद्धांतों में से एक है।

कर्म, विकर्म, अकर्म:

कर्म: शास्त्रोक्त भरजो (दा.त., अर्जुन माते युद्धो)।

विकर्म: निषिद्ध या पापपूर्ण कर्म।

अकर्म: कर्म का अभाव (अकर्म), या बिना किसी इरादे के कर्म करना (जहाँ कर्म किया जा रहा है, उसके बावजूद वह बंधा हुआ नहीं है)।

गहरा रहस्य: समझदार आदमी वह है जो जानता है कि जब वह शरीर से कोई काम कर रहा है, अगर वह फल के प्रति आसक्ति से मुक्त है, तो वह निष्क्रिय अवस्था में है। और जब वह बैठा है और कोई काम नहीं कर रहा है, लेकिन उसके मन में इच्छाओं के प्रति आसक्ति है, तो वह कर्म कर रहा है। છે.

आसान भाषा में: काम में अकर्म का मतलब है: काम (कर्म) हो रहा है, लेकिन मन में आसक्ति न होने के कारण काम नहीं हो रहा है। कोई बंधन (अकर्म) नहीं है।

बुद्धिमानों का आचरण और उद्धार (श्लोक 19-22)

Bhagavat Gita ये आखिरी श्लोक बताते हैं कि इस ज्ञान को पाने वाले इंसान की ज़िंदगी कैसी होती है।

श्लोक 19:

यस्य सर्वे समरम्भ कामसंकल्पवर्जिताः। ज्ञानाग्निदग्धाकर्मणां तमाहु पंडित बुधा ॥ 19

अर्थ: जिनकी शुरुआत (कोशिशें) इच्छा और निश्चय से मुक्त हैं, और जिनके कर्म ज्ञान रूप हैं। जो आग से जल गए हैं, उन्हें ज्ञानी लोग पंडित कहते हैं।

श्लोक 20:

त्यक्त्वा कर्मफलसंगमनित्यतृप्तो निराश्रयः। कर्मण्यभिप्रवृत्तोपि नैवे किंचित्करोति सः ॥ 20

अर्थ: जो कर्मों के फल की आसक्ति छोड़कर, सदा संतुष्ट और बिना किसी आश्रय के रहता है, वह कर्म में लगा रहता है। अच्छे इरादे होने पर भी, वह वास्तव में कुछ नहीं करता।

श्लोक 21:

निशासीर्यत्चितात्मा त्यक्त सर्वपरिग्रहः। शरीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥21

अर्थ: जो आशाहीन हैं, जो मन और आत्मा को वश में करते हैं और जो सभी प्रकार के संग्रह का त्याग करते हैं, वे केवल शरीर से कर्म करने पर भी पाप नहीं करते।

श्लोक 22:

यदृच्छलाभासंतुष्टो द्वंद्वितो विमत्सरः। समः सिद्धवासिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥ 22

अर्थ: जो अपने आप मिलने वाले फ़ायदों से संतुष्ट रहता है, गर्मी और सर्दी जैसी दुविधा में रहता है, मत्सर। (ईर्ष्या) और सफलता और असफलता में समान रहता है, वह कर्म करके भी नहीं बंधता।

विश्लेषण: Bhagavat Gita ये श्लोक ज्ञानकर्म संन्यासी (जो कर्म को ज्ञान के साथ जोड़ता है) की जीवनशैली को दर्शाते हैं। છે:

ज्ञान की अग्नि से जले हुए कर्म: उसके सभी कर्मों की जड़ फल की इच्छा नहीं, बल्कि ज्ञान है। ज्ञान की यह अग्नि कर्मों को जला देती है।

निष्क्रिय कर्म: वह शारीरिक रूप से कर्म करता है (श्लोक 20), लेकिन आसक्त न होने के कारण वह कुछ नहीं करता। (अकर्म) नहीं करता। वह केवल शरीर की ज़रूरतों के लिए काम करता है (श्लोक 21)।

संतुष्टि और समता: वह अप्रत्यक्ष रूप से मिलने वाले फ़ायदों से संतुष्ट रहता है। वह द्वंद्वों (सुख-दुःख, मान-अपमान) से मुक्त होता है और सफलता और असफलता दोनों में एक समान रहती है (श्लोक 22)।

Bhagavat Gita यह ज्ञानी व्यक्ति सच्चे अर्थों में योगी है, जो संसार में रहते हुए भी अपने कर्मों के कारण संसार से परे है। मैनेजमेंट आसक्ति से नहीं, बल्कि दिव्य ज्ञान से होता है। अर्जुन को आदेश है कि यह ज्ञान प्राप्त करने के बाद, वह अपने युद्ध के कर्मों को केवल शरीर का कर्तव्य समझे। इसे स्वीकार करने से व्यक्ति कर्म के बंधन से मुक्त हो जाता है।

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